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शनिवार, 7 जुलाई 2012

कोई एक स्त्री को पीट रहा है (Koi ek stri ko peet raha hai by Andrei Voznesensky)


कोई एक स्त्री को पीट रहा है.
कार में, जिसमें एकदम अँधेरा और गर्मी है
केवल उसकी आँखों की पुतलियाँ चमकती हैं ;
वह फेंकती है ऊपर की तरफ अपने पैर
जैसे हमले की रौशनी झपटती हो.

कोई एक स्त्री को पीट रहा है.
किसी तरह, वह खोलती है द्वार
और मारती है छलाँग-सड़क पर.

ब्रेक रिरियाते हैं.
कोई उसकी ओर लपकता है,
उसे मारता है, औंधे मुँह,
खिंची हुई घास में घसीटता है.
टुच्चा ! कैसे सलीके से उस स्त्री को पीटता है.
शोहदा, हरामी, यौधेय,
गड़ती है उस स्त्री की पसली में
उस आदमी के भड़कीले जूते की नोक.

ऐसा ही होता है दुश्मन के सैनिक के सुखों का लोक,
काश्तकारों की क्रूर आत्म तृप्तियाँ.
चाँदनी में बिछी हुई घास को कुचलते हुए पैर से
कोई एक स्त्री को पीट रहा है.

कोई एक स्त्री को पीट रहा है
सदी-दर-सदी, कोई अंत नहीं ;
पिटती है वह जो जवान है . डूबकर
गहरे अवसाद में, घंटियाँ विवाह की
बदलती हैं खतरे के प्रतीक में
कोई एक स्त्री को पीट रहा है.
और वह क्या है, वह, लौ जैसा चिन्ह, जो
उछल आया है, उनके सुलग रहे गालों पर ?
ज़िन्दगी. तुमने कहा ! क्या यह
तुमने मुझसे कहा?
कोई एक स्त्री को पीट रहा है.

- मगर उसकी रोशनी बिलकुल निष्कम्प,
एक अनंत संसार है
न कोई धर्म है,
            न कोई सत्य,
केवल स्त्रियाँ हैं.

पानी की तरह निर्वर्ण उसकी आँखें
आँसुओं में डूबी और थिर
जंगल में गहराती छाया जितनी भी
उन पर नहीं, उसका अधिकार.

और तारे ? बजते हैं नीले आकाश में,
जैसे स्याह शीशे पर
वर्षा की बूँद,
गिर-गिर कर, टूट-टूट कर उसके लोक में
वे उसके शोक-तप्त माथे को
शीतल करते हैं.


                       कवि - आन्द्रे वोज्नेसेंस्की (1960 ) 
                       संग्रह - फैसले का दिन
                       अनुवाद - श्रीकांत वर्मा
                       प्रकाशक - संभावना प्रकाशन, हापुड़, द्वितीय संस्करण - 1982  

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

गुरु कौ बचन (Guru kau bachan by Rakesh Ranjan)


आ बचवा, चल चिलम लगा दे !

रात भई, जी अकुलाता है
कैसा तो होता जाता है
ऊ ससुरा रमदसवा सरवा
अब तक रामचरित गाता है

रमदसवा जल्दी सो जाए
ऐसा कोई इलम लगा दे !  

आ बचवा, अन्दरवा आजा
हौले से जड़ दे दरवाजा
रामझरोखे पे लटका दे
तब तक यह बजरंगी धाजा

हाँ, अब सब कुछ बहुत सही है
फट से फायर फिलम लगा दे !


                             कवि - राकेश रंजन
                             संग्रह - अभी-अभी जनमा है कवि
                             प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2007

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

बाबरनामा (Babarnama by Babar)


उस समय उर्दू-बाज़ार (छावनी के साथ चलनेवाला बाज़ार) में एक लड़का था. उसका नाम था बाबरी. हमनामी का यह लगाव भी क्या लगाव निकला ! उससे एक अजीब लगाव पैदा हो गया :
                          "मीन आनक़ा ग़रीब मेहर पैदा क़ीलदीम 
                           बल्कि आनक़ा ऊज़ीनी ज़ारोशैदा क़ीलदीम !"
                          (उस परी-चेहरा पर हुआ शैदा -
                            बल्कि अपनी ख़ुदी भी खो बैठा !)
इससे पहले मैं किसी पर मुग्ध या आसक्त न हुआ था. सच तो यह है कि तब तक किसी से प्यार और मुहब्बत क़ी बात तक न हुई थी. दिल-लगी क़ा नाम तक न सुना था. अब हाल यह हुआ कि फ़ारसी में प्यार के एकाध शेर तक कहने लगा. उनमें से एक शेर यह है -
                           "हेच कस चूँ मन ख़राबो आशिक़ो रुसवा मबाद
                            हेच महबूबे चु तू बेरहमो बेपरवा मबाद !"
                           (कोई आशिक़, नंगे-ख़ुद, बरबाद मुझ-जैसा न हो,
                            और तुझ-सा बुत कोई बेरहम बेपरवा न हो !)
लेकिन हाल यह था कि अगर कभी बाबरी मेरे सामने आ जाता था तो लाज और सकुचाहट के मारे मैं उसकी ओर आँख भर देख भी नहीं सकता था. ऐसे में इस बात क़ो तो पूछना ही क्या कि मैं उससे मिल सकूँ और बातें कर सकूँ.उसके आगे अपने दिल क़ा हंगामा बेपर्द करना तो दूर, दिल क़ी घबराहट और बेचैनी क़ा यह आलम था कि उसके आने क़ा शुक्रिया तक अदा नहीं कर पाता था !  यह तो कहाँ कि न आने क़ा उलाहना होंठों पर ला सकता !  और ज़बरदस्ती बुलाने क़ी मजाल ही भला किसको थी ! अपने आप पर इतना भी बस नहीं था कि वह आए और मैं मामूली तक़ल्लुफ़ भी बरत सकूँ. आशिक़ी और दीवानगी के उन्हीं दिनों में एक बार ऐसा हुआ कि अपने बहुत थोड़े-से ही एकदम नज़दीकी निजी सेवकों के साथ किसी गली में चला जा रहा था कि अचानक बाबरी से मेरा आमना-सामना हो गया. मेरी अजब हालत हो गई थी. वह अवस्था दूर न थी कि अपने आपे तक में न रहूँ. आँख उठाकर देखना या बात करना बिलकुल मुमकिन न था. मुंह से एक भी बोल न निकल पाया. बहुत झेंप और घबराहट के साथ मैं आगे बढ़ पाया. उस समय मुहम्मद सालिह क़ी यह फ़ारसी बैत बरबस याद आ गई :
                          "शबम शरमिंदा हर-गह यारे-ख़ुद-रा दर-नज़र बीनम
                           रफ़ीकां सूय-मन बीनंदो मन सूए-दीगर बीनम !"
                          (गड़ा जाता हूँ जब-जब यार क़ा रू देखता हूँ मैं
                           मुझे सब देखते हैं, और ही सू देखता हूँ मैं !)
यह बैत मेरे हाल पर सोलहों आने सच थी. उन दिनों प्यार और मुहब्बत क़ा ऐसा ज़ोर और जवानी और जूनून क़ा ऐसा हंगामा मुझ पर सवार था कि कभी-कभी मैं नंगे पाँव महल्लों-महल्लों, बाग़ों-बाग़ों और बागीचों-बागीचों टहलता ही रह जाता था. न अपने या पराये क़ी ओर कोई शिष्टता रह गई थी और न अपनी या दूसरे क़ी कोई परवा. इस तुरकी शेर के शब्दों में -
                          "आशिक़ ऊजग़ाच बेख़ुद व दीवाना बूलदूम बीलमादूम
                           कीम परी-रुखसारालगर इश्केग़ बू ईरमीश ख़ास !"
                          (न था मालूम, यह गत आशिक़ी में मैं बना बैठा -
                           परी चेहरों क़ा आशिक़ बेख़ुदो-दीवाना होता है !)
कभी तो मैं पागलों क़ी तरह जंगलों-पहाड़ों में मारा-मारा फिरता था और कभी बाग़ों और महल्लों में गली-गली भटकता रहता था. न तो भटकने फिरने पर अपना बस था और न ही मन मारे बैठे रहने पर. न चलने में चैन मिलती थी (मिलता था) न ठहरने में.
                           " नी बागे रग़ा कुवातीम बार नी तूरमाग़ा ताक़तीम
                             बीज़नी बूहालतक़ सीन क़ीलदीनक गिरफ़तारई कूंकूल !"
                            (जाऊँ न वह कूवत रही, ठहरूँ नहीं वह ताब
                             क्या और तू ऐ दिल मुझे बेहाल करेगा !)


                            बाबरनामा - बाबर के स्वरचित संस्मरण
                            अंग्रेज़ी अनुवाद - जॉन लीडेन और विलियम एसर्काइन
                            अंग्रेज़ी संस्करण के सम्पादक - एफ. जी. टैलबोट 
                            अनुवादक - युगजीत नवलपुरी
                            प्रकाशक - साहित्य अकादेमी, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1974

बुधवार, 4 जुलाई 2012

इल्ली-उल्ला (Illi-Ulla by Sarveshwar Dayal Saxena)


खा के रसगुल्ला
हमने किया कुल्ला
पानी में उठा बुल्ला
देख रहे मुल्ला
इल्ली-उल्ला

                           कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
                           संकलन - महके सारी गली गली (बाल कविताएँ)
                           सम्पादक - निरंकार देव सेवक, कृष्ण कुमार
                           प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, 1996

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

कच्छप-जन (Kachchhap-jan by Siddhinath Mishra)


बहुत सुखी, संतुष्ट, सफल सार्थक जीवन 
जीते हैं कच्छप-जन ये.
जब जो मरजी
कर ली जी की-
टहल लगाई जल में, थल में 
चल-बुल धाए,
चर-चुग आए,
क्या सुविधा है अहा !
जहां भी गए, लाद ले गए पीठ पर
घर
नितांत एकांत सुरक्षित.
चलते-चलते जब मन चाहा
घेंट निकाली
दुनिया देखी रंग-बिरंगी,
मुस्काए लख साथी-संगी,
चख ली प्यारी नरम हवाएं,
स्वादांतर के लिए 
कभी तो गरम हवाएं.
कोई खटका हुआ कि बस झटपट 
सिकोड़ ली गर्दन.

है महान् इतिहास,
इन्हीं के किसी पुरखे ने था
द्रुतधावी खरगोश हराया. 






                            कवि - सिद्धिनाथ मिश्र 
                            संग्रह - द्वाभा 
                            प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2012

                                    

सोमवार, 2 जुलाई 2012

मेरी ज़िंदगी में चेखव (Meri zindagi mein Chekhov by Lydia Evilov)


                                                        एक 
24 जनवरी, 1889 . बड़ी बहन  नाद्या का सन्देश आया, 'चेखव से मिलना है तो तुरन्त चली आओ.'
नाद्या का ब्याह एक बड़े अखबार के सम्पादक-प्रकाशक के साथ हुआ था....मेरी शादी हाल ही में विश्विद्यालय के एक स्नातक के साथ हुई थी, मेरे पति शिक्षामन्त्रालय में सहायक सचिव थे. और मेरे अतीत में क्या था? सिर्फ कुछ अधूरे सपने.
एक सपना मैंने देखा था-लेखिका बनने का. कहानी और कविता मैं बचपन से ही लिखने लगी थी. अपना लेखन मुझे जीवन में सबसे ज़्यादा प्यारा था, संसार में साहित्य ही मेरा सब कुछ था. मैं बहुत पढ़ाकू भी थी और चेखान्ते (लेखन के आरम्भिक वर्षों में चेखव का छद्म नाम) मेरे प्रिय लेखकों में थे, उनकी कहानियाँ, नाद्या के पति सिरगेयी के अखबार में भी छपती थीं-और हर कहानी मुझे छू जाती थी.
...और अब यह सन्देश
...मेरे पति मिख़ाइल व्यस्त थे और चेखव से मिलने को ख़ास उत्सुक भी नहीं थे. इसलिए मैं अकेली ही गई.
...खाने की मेज़ पर चेखव मेरी बगल में बैठे.
"ये लिखती भी हैं," सिरगेयी ने चेखव को बताने की कृपा की, "इनके अन्दर कुछ है ज़रूर...एक चिंगारी...और विचार भी...ज़्यादा तो नहीं पर हर कहानी में कुछ-न-कुछ होता ज़रूर है."
चेखव मुस्कुराते हुए मेरी ओर घूमे, "लेखक को वही लिखना चाहिए जो उसने देखा और भोगा है-पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ. मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि किसी कहानी के पीछे मेरा अभिप्राय क्या था. ऐसे प्रश्नों का उत्तर मैं कभी नहीं देता. मेरा काम है लिखना और," वे मुस्कुराकर बोले, "मैं जिस विषय पर कहो लिख सकता हूँ. कहो तो इस बोतल पर 'बोतल' शीर्षक की कहानी लिखकर दिखाऊँ. जीवन का अनुभव विचार को जन्म दे सकता है, लेकिन विचार अनुभव को जन्म नहीं दे सकता."
एक मेहमान की आपत्ति को उन्होंने ध्यान से सुना, सोचते हुए माथे पर कुछ बल पड़े फिर वे कुर्सी की पीठ के साथ टिक गए.
"आपका कहना बिलकुल सही है," वे बोले, "लेखक सिर्फ़ चहकनेवाली चिड़िया नहीं है. फिर मैं कहाँ कहता हूँ कि हर समय चहको. मैं ज़िन्दा हूँ, सोचता हूँ, लड़ता हूँ, सहता हूँ तो यह सब मेरे लेखन में झलकेगा ही. मैं जीवन को उसके यथार्थ रूप में कलात्मक दृष्टि से तुम्हारे सामने रखूँगा...और तुम उसमें वह सब देख पाओगे जो तुम्हें पहले नहीं दिखाई दिया था ; उसकी तमाम विसंगतियां और असामान्यताएँ..."
                                                            तीन 
जनवरी, 1892 .सिरगेयी के अखबार की स्थापना की पच्चीसवीं वर्षगाँठ का समारोह था.
...चेखव ने कहा,..."तीन साल पहले जब हम मिले थे तो क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगा था कि हमारा परिचय पहली बार हुआ हो, मगर हमारी जान-पहचान पुरानी है और हमने एक लम्बे बिछोह के बाद एक-दूसरे को पाया है?"
                                                             छह 
...वे बोले..."क्या तुम जानती हो मैं तुम्हें कितनी गहराई, कितनी शिद्दत से प्यार करता था ? हाँ, मुझे तुमसे प्यार था."
...मेरे कान झनझना रहे थे...एकदम हतबुद्धि हो गई थी मैं-न कुछ समझ पा रही थी न कह पा रही थी.
                                                             सात 
...फिर कैसे, क्या हुआ, मुझे पता ही नहीं चला. बस एक झोंका सा आया...यह झोंका था मेरे प्यार और विश्वास का, मेरे गहरे दर्द का.
...आखिर मैंने इरादा पक्का किया और एक जौहरी की दुकान पर गई. वहाँ मैंने घड़ी की चैन में पहनने के लिए पुस्तक की आकृति का एक पेंडेंट बनाने का आदेश दिया. पुस्तक के एक ओर लिखवाया-'चेखव की लघुकथाएँ. और दूसरी ओर 'पृष्ठ 267', पंक्ति 6 और 7.  
चेखव यदि अपनी किताब में ये पंक्तियाँ खोजते तो पढ़ते :
"अगर कभी मेरे प्राणों की जरूरत हो तो आना और निस्संकोच ले लेना."


 लेखिका - लीडिया एविलोव
 संग्रह - मेरी ज़िंदगी में चेखव
 अनुवाद - रंजना श्रीवास्तव (डेविड मैगार्शक के अंग्रेज़ी अनुवाद से पुनः प्रस्तुति)
 सम्पादक - राजेन्द्र यादव 
 प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2005

रविवार, 1 जुलाई 2012

पवित्रता का दौरा (Pavitrata ka daura by Harishankar Parsai)


सुबह की डाक से चिट्ठी मिली, उसने मुझे इस अहंकार में दिन-भर उड़ाया कि मैं पवित्र आदमी हूँ क्योंकि साहित्य का काम एक पवित्र काम है. दिन-भर मैंने हर मिलनेवाले को तुच्छ समझा. मैं हर आदमी को अपवित्र मानकर उससे अपने को बचाता रहा. पवित्रता ऐसी कायर चीज है कि सबसे डरती है और सबसे अपनी रक्षा के लिए सचेत रहती है. अपने पवित्र होने का अहसास आदमी को ऐसा मदमाता बनाता है कि वह उठे हुए साँड की तरह लोगों को सींग मारता है, ठेले उलटाता है, बच्चों को रगेदता है. पवित्रता की भावना से भरा लेखक उस मोर जैसा होता है जिसके पाँव में घुँघरू बाँध दिये गये हों. वह इत्र की ऐसी शीशी है जो गन्दी नाली के किनारे की दुकान पर रखी है. यह इत्र गन्दगी के डर से शीशी में ही बन्द रहता है.
वह चिट्ठी साहित्य की एक मशहूर संस्था के सचिव की तरफ से थी. मैं उस संस्था का, जिसका लाखों का कारोबार है, सदस्य बना लिया गया हूँ. स्थायी समिति का सदस्य हूँ....


         लेखक - हरिशंकर परसाई 
         व्यंग्य-संग्रह - प्रेमचंद के फटे जूते 
         प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, छठा संस्करण, 2009