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गुरुवार, 19 जुलाई 2012

कृमिभैषज्यकर्म सूक्त (A hymn for the destruction of parasitic worms from Atharvaveda)



अस्येन्द्र कुमारस्य क्रिमीन् धनपते जहि l
हता विश्वा अरातय उग्रेण वचसा मम ll2ll
यो अक्ष्यौ परिसर्पति यो नासे परिसर्पति l
दतां यो मध्यं गच्छति तं क्रिमिं जम्भयामसि ll3ll   
सरूपौ द्वौ विरूपौ द्वौ कृष्णौ द्वौ रोहितौ द्वौ l
बभ्रुश्च बभ्रुकर्णश्च गृध्रः कोकश्च ते हताः ll4ll     
ये क्रिमयः शितिकक्षा ये कृष्णाः शितिबाहवः l      
ये के च विश्वरूपास्तान् क्रिमीन् जम्भयामसि ll5ll
हतो राजा क्रिमीणामुतैषां स्थपतिर्हतः l   
हतो हतमाता क्रिमिर्हतभ्राता हतस्वसा ll11ll 
हतासो अस्य वेशसो हतासः परिवेशसः l  
अथो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिमयो हताः ll12ll 
सर्वेषां च क्रिमीणां सर्वासां च क्रिमीणाम् l
भिनद्म्यश्मना शिरो दहाम्यग्निना मुखम्  ll13ll


शिशुओं में विद्यमान कृमियों को दूर करने के मंत्र -


इस कुमार के कृमियों को तू धनपति इन्द्र, कर विनष्ट तुरत
मेरे उग्र  'वचस्' से ये सारे हैं हो गए निहत l
जो आँखों में रेंग रहा है, जो कि नाक में रेंगे दुष्ट
घूम रहा है जो दांतों में, उस कृमि को करते हम नष्ट l 
दो सरूप हैं, दो विरूप हैं, दो काले, दो हैं लोहित
भूरा, भूरे कानों वाला, गृध्र, कोक - सब हुए निहत l
जो कृमि श्वेत कांख वाले, जो काले, श्वेत बांह वाले 
विश्वरूप जो, उन सबको हम क्षण में यहाँ मार डालें l
हत कृमियों का राजा, इनका हत होकर सरदार गिरा  
हत भ्राता, हत है स्वसा, स्वयं हत कृमि गिरा पड़ा l 
इस कृमि के पास दूर के साथी, सभी हो गए हैं हत 
है जिनका आकार सूक्ष्म, वे सब कृमि हत हो गए तुरत l
सब नर मादा कृमियों का सर मैं हूँ फोड़ रहा पत्थर से 
और अग्नि से जला रहा मुख, (दूर रहें ये मेरे घर से) l


     अथर्ववेद (शौनकीय), पञ्चम काण्ड, पञ्चम अनुवाक, द्वितीय सूक्त
     मंत्र संख्या- 2,3,4,5,11,12,13
     मूल - सायण भाष्य सहित और विश्वबन्धु द्वारा संपादित 
     प्रकाशक - विश्वेरानन्द वैदिक शोध संस्थान, होशियारपुर, 1960
     पुस्तक - प्राचीन भारतीय साहित्य का इतिहास
     हिंदी अनुवाद - विशिष्ट अनुवाद समिति 
     लेखक - एम. विंटरनिट्ज  
     प्रकाशक - मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1961 

बुधवार, 18 जुलाई 2012

सहारा (A helping hand by Miroslav Holub)



हमने घास को  सहारे का हाथ  दिया -
और वह मकई बन गई,
हमने आग को सहारे का हाथ दिया -
और वह रॉकेट बन गई.
झिझकते  हुए,
बचा-बचाकर,
हम सहारा देते हैं
लोगों को,
कुछ लोगों को...

                       चेक कवि - मिरोस्लाव होलुब, 1961
                       संग्रह - पोएम्स : बिफोर एंड आफ्टर
                       चेक से अंग्रेज़ी अनुवाद - जॉर्ज थाइनर
                       प्रकाशक - ब्लडैक्स बुक्स, ग्रेट ब्रिटेन, 1990
                       अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

सुरक्षित (Safe by Charles Bukowski)



बगल का घर मुझे 
उदास करता है.
पति-पत्नी, दोनों तड़के जगते हैं और 
काम पर निकल जाते हैं
वे शाम ढलते घर आ जाते हैं.
उन्हें एक  छोटा 
लड़का और लड़की है.
रात नौ बजे तक घर की सारी बत्तियां 
बुझ जाती  हैं.
अगली सुबह दोनों, पति और 
पत्नी फिर जागते हैं तड़के   और जाते हैं 
काम पर.
वे शाम ढलते वापस आते हैं.
नौ बजे रात तक सारी बत्तियां 
बुझ जाती हैं.

बगल का घर मुझे 
उदास करता है. 
लोग  भले लोग हैं, मैं उन्हें 
पसंद करता हूँ.

   लेकिन मैं महसूस करता हूँ उन्हें डूबते हुए.
   और मैं उन्हें बचा नहीं सकता. 

   वे जी रहे हैं.
   वे 
   बेघर नहीं हैं.

  लेकिन  इसकी कीमत 
  भीषण है.

  कभी-कभी दिन के वक्त 
  मैं घर को देखता हूँ
  और वह घर 
  मुझे देखता है
  और वह घर 
  रोता है, हाँ, हाँ!, मैं 
  इसे महसूस करता हूँ.

  वह घर उदास है
  उसमें रहने वाले लोगों के लिए
  और मैं भी
  और हम दोनों एक-दूसरे को देखते हैं
  और गाड़ियां सड़क पर आती जाती हैं,
  नावें बन्दरगाह पार करती हैं
  और ऊंचे ताड़-वृक्ष कोंचते हैं
  आसमान को
  और आज रात नौ बजे 
  बत्तियां बुझ जाएँगी,
  और न सिर्फ उस घर में 
  और न सिर्फ इस शहर में.
  सुरक्षित जिंदगियां छिपाए हुए 
  लगभग 
  बंद,
  सांसें
  देहों की और
  कुछ नहीं. 

              
               अमरीकी कवि - चार्ल्स बुकोव्स्की 
               संकलन - द प्लेज़र्स ऑफ द डैम्ड, पोएम्स 1951-1993

               संपादक - जॉन मार्टिन
               प्रकाशक - हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स, न्यूयार्क, 2008
               अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 

सोमवार, 16 जुलाई 2012

पिप्पी (Pippi Longstocking by Astrid Lindgren)


पिप्पी के बारे में टीचर ने शहर के लोगों से भी सुन रखा था.वह एक दयालु और खुशमिजाज टीचर थी, इसलिए उसने तय कर लिया कि वह पिप्पी को स्कूल में संतुष्ट रखेगी.
किसी के कुछ कहे बिना पिप्पी एक खाली कुरसी पर जा कर बैठ गई. लेकिन टीचर ने उसकी लापरवाही पर ध्यान नहीं दिया. प्यार से बोली, "पिप्पी बेटे, स्कूल में तुम्हारा स्वागत है. आशा है तुम यहाँ खुश रहोगी और बहुत कुछ सीखोगी."
"बिलकुल ! और मेरी आशा है कि मुझे क्रिसमस की छुट्टियाँ मिलेंगी," पिप्पी बोली. "इसीलिए तो मैं आई हूँ. सबसे बढ़कर इन्साफ़ !"
"पहले तुम अपना पूरा नाम बताओ," टीचर ने कहा, "और फिर मैं तुमको स्कूल में दाखिल कर देती हूँ."
"मेरा नाम पिप्पीलोटा सामानीया चिक्किलीना पुदीनाहारी इफ़्राइमपुत्री लंबेमोज़े है, बेटी कप्तान इफ्राइम लंबेमोज़े की, जो समुंदर के बादशाह थे और अब हैं दक्षिणी समुद्र के राजा. पिप्पी मेरा उपनाम है क्योंकि बाबा को लगा कि पिप्पीलोटा नाम बहुत लंबा है."
"अच्छा," टीचर ने कहा. "चलो, हम भी तुम्हें पिप्पी ही बुलाते हैं. अब हम तुम्हारी ज्ञान की परिक्षा लेते हैं. तुम तो काफ़ी बड़ी हो, तुमें बहुत कुछ मालूम होगा. गणित से शुरू करते हैं. तो बताओ, 7 और 5 कितने हुए ?"
पिप्पी ने उनको आश्चर्य और गुस्से से देखा. फिर बोली, "तुम्हें नहीं पता तो मैं थोड़े ही जोड़नेवाली हूँ."
बच्चे घबराकर पिप्पी को देखने लगे. टीचर ने समझाया कि स्कूल में जवाब देने का यह तरीका नहीं है. और टीचर को 'तुम' करके नहीं बुलाते, उनको 'मिस' कहते हैं.
पिप्पी को खेद हुआ. वह बोली, "सॉरी. मुझे मालूम नहीं था. दुबारा ऐसा नहीं करूँगी."
"और करना भी नहीं चाहिए," टीचर ने कहा. "ठीक है, तो मैं बताती हूँ, 7 और 5 होते हैं 12 ."
"देखा," पिप्पी बोली. "तुम्हें मालूम था तो पूछा क्यों ?उफ़ ! मैं बिलकुल बुद्धू हूँ ! फिर से तुम्हें 'तुम' बोल दिया. माफ़ करो." ऐसा कहकर उसने अपने आप को चिहुँटा.
टीचर ऐसे पेश आई जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं. वह बोली, "अच्छा तो पिप्पी बताओ, तुम्हें क्या लगता है, 8 और 4 कितने होते हैं ?"
"लगभग 67 ," पिप्पी बोली.
"बिलकुल नहीं," टीचर ने कहा ."8 और 4 होते हैं 12 ."
"चल, चल मेरी अम्मा, तुम हद से बाहर जा रही हो,: पिप्पी बोली. "तुम्हीं ने कहा कि 7 और 5 होते हैं 12 . स्कूल में भी कुछ तरीका होना चाहिए. इस तरह के बचपने में तुम्हें दिलचस्पी है तो तुम क्यों न कोने में बैठी गिनती करती रहो और हम शांति से छोन-छुँई खेलते हैं. ओहो, फिर से 'तुम' कह दिया !" पिप्पी भयभीत हो बोली. "इस बार भी माफ़ कर सकती हो ? आगे से याद रखने की कोशिश करूँगी."
टीचर मान गई.

              लेखिका - ऐस्ट्रिड लिंडग्रन  
              बाल उपन्यास - पिप्पी लंबेमोज़े, मूल में पिप्पी लौंगस्टरुम्प 
              स्वीडिश भाषा से हिन्दी अनुवाद - संध्या राव और मेटा औट्टोस्सौन
              प्रकाशक - तूलिका पब्लिशर्स, चेन्नई , पहला संस्करण - 2004  

रविवार, 15 जुलाई 2012

अफ़सोस, हम इतना बढ़िया आविष्कार थे (A Pity, We Were Such a Good Invention by Yehuda Amichai)



उन्होंने काट कर अलग कर दीं
तुम्हारी जांघें मेरे नितम्बों से
जहां तक मेरी बात है
वे सब सर्जन हैं. सब के सब.

उन्होंने काट कर अलग कर दिया हमें
हर एक को दूसरे से .
जहां तक मेरी बात है
वे सब इंजीनियर हैं. सब के सब.

अफ़सोस. हम इतना बढ़िया
और प्यारा आविष्कार थे.
एक मर्द और एक औरत से बना एक हवाईजहाज.
पंख और बाकी सारा कुछ.
हम धरती के ज़रा ऊपर मंडराए.

यहाँ तक कि हम थोड़ा उड़े भी.
 


                     इस्राइली कवि येहूदा आमिखाई
                  संकलन - सेलेक्टेड पोएम्स
                  संपादक - टेड ह्यूज़ और डैनियल वेस्बोर्ट
                  हिब्रू से अंग्रेज़ी अनुवाद - आसिया गुतमान्न और टेड ह्यूज
                  प्रकाशक - फेबर एंड फेबरलंदन , 2000 
                  अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद
                                  

शनिवार, 14 जुलाई 2012

क़ब्रिस्तान में औरतों की रूहें (Kabristan mein auraton ki roohein by Zahida Hina)


...ख़बर कुछ यूँ है कि कराची से पाँच सौ किलोमीटर के फ़ासले पर ताल्लुक़ा हेडक्वार्टर ढरकी से सत्तर किमी.दूर यूनियन कौंसिल बरुथा में चार कब्रिस्तानों का पता चला है, जिनमें लगभग दो सौ औरतें दफ़न हैं, इन कब्रिस्तानों में आम लोग और बस्ती वाले दाख़िल नहीं हो सकते. यहाँ सिर्फ़ वही लोग आते हैं, जो यहाँ किसी औरत को लाकर क़त्ल करते हैं और फिर यहीं दफ़न कर देते हैं. इन क़ब्रिस्तानों की कोई चारदीवारी नहीं है और इनमें हर तरफ़ झाड़ियाँ उगी हुई हैं. आसपास के आठ-दस गाँव ख़ाली हो चुके हैं, क्योंकि इन गाँव वालों का कहना है कि रात में उन्हें क़त्ल होने वाली औरतों की रूहें नज़र आती हैं और उनके रोने की आवाजें सुनाई देती हैं.
   21 वीं सदी में हमारे यहाँ की बेशुमार गरीब और पिछड़ी हुई औरतों का यह मुक़द्दर है. उनके अंजाम पर उदास होते हुए मुझे भोपाल की रियासत याद आती है, जहाँ एक सदी से ज्यादा सिर्फ़ औरतों ने हुकूमत की. प्रिंसेस आबिदा सुल्तान याद आती हैं, जिनकी खुद-नविश्त (आत्मकथा)  उनकी मौत से कुछ दिन पहले 'मेमोरीज़ ऑफ़ अ रीबेल प्रिंसेस' के नाम से आई है. भोपाल की बेगम आबिदा सुल्तान ने अगर एक बाग़ी शहज़ादी की ज़िंदगी गुज़ारी तो इस बारे में हैरान नहीं होना चाहिए. फ़ारसी, अरबी, उर्दू और अंग्रेज़ी उन्हें बचपन से पढ़ाई गई. लकड़ी का काम और जस्त के बरतन बनाना सिखाया गया.वह कमाल की निशानेबाज़ और घुड़सवार थीं. घुड़सवारी उन्होंने उस उम्र में सीखी, जब उन्होंने चलना भी नहीं शुरू किया था. वह हॉकी और क्रिकेट खेलतीं, मौसिक़ी की शौक़ीन थीं. हारमोनियम बजातीं और हर एडवेंचर में आगे-आगे रहतीं. कार चलातीं, तो उसकी रफ़्तार से साथ बैठने वालों की चीख़ें निकल जातीं. मुहिमजूई (एडवेंचर) उनके मिज़ाज का हिस्सा थी. ऐसे में साबिक़ (पूर्व) बेगम भोपाल, सुल्तान जहाँ बेगम की निगरानी में कड़े परदे की पाबंदी करना उनके लिए एक सज़ा थी. बारह बरस की उम्र में जाकब वह वाली अहद (उत्तराधिकारी) नामज़द की गईं, तो शाही जुलूस में वह इस हुलिए में शामिल थीं कि उनका पूरा वजूद एक काले बुरके में लिपटा हुआ था और सियाह बुरके की टोपी पर ताज जगमगा रहा था. 
   यह सब कुछ आबिदा सुल्तान के लिए अज़ाब से कम न था. आख़िरकार उन्होंने रस्सियाँ तुड़ाईं, कमर से नीचे आने वाले बाल काटकर फेंके. पर्दा तर्क किया (छोड़ा) और भोपाल की सड़कों पर मोटरसाइकिल दौडाने लगीं. एक मर्तबा घर से फ़रार हुईं और भेस बदलकर हवाई जहाज़ उड़ाना सीखती रहीं. उधर भोपाल के नवाब उनकी तलाश में हिंदुस्तान भर की ख़ाक छानते रहे. शादी हुई, एक बेटा पैदा हुआ. शहज़ादी की शादी को नाकाम होना था, सो हो गई...
   प्रिंसेस आबिदा सुल्तान की खुद-नविश्त हिन्दुस्तानी अशराफिया (खानदानी लोग) की एक ऐसी औरत की कहानी है, जिसने बग़ावत के रास्ते पर क़दम रखा और अपने बाद आने वालियों के लिए नयी राहें खोलीं. यह खुद-नविश्त हमारे सामने भोपाल के महलात से मलीर (कराची) के मज़ाफात (ग्रामीण क्षेत्र) और मुल्क चीन से अमेरिका तक ज़िंदगी गुज़ारने वाली ऐसी लडकी का किस्सा है, जिसने उस अहद (ज़माने) की लड़कियों और औरतों की आँखों में ख़्वाबों के जाने कितने चिराग़ जलाए. लेकिन मुझे घोटकी (ढरकी ?) के क़ब्रिस्तान में दफ़न वे कारी औरतें याद आती हैं, जिनके लिए किसी आँख से आँसू नहीं गिरते और जिनकी क़ब्र पर कोई चिराग़ नहीं जलता . 
                                                                                           14 अगस्त, 2005

                               
                    लेखिका  - जाहिदा हिना
                    संकलन - पाकिस्तान डायरी
                    प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2006

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

चेतावनी (Warning by Taha Muhammad Ali)



शिकार के शौकीनो,
और अपना शिकार तलाशते नौसिखुओ :
अपनी  राइफलों को न साधो
मेरी खुशी पर ;
जिसकी औकात
बुलेट के दाम बराबर नहीं
( तुम उसे बेकार ही करोगे)
जो तुम्हें इतनी फुर्तीली और खूबसूरत लगती है
हिरनौटे की तरह,
और उड़ती फिरती है
हर तरफ,
एक तीतर की तरह,
खुशी नहीं है.
यकीन करो मेरा :
मेरी खुशी का
खुशी से कोई वास्ता ही  नहीं.

    



फिलिस्तीनी कवि - ताहा मुहम्मद अली
संग्रह - ‘सो व्हाट’, 1971 से 2005 के बीच की नई और चुनींदा कविताएँ अरबी से अंग्रेज़ी अनुवाद और चयन - पीटर कोले, याह्या हिलाज़ी , गब्रैल लेविन
प्रकाशक - कौपर कन्योन प्रेस, वाशिंगटन, 2006
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद


ताहा मुहम्मद अली इस्राइली हमले के चलते कभी के ऐतिहासिक शहर सेप्फोरिस के स्थल पर बसे गाँव सफ्फुरिया से बेवतन होकर लेबनान में रहे. फिर उन्होंने नाज़ेरथ में घर बसाया.