स्वाद में घुलती हुई
सोंधी गरम गंध है
जीभ पर -
नवान्न की गंध,
पकती जमीन की गंध,
पके दानों की गंध,
तपे बालू की गंध,
और बालू पर से कभी की बह चुकी
किसी भरी-पूरी नदी की गंध।
तमाम गंध स्मृतियां
घुल-मिलकर
रच रही हैं जो स्वाद
जीभ पर -
नहीं आ पा रहा
उसका नाम।
उस नाम के लिए
मगज क्या मारना,
आप भी आइए
और चाव से चबाइए।
कवि - सिद्धिनाथ मिश्र
सोंधी गरम गंध है
जीभ पर -
नवान्न की गंध,
पकती जमीन की गंध,
पके दानों की गंध,
तपे बालू की गंध,
और बालू पर से कभी की बह चुकी
किसी भरी-पूरी नदी की गंध।
तमाम गंध स्मृतियां
घुल-मिलकर
रच रही हैं जो स्वाद
जीभ पर -
नहीं आ पा रहा
उसका नाम।
उस नाम के लिए
मगज क्या मारना,
आप भी आइए
और चाव से चबाइए।
कवि - सिद्धिनाथ मिश्र
संग्रह - द्वाभा
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2010