मेरे पास कई बक्से हैं - लोहे और स्टील के चदरे वाले। सब माँ का दिया हुआ है या उसी का एक-दो मैं ले आई हूँ। उनमें जो बड़ा होता था उनको माँ ट्रंक कहती थी या कभी कभी मुहावरेदार प्रयोग करते हुए संदूक। बल्कि मामा (दादी) संदूक शब्द का अधिक इस्तेमाल करती थी। शब्दों के इस्तेमाल में वस्तु के स्वरूप के अलावा वक्ता की पहचान और रुतबे को भी देखना पड़ता है, इससे मैं वाकिफ़ हूँ। जब बक्स - बक्सा या अंग्रेज़ी के बॉक्स शब्द की व्युत्पत्ति (etymology) खोजने चली तो मैं लैटिन तक ही नहीं गई, भटककर क्रिया रूप बॉक्सिंग और उसके कर्त्ता बॉक्सर तक चली गई। यहाँ ठेठ आयताकार पेटी ही मेरी आँखों के सामने है।
पिछले कई सालों से मैंने सारे बक्से-ट्रंक-संदूक को ऊपर दुछत्ती (या बॉक्स रूम) या जो अब 'Loft' अधिक कहलाता है, उसमें रख दिया था। धीरे-धीरे उसमें अब बड़े बड़े कार्टन, बड़े गत्ते, टूटी-फूटी चीज़ें और तत्काल इस्तेमाल में न आनेवाले बड़े बर्तन वगैरह रख दिए गए हैं। वह इतना ठसाठस भर गया कि मुझे बक्सों को हटाकर उनके लिए जगह बनानी पड़ी। चार-पाँच बक्सों में से दो छोटे बक्सों को मैंने नीचे उतार दिया। अब घर में उनके लिए जगह बनाना आसान नहीं था। आजकल घर में बक्सा कौन भलामानुस रखता है ? पतिदेव को तो अपनी लोहे की आलमारी भी पसंद नहीं थी, बक्सा कहाँ से रुचता !
हाँ तो मैं बात कर रही थी कि दुछत्ती से मेरे 2 बक्से ज़मीन पर आ गए। पहले वे नज़र से ओझल थे और अब साक्षात् सामने थे। रखूँ कहाँ ? ना-नुकुर को अनदेखा करके दावे के साथ मैंने अपने कमरे में ही रख लिया। नीचे एक पुरानी दरी बिछाई और एक के ऊपर एक बक्से को रखकर ऊपर से उसे एक नए मोटे गहरे रंग के सूती दुपट्टे से ढँक दिया। उसके ऊपर मेरे थैले, पर्स, कलम वगैरह के साथ एक शीशे का पेपरवेट भी है जो बिना इस्तेमाल के मारा-मारा फिर रहा था। बक्सों के कोने में गत्ते के खोल में दो बड़ी बड़ी तस्वीरें हैं। उपहारस्वरूप मिली ये तस्वीरें हमदोनों की हैं - कंप्यूटर से बनाई गई। बड़ी जीवंत हैं। अपने घर में यादगार छोटी-छोटी तस्वीर लगाना तो सजावट का हिस्सा है, लेकिन अपनी ही कैलेंडरनुमा तस्वीर टाँगना ज़रा अटपटा लग रहा है। बाद में उस पर माला चढ़ाने का मन होगा किसी को तब शायद काम आ जाएगी :) तत्काल बक्सों की ओट में वे सुरक्षित हैं।
अगली बार घर में हवा के शुद्धीकरण के लिए 'एयर प्यूरीफ़ायर' आया और ठंड में एक और 'ऑइल हीटर' आ गया तो मैंने उनके डब्बों को ऊपर दुछत्ती पर चढ़ा दिया। यह सोचकर कि जब कभी घर बदला जाएगा तो सामान ले जाने में काम आएगा। नतीजतन ऊपर से दो और बक्से विस्थापित हुए। इस बार उनको जगह मिली स्टडी में। रोज़ाना झाड़ू-पोंछा करने में दिक्कत न हो और बक्सों में नमी के कारण ज़ंग न लगे, इसलिए मैंने सोचा कि स्टील के बक्सों के नीचे चार ईंट लगा दूँ। माँ लोग यही करती थी। मुझे याद आ रहा है कि माँ कभी कभी ईंट के ऊपर पहले एक मज़बूत पटरा रख देती थी। उनपर चार-चार बक्से एक के ऊपर एक रखे जाते थे। एकदम संतुलित रहते थे। बक्सों को उतारना-चढ़ाना सब माँ अकेले करती थी। पापा या भैया ने कभी उसमें हाथ लगाया हो, मुझे याद नहीं। उम्र के साथ जब माँ अशक्त होने लगी तो उन बक्सों को खोलना-बंद करना भारी पड़ने लगा था। सहायिका-सहायक के बूते काम चलता रहा, नैपथलिन की गोलियाँ डलवाई जाती रहीं। माँ के आदेश का स्वर कब खुशामद में बदल गया, अंदाजा नहीं। पलटकर सोचती हूँ तो बक्सों की उस उपेक्षा में कहीं न कहीं हम माँ और उसके लगाव की उपेक्षा कर रहे थे।
बदसूरत न लगे, इसलिए पहले लोग बक्सों के नीचे लगी ईंटों को अखबार में लपेट देते थे और साल-छह महीने में वह अखबार बदलकर नए अखबार में ईंटों को लपेट दिया जाता था। [औरतों का जिम्मा था यह या कम से कम उनकी देख-रेख में यह साज-सँभाल होता था। पितृसत्तात्मक घर के ढाँचे ने घर की 'रानी' को घर के भीतर का राज-पाट (वह भी पूरा नहीं, आंशिक) सौंप रखा है जिसमें बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। माँ की तरह मैं भी अधिकतर वही भूमिका निभाती हूँ - चयन (Choice) की आज़ादी और एजेंसी के नाम पर!] लेकिन अब 'आउटडेटेड' बक्सों के लिए इतना तरद्दुद कौन करे और यह भी कि जब से ई-पेपर लिया जाने लगा है अखबार मिलता कहाँ है! कभी कोई सामान आ गया अखबार में और वह सही-सलामत साफ़-सुथरा हुआ तो उसे सहेज लिया, वरना तुड़ा-मुड़ा अखबार तो फेंक दिया। मुझे याद है कि एक बार मैं शताब्दी ट्रेन से एक अखबार उठाकर ले आई थी। अब तो ताखे भी खत्म हो गए हैं जिनपर पुताई के चूने से बचने के लिए अखबार बिछाते थे हमलोग। खैर, अब ताखा, पोचारा - चूने से दीवारों की पुताई और छपाई की स्याही की गंध वाले अखबार के लोप होते जाने का विलाप किसी और दिन!
फिलहाल मैंने बक्सों के पैर की तरह लगी ईंटों को अखबार में नहीं लपेटा है। वे नई ईंटें हैं, हालाँकि साबुत नहीं हैं। कॉलोनी में कहीं काम चल रहा था तो छँटी हुईं ईंटों के ढेर में से मेरी वर्तमान सहायिका सरोज चार ईंट उठा लाई थी। सिर पर रख कर ऊपर लाई क्योंकि तीन मंज़िल चार ईंट हाथ में उठाकर लाना आसान नहीं था। उन पर एक नहीं, दो बक्से जम गए हैं। वे डगमगा नहीं रहे। मैंने एक पुराना मेज़पोश - टेबलक्लॉथ डालकर बक्सों को ढँक दिया है। उनके ऊपर बैठा जा सकता है, लेकिन मैंने किताबों की नई थाक रखने के लायक उसे बना दिया है। उस स्टडी में कोई बाहरी आने-जाने से रहा, सो फ़िलवक़्त वे बक्से इत्मीनान से हैं। मध्यमवर्गीय घरों की साज-सज्जा पर बनी किसी रील में वैसे ढँके-दुबके बक्सों को देख आप हँस सकते हैं, अन्यथा मेरे जैसों के लिए वह यादों का ज़खीरा है।
बक्से के पैर से ध्यान आया कि इसका पूर्वज लकड़ी का 'चेस्ट' (Chest) भी चौपाया होता था। प्राचीन मिस्र देश में सदियों पहले जो 'चेस्ट' मिलता था उसमें भी पैर लगे होते थे। कपड़े, गहने, काग़ज़ात, कीमती असबाब आदि रखने के लिए चेस्ट सर्वोत्तम फर्नीचर था। ढक्कन, ताला और उसे समेटने के लिए लोहे की पट्टी उसकी आरंभिक बनावट का अनिवार्य हिस्सा हैं। उसके बावजूद वह सादा सा था। प्राचीन राजमहलों, खज़ानों, यूरोपीय चर्चों आदि में उनके अवशेष मिल जाएँगे। ब्रिटैनिका के मुताबिक 13 वीं सदी में फ़्रांसीसी लोगों ने उसमें पच्चीकारी की शुरुआत की। दिलचस्प यह था कि इस काल के अन्य चेस्ट की बनावट पर Romanesque art (11 वीं-12 वीं सदी में यूरोप में विकसित कला जिसमें कई सभ्यताओं की कलाओं का मिश्रण था) और Gothic art (मध्य 12 वीं सदी से 16 वीं सदी के बीच यूरोप में विकसित कला) की छाप दिखती है। स्थापत्य कला का मूर्ति कला, चित्रकला से जुड़ाव स्वाभाविक रहा है और कला की विशेष शैली का प्रभाव हम अनेकानेक क्षेत्र में देखते आए हैँ। उसी तरह फ़र्नीचर बनाने के लिए Romanesque art एवं Gothic art से विचार (idea) लेना अजूबा नहीं है। यदि हम पुराने चेस्ट की तस्वीरें देखें तो उनका अर्धगोलाकार होना हमें मेहराबों की याद दिला देगा। संग्रहालयों में उसे देखा भी है। 'एंटीक' डिज़ाइन के रूप में आधुनिकतम फ़र्नीचर की वेबसाइट पर भी।
चेस्ट खोलने-बंद करने में सहूलियत लाने और उसकी उपयोगिता को बढ़ाने के लिहाज से ही शायद ड्राअर का डिज़ाइन बना होगा। तभी तो 17 वीं सदी से कई ड्राअर वाले चेस्ट ही प्रचलित हो गए। इधर मध्य युग में ही कप और अन्य बर्तन रखने के लिहाज से cupboard - कबर्ड जैसी संरचना विकसित हो चुकी थी। उसमें जो अलग अलग खाने यानी ताक (shelves) बनने लगे थे, वे परंपरा से चले आ रहे थे। सामान रखने के लिए अलग अलग खानों की ज़रूरत सभ्यता के आरंभिक दौर में ही महसूस की गई थी। कहते हैं कि पाषाणकाल में खानाबदोश जीवन में गुफाओं-कंदराओं में प्राकृतिक रूप से बने गहरे गड्ढे ताक का काम कर रहे होंगे। धीरे-धीरे चेस्ट में भी खाने/ताक बनने लगे थे ताकि अलग अलग सामान का संग्रहण हो सके। आगे चलकर चेस्ट और कबर्ड के मकसद और उनकी बनावट में मेल-जोल हुआ। अब कबर्ड में पल्ला खुलता था सामने, न कि चेस्ट की तरह ऊपर। आजकल तो जगह की कमी ने पल्ला/दरवाज़ा/ढक्कन सबका स्लाइडिंग विकल्प दे दिया है। जब हमने तीन गहरे-गहरे ड्राअर वाला चेस्ट मुनिरका में फ़र्नीचर की दुकान से बनवाया था तब माँ को वह भाया था। उसे लगा था कि कई बक्सों की जगह ऐसा फ़र्नीचर ज़्यादा माकूल है। मेरा ध्यान गया कि सामान रखने वाला बक्सा फ़र्नीचर की कोटि में आराम से आएगा, पैकेजिंग वाला बॉक्स नहीं।
चलिए बक्सा पुराण पर लौटते हैँ! मेरा एक बक्सा जो शादी में मौसी ने दिया था, वह ऊटी में एक आवासीय स्कूल में छूट गया। इसकी टीस गाहे बगाहे उठती रहती है। बिना स्कूल के पदाधिकारियों को बताए मैं बेटी को ऊटी से 22 दिन में ही लेकर भाग आई थी। कहा था कि हफ़्ते भर के लिए ले जा रही हूँ, मगर मुझे पक्का मालूम था कि वहाँ वापस नहीं लौटना था। इस चक्कर में ढेर सारे गर्म कपड़ों के साथ बक्सा वहीं रह गया। बहुत बाद में स्कूल वालों ने कुछ कपड़े किसी के हाथ भिजवाए, मगर रज़ाई-कोट आदि के साथ वो मेरी शादी वाला बक्सा वहीं रह गया। मैंने बहुत दुख मनाया, लेकिन एक बक्से को लाने के लिए उतनी दूरी की यात्रा मुमकिन नहीं थी। यात्रा व्यय की चिंता से अधिक मामला यह था कि मुझे भावनात्मक दबाव फिर नहीं झेलना था। लिहाजा बक्से का यह बिछोह सह गई!
इसी से याद आया माँ की शादी वाला लाल बक्सा और उससे बड़ा काला टूटे कुंडे वाला ट्रंक जिसमें नानाजी और पापा की डायरी रखी रहती थी। माँ को नए-नए ब्रीफ़केस-सूटकेस की भीड़ में उन बक्सों को अपने जीते-जी नहीं हटाना था। लाल बक्से में अँखरा धोती, नई साड़ी, 2x2 रुबिया ब्लाउज़ पीस, पेटीकोट का पॉपलीन कपड़ा, शादी-ब्याह में मिला हुआ पैंट-शर्ट का कपड़ा (विमल, सियाराम या रेमण्ड्स का) साड़ी का नया फ़ॉल, नई चादर और बुनाई के काँटे वगैरह सँभाल कर रखे हुए थे। बुनाई की अलग अलग नंबर की सलाइयों को माँ ने बाद में बक्से से निकलवाकर अपने कमरे वाली आलमारी में रख लिया था। वह उन सलाइयों के लिए सुपात्र खोज रही थी जो उनका कदरदान हो, जिसे बुनाई का शऊर हो। मैंने बमुश्किल एक हाफ़ स्वेटर बनाया था और नमूने के तौर पर स्कूल में जमा करने के लिए कुछ छोटा-मोटा बनाया था। बेटी के लिए शौकिया एक नन्हा-सा स्वेटर बनाकर मैंने माँ और मौसी की बुनाई के हुनर के आगे हथियार डाल दिए थे। असल में मेरा मन ही नहीं लगता था।
माँ की इच्छा थी कि उसकी शादी वाला बक्सा घर में ही रहे। मेरे लिए वह धरोहर होती, मगर उसके जाने के कुछ महीनों बाद जब घर खाली किया जा रहा था तब ठस्स बनकर हमने बहुत कुछ हटा दिया। सबकुछ तितर-बितर हो गया, जानते-बूझते। यह सोचकर संतोष किया कि माँ की देख-रेख करनेवाली मीरा-गौरी के जीते-जी उनके पास भी माँ की निशानी रहेगी। बाद में तो उनके बच्चे भी हमारी तरह इन बक्सों को हटा देंगे। मैं अपने पास रखे माँ के चंद बक्सों को देखकर अपना अपराध-बोध कम करने की नाकामयाब कोशिश करती हूँ। सोचती हूँ कि बरगद की तरह बक्सों की जड़ें मेरे दिल-दिमाग से लेकर मेरे रुँधे गले में अटकी हैं।
बक्से का छोटा बक्सी जैसे संदूक़ का संदूक़ची (छोटा-नाजुक बनाने के लिए जो प्रत्यय लगते हैं अक्सर उनको भाषा एवं जेंडर की निगाह से देखना चाहिए) कहलाता है और एक बक्सी है मेरे पास। तकरीबन 45-46 साल से। यह उन दिनों की बात है जब स्कूल बैग की जगह थोड़े खाते-पीते घरों के बच्चों के पास अल्युमिनियम या स्टील के चदरे वाला छोटा बक्सी आने लगा था। बहुत कायदे का और खूबसूरत तो नहीं, मगर एक बक्सी मेरे पास भी आया। भैया के पास नहीं क्योंकि उस ज़माने में भी लड़के वैसी चिकनी-चमकती बक्सी नहीं ले जाते थे। यह मैं अपने सीमित अनुभव और याददाश्त से लिख रही हूँ, मुमकिन है कि दूसरी जगह लड़के ले जाते हों और तब गौर से उनकी बनावट में 'मर्दानगी' कैसे पिरोई गई थी, इसे परखना पड़ेगा। ज़रा रुकिए, अभी अभी मेरे एक देवर ने अल्युमिनियम वाला बक्सा (बक्सी) लेकर स्कूल जाने की बात बताई। उसमें मज़ेदार था मुझसे यह पूछना कि आप बक्सा लड़ाई खेली हैं या नहीं। उसके इस व्हाट्सएप संदेश में भी उसकी मुस्कुराहट छुप नहीं रही थी - "हमलोग दोस्तों के बक्से से अपना बक्सा लड़ाते थे और जिसका बक्सा पिचक जाता था वो हार जाता था।"
खैर, मैं वह बक्सी लेकर कभी स्कूल नहीं गई। मुझे उसका भोथरापन पसंद नहीं था, बावजूद इसके कि वह मेरे लिए कीमती था। मैंने उसमें क्या-क्या छिपाकर रखा, इसका खुलासा करने में अभी भी शर्मा रही हूँ। एक छुटका ताला खरीदा था, जिसकी चाभी 24 घंटे मेरे पास रहती थी। माँ-पापा बिना सिद्धांत बघारे बच्चों की निजता (प्राइवेसी) का खयाल रखते थे। भैया भले चिढ़ाता रहता था और खेल-खेल में धमकाता था कि बच्चू, तुम्हारी बक्सी मेरे हाथ लग जाए तब देखना। फिर सबके ध्यान से वह बक्सी उतर गई जो आज भी मेरे पास उसी रूप में सुरक्षित है। केवल कुंडा टूट गया है और ताला नहीं है, मगर अब उस गोपन की रक्षा की चिंता नहीं है।
निजता, गोपनीयता, सम्मान कितना कुछ जुड़ा है बक्से से! माँ बताती थी कि जब शादी के बाद बिना उससे पूछे और बिना उसको बताए उसका बक्सा खोलकर ससुराल में सामान बाँट दिया गया था तब वो भौंचक्क रह गई थी। शहरी नववधू को यह गँवईपन लगा था, असभ्यता लगी थी (हालाँकि गँवईपन और असभ्यता अनिवार्य रूप से जुड़े नहीं हैं)। अधिकार की बात है इसमें। अधिकार-क्षेत्र का अधिक्रमण भी है। कौन किसका बक्सा कब और क्यों खोले, यह घर-परिवार में सबको मालूम रहता है और रस्म के नाम पर यह अभी भी बेरोक-टोक चल रहा है। मगर माँ को अपने अस्तित्व से इन्कार करना लगा था यह। अपना बक्सा अपने मुताबिक रखने की आज़ादी की ख्वाहिश में स्त्री का मन कौन पढ़ पाता है ? वह उसका जो करे, चाहे तो पूरा उकट कर रख दे।
पिछले हफ़्ते सुधा भारद्वाज की किताब 'फाँसी यार्ड' में जब 'झाड़ती' के बारे में पढ़ रही थी तब मन काँप गया था। जेल में 'झाड़ती' शब्द का उपयोग नियमित रूप से की जानेवाली तमाम तरह की तलाशियों के लिए किया जाता है। पहला झटका जेल में दाखिल होते ही लगता है जब पूरा नंगा कर तलाशी ली जाती है। बेहिस्सपने की इंतहा देखिए कि उठक-बैठक करवा कर तलाशी ली जाती है कि किसी ने गुप्तांगों में तो कुछ नहीं छिपा रखा है। अचानक अभी मुझे 'झाड़ती' शब्द बक्से की तलाशी के किस्से के प्रसंग में कौंधा। इतना दुखदायी और अपमानजनक कि मैं उससे बचना चाहूँगी। कुछ बातें दफ़न रहें तो बेहतर है। वास्तव में एक बक्सा जब शक के नाम पर दूसरे द्वारा खोल दिया जाता है तो केवल भरोसा तार-तार नहीं होता, बल्कि रिश्ता तार-तार हो जाता है।
बक्सी से एक बात याद आई। हमलोग मिडिल स्कूल के समय में दोस्तों के साथ बक्सी लड़ाई खेलते थे। इसमें दो दोस्त अपने बक्सी को दूसरे की बक्सी से टकराते थे। जिसकी बक्सी पिचक जाती थी वो हार जाता था।
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