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शनिवार, 12 जनवरी 2013

मकई का भूंजा (Makai ka bhoonja by Siddhinath Mishra)


स्वाद में घुलती हुई
सोंधी गरम गंध है
जीभ पर -

नवान्न की गंध,
पकती जमीन की गंध,
पके दानों की गंध,

तपे बालू की गंध,
और बालू पर से कभी की बह चुकी
किसी भरी-पूरी नदी की गंध।

तमाम गंध स्मृतियां
घुल-मिलकर
रच रही हैं जो स्वाद
जीभ पर -
नहीं आ पा रहा
उसका नाम।

उस नाम के लिए
मगज क्या मारना,
आप भी आइए
और चाव से चबाइए।

कवि - सिद्धिनाथ मिश्र 
संग्रह - द्वाभा 
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2010


शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

मेरा पता (Mera pata by Amrita Pritam)

आज मैंने
अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है
तो हर देश के, हर शहर की,
हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है, एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रूह की झलक पड़े
             - समझना वह मेरा घर है।

कवयित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

सोमवार, 7 जनवरी 2013

हम दोनों हैं दुखी (Hum donon hain dukhi by Trilochan)

हम दोनों हैं दुखी। पास ही नीरव बैठें,
बोलें नहीं, न छुएँ। समय चुपचाप बिताएँ,
अपने अपने मन में भटक भटककर पैठें
उस दुख के सागर में जिसके तीर चिताएँ
अभिलाषाओं की जलती हैं धू धू धू धू।
मौन शिलाओं के नीचे दफ़ना दिये गये
हम, यों जान पड़ेगा। हमको छू छू छू छू
भूतल की उष्णता उठेगी, हैं किये गये
खेत हरे जिसकी साँसों से। यदि हम हारें
एकाकीपन से गूँगेपन से तो हम से
साँसें कहें, पास कोई है और निवारें
मन की गाँस-फाँस, हम ढूँढें कभी न भ्रम से।
गाढे दुख में कभी-कभी भाषा छलती है
संजीवनी भावमाला नीरव चलती है।


कवि - त्रिलोचन 
संकलन - त्रिलोचन : प्रतिनिधि कविताएँ 
संपादक - केदारनाथ सिंह 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1985

शनिवार, 5 जनवरी 2013

औरत की ज़िन्दगी (Aurat ki zindagi by Raghuvir Sahay)

कई कोठरियाँ थीं क़तार में
उनमें किसी में एक औरत ले जायी गयी
थोड़ी देर बाद उसका रोना सुनाई दिया

उसी रोने से हमें जाननी थी एक पूरी कथा
उसके बचपन से जवानी तक की कथा
                              
                (1972)
कवि - रघुवीर सहाय 

संकलन - रघुवीर सहाय : प्रतिनिधि कविताएँ 

संपादक - सुरेश शर्मा 

प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1994




शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

भैणाँ मैं कत्तदी कत्तदी हुट्टी (Bhainan main kattadi kattadi hutti by Bulleh Shah)



                 भैणाँ मैं कत्तदी कत्तदी हुट्टी l
पीहड़ी पिच्छे पिछावाड़े रहि गई,
हत्थ विच्च रहि गई जुट्टी l
अग्गे चरखा पिच्छे पीहड़ा 
मेरे हत्थों तन्द तरूटी l
                 भैणाँ मैं कत्तदी कत्तदी हुट्टी l
दाज जवाहर असाँ की करना,
जिस प्रेम कटवाई मुट्ठी l
उहो चोर मेरा पकड़ मँगाओ 
जिस मेरी जिन्द कुट्ठी l
                 भैणाँ मैं कत्तदी कत्तदी हुट्टी l
भला होया मेरा चरखा टुट्टा,
मेरी जिन्द अजाबों छुट्टी l
बुल्ला सहु ने नाच नचाए,
ओत्थे धुम्म कड़ कुट्टी l
                 भैणाँ मैं कत्तदी कत्तदी हुट्टी l

हुट्टी = थक गई ;   तरूटी = टूटी ;   कुट्टी = डंके की चोट 

रचनाकार - बुल्ले शाह
संकलन - बुल्लेशाह की काफियां
संपादक - डा. नामवर सिंह 
श्रृंखला संपादक - डा. मोहिन्द्र सिंह 
प्रकाशक - नेशनल इंस्टीट्यूट आफ पंजाब स्टडीज़ के सहयोग से 
अनामिका पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, 2003   

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

वाणी की दीनता (Vani ki deenata by Bhawaniprasad Mishra)


वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l
कहने में अर्थ नहीं 
कहना पर व्यर्थ नहीं 
मिलती है कहने में 
एक तल्लीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

आस-पास भूलता हूँ 
जग भर में झूलता हूँ ;
सिन्धु के किनारे, कंकर 
जैसे शिशु बीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

कंकर निराले नीले 
लाल सतरंगी पीले 
शिशु की सजावट अपनी,
शिशु की प्रवीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

भीतर की आहट भर 
सजती है सजावट पर 
नित्य नया कंकर क्रम,
क्रम की नवीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

वाणी को बुनने में ;
कंकर के चुनने में 
कोई उत्कर्ष नहीं 
कोई नहीं हीनता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

केवल स्वभाव है 
चुनने का चाव है 
जीने की क्षमता है 
मरने की क्षीणता l
वाणी की दीनता 
अपनी मैं चीन्हता l

कवि - भवानीप्रसाद मिश्र 
संकलन - दूसरा सप्तक 
संपादक - अज्ञेय 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, दूसरा पेपरबैक संस्करण - 2002


बुधवार, 2 जनवरी 2013

भेड़ों का रखवाला-9 (The keeper of sheep by Fernando Pessova)

मैं भेड़ों का रखवाला हूँ l
भेड़ें हैं मेरे विचार
और हर विचार एक संवेदना l
मैं सोचता हूँ अपनी आँखों से और अपने कानों से
और अपने हाथों और पैरों से
और अपनी नाक और अपने मुँह से l

एक फूल को सोचना है उसे देखना और सूँघना 

और एक फल को खाना है उसके मायने जानना।

यही वजह है कि किसी एक गर्म दिन
जिससे मैं इतना आनंदित होता हूँ
मैं उदास महसूस करता हूँ,
और मैं घास पर लेट जाता हूँ
और अपनी गरमाई आँखें मूँद लेता हूँ,
तब मैं महसूस करता हूँ अपनी लेटी हुई पूरी देह यथार्थ में,
मैं सत्य को जानता हूँ, और मैं खुश हूँ l

पुर्तगाली कवि - फ़र्नान्दो पेसोवा (1888-1935)
पुर्तगाली से अंग्रेज़ी अनुवाद - रिचर्ड ज़ेनिथ
प्रकाशक - ग्रोव प्रेस, न्यूयार्क, 1998
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद