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सोमवार, 21 जनवरी 2013

हस्ताक्षर (Hastakshar by Kedarnath Singh)


बालू पर हवा के 
असंख्य हस्ताक्षर थे 
और उन्हें देखकर हैरान था मैं 
कि मेरा हस्ताक्षर 
हवा के हस्ताक्षर से 
कितना मिलता है !

कैसे हुआ यह ? 
क्या मैंने हवा की 
नक़ल की है 
या हवा ने चुरा लिया है 
मेरा हस्ताक्षर ?

दोनों में से 
एक-न-एक को 
जाली ज़रूर होना चाहिए 
मैंने सोचा 

पर अब सवाल यह था 
कि तय कैसे हो 
और हो तो किस अदालत में 
कि कौन-सा हस्ताक्षर जाली है 

कवि - केदारनाथ सिंह 
संकलन - उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1995

रविवार, 20 जनवरी 2013

अतुकांत चंद्रकांत (Atukant Chandrakant by Raghuvir Sahai)


चंद्रकांत बावन में प्रेम में डूबा था 
सत्तावन में चुनाव उसको अजूबा था 
बासठ में चिंतित उपदेश से ऊबा था 
सरसठ में लोहिया था और ...और क्यूबा था 
फिर जब बहत्तर में वोट पड़ा तो यह मुल्क नहीं था 
हर जगह एक सूबेदार था हर जगह सूबा था 

अब बचा महबूबा पर महबूबा था कैसे लिखूँ 


कवि - रघुवीर सहाय  
संकलन - रघुवीर सहाय : प्रतिनिधि कविताएँ  
संपादक - सुरेश शर्मा  
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1994




शनिवार, 19 जनवरी 2013

हम उनसे अगर (Hum unse agar by Ibne Insha)


हम उनसे अगर मिल बैठते हैं क्या दोष हमारा होता है
कुछ अपनी जसारत (दिलेरी) होती है कुछ उनका इशारा होता है

कटने लगीं रातें आँखों में, देखा नहीं पलकों पर अक्सर 
या शामे-ग़रीबाँ का जुगनू या सुब्ह का तारा होता है

हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके
ऐ बंजारो हम लोग चले, हमको तो ख़सारा (नुक़सान) होता है

दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए, कुछ शे'र कहे कुछ कॉफ़ी पी
पूछो जो मआश (आजीविका) का इंशा जी यूँ अपना गुज़ारा होता है 

शायर - इब्ने इंशा (1927-1978) 
किताब - इब्ने इंशा : प्रतिनिधि कविताएँ
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स , दिल्ली, पहला संस्करण - 1990

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

अँधेरे में (Andhere mein by Shakti Chattopadhyay)


हाथ पर 
हाथ !
अँधेरे में अचानक 
यह किसने रख दिया 
मेरे हाथ पर हाथ !

कौन है यह ?
बताओ बताओ 

शब्द नहीं 
कोई भी शब्द नहीं 
शब्द नहीं 
कोई भी शब्द नहीं l

कवि - शक्ति चट्टोपाध्याय 
बांग्ला से हिन्दी अनुवाद - केदारनाथ सिंह 
संकलन - शंख घोष और शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 1987

बुधवार, 16 जनवरी 2013

हृदय(Poems by Antonio Porchia)


हृदय को घायल करना उसे रचना है l

*  *  *

एक बड़ा हृदय बहुत थोड़े से भरा जा सकता है l

*  *  *

एक भरे हुए हृदय में सब चीज़ों के लिए जगह होती है और एक खाली हृदय में किसी चीज़ के लिए जगह नहीं होती। कौन समझता है ?


अर्जेंटीनी कवि - अन्तोनियो पोर्किया (1885-1968)
स्पैनिश भाषा का मूल काव्य संकलन 'बोसेज़' (आवाज़ें) 
स्पैनिश से अंग्रेज़ी अनुवाद - डब्ल्यू. एस. मर्विन 
अंग्रेज़ी से हिन्दी रूपांतर - अशोक वाजपेयी 
हिन्दी संकलन - हम छाया तक नहीं 
प्रकाशक - यात्रा बुक्स, दिल्ली, 2013

पोर्किया की कविताएँ कुल एक या दो पंक्तियों की हैं। उनकी खासियत बताते हुए अशोक वाजपेयी कहते हैं, "एक बेहद बड़बोले समय में ऐसी शांत कविता अप्रत्याशित उपहार की तरह है ...उसकी ईमानदारी, विनय और पारदर्शिता बेहद उजला और कुछ हमें भी उजला करता उपहार है।"

सोमवार, 14 जनवरी 2013

आम का पेड़ (Aam ka ped by Vinod Kumar Shukla)

आम का पेड़ उस जगह निष्प्रयोजन था
परंतु आम का पेड़ होने से प्रयोजन था
घोंसला था
गिलहरी शाखों की गलियों में
आते-जाते दिखती थी
कोई योजना नहीं थी
और बहुत कुछ था -
पेड़ पर ऋतुएँ होतीं
ग्रीष्म, पतझड़ होती 

धूप होती और छाया
वह एक ऐसी जगह थी
जहाँ किसी भी दिन
मेरा आना निष्प्रयोजन था
परंतु आम का पेड़ होने से
मेरा वहाँ पहली बार का आना
आये दिन का
पहला दिन हुआ था।

कवि -  विनोदकुमार शुक्ल
संकलन - अतिरिक्त नहीं
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

रविवार, 13 जनवरी 2013

एक औरत हिपेशिया भी थी (Ek aurat Hipeshiya bhee thee by Habib Tanvir)

हिपेशिया की  तक़रीर - "वो लोग जो मिर्गी के मरीज़ हैं, बस उन्हीं लोगों के अंदर चाँद अपने ठंडे असरात पैदा करता है। इसके बरअक्स वो लोग, जिनके दिमाग़ के अंदर से फूटी हुई किरनें उनके दिल तक उतर जाती हैं, वो बरगज़ीदा हैं, ऐसे ही लोगों के दिलों में वो चिनगारी होती है जिसे अक्ल कहते हैं. यही वो रौशनी है, जो दिमाग़ वाले के लिए इल्म का सबब बनती है। और जानने के लायक़ चीज़ों के लिए उनके पहचाने जाने का सबब बनती है। उसी तरह जिस तरह मामूली रौशनी हमारी नज़र में रंगों को उजागर कर देती है। रौशनी हटा लीजिए, बस फिर अँधेरे के सिवा और कुछ नहीं रह जाएगा। ...
मैं यह मानती हूँ कि कोई भी ऐसा ख़याल, जो दूसरी दुनिया का डर दिल में बिठाकर या किसी और तरीके से हुक्म लगाकर आदमी के दिमाग़ को ज़ंजीरों में जकड़ ले, वो गलत है। इससे ख़याल में बंदिश आ जाती है, तरक्क़ी के रास्ते मसदूद हो जाते हैं, रुक जाते हैं। कोई नया ख़याल पैदा होने की गुंजाइश नहीं रह जाती। नया ख़याल कहता है : अपने आपको जानो। बस नया ख़याल आज़ाद होता है। लेकिन इसका नतीजा होता है ज़िम्मेदारी। नया ख़याल अपने साथ एक ज़िम्मेदारी का अहसास पैदा करता है। या तो आप अपने ख़याल के मुताबिक़ जिएँ, और या फिर उसे खो दें, और ख़मियाज़ा भुगतें। और अगर आप अपने ख़याल के मुताबिक़ जीते हैं, तो गोया आप आज़ाद हैं। सही मायनों में आज़ाद। फिर आपको मौत भी नहीं डरा सकती, जहन्नुम भी नहीं डरा सकता, फिर दुनिया की कोई ताक़त आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।"


"दुनिया के मशहूर गणितज्ञ थियोन की बेटी हिपेशिया किसी परिचय की मोहताज नहीं है। आप जानते ही हैं कि थियो
न ने गणित और खगोल के विषय  पर बहुत महत्त्वपूर्ण किताबें लिखीं। ये विद्या उन्होंने अपनी बेटी को भी सिखाई और कुछ किताबों पर साथ मिलकर भी काम किया। उनके गुजर जाने के बाद हिपेशिया ने उनसे भी ज़्यादा तरक्की की। किताबें लिखीं और अपना नाम रोशन किया। गणित, खगोल और फ़लसफ़े के सिलसिले में इस वक्त दुनिया में हिपेशिया का सानी मौजूद नहीं।"
अक्ल की दुनिया में जिस कदर भी थी
वो सब एक शख़्स में समाई थी
           एक औरत हिपेशिया भी थी।
शक्ल महताब हुस्न की पहली
जिससे दुनिया में रोशनी फैली
          एक औरत हिपेशिया भी थी।
अक्ल की वैसी दिल की भी वैसी
उसको हर शख़्स से थी हमदर्दी
आप अपनी मिसाल थी वैसी
          एक औरत हिपेशिया भी थी।
उसके क्या-क्या हुनर मैं गिनवाऊँ
कम हैं जितना भी उसके गुण गाऊँ
          एक औरत हिपेशिया भी थी।

नाटककार - हबीब तनवीर
किताब - एक औरत हिपेशिया भी थी
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2004