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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

बोल, अरी ओ धरती, बोल ! (Bol, ari o dharti, bol by Majaz Lakhnavi)

बोल, अरी  ओ धरती, बोल 
राजसिंहासन     डाँवाडोल 

बादल, बिजली,रैन अँधियारी 
दुख  की  मारी  परजा  सारी 
बूढ़े - बच्चे   सब   दुखिया  हैं 
दुखिया  नर हैं, दुखिया नारी 
बस्ती - बस्ती   लूट  मची   है 
सब  बनिये  हैं, सब  ब्यौपारी 
                    बोल, अरी  ओ धरती, बोल 
                    राजसिंहासन     डाँवाडोल 

कलयुग  में जग  के रखवाले 
चाँदी  वाले,      सोने  वाले 
देसी   हों  या  परदेसी   हों 
नीले,   पीले,   गोरे,   काले 
मक्खी,भुनगे भिन-भिन करते 
ढूँढे   हैं   मकड़ी    के   जाले 
                   बोल, अरी ओ धरती, बोल 
                   राजसिंहासन     डाँवाडोल 

क्या अफ़रंगी, क्या तातारी 
आँख बची और बरछी मारी 
कब  तक  जनता की बेचैनी 
कब  तक जनता की बेज़ारी 
कब  तक  सरमाया  के  धंदे 
कब  तक  ये  सरमायादारी 
                  बोल, अरी ओ धरती, बोल 
                  राजसिंहासन     डाँवाडोल 


नामी और मशहूर नहीं हम 
लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम 
धोका और मज़दूरों को दें !
 ऐसे  तो मजबूर  नहीं  हम 
मंज़िल  अपने पाँव के नीचे 
मंज़िल से अब दूर नहीं हम 
                  बोल, अरी ओ धरती, बोल 
                  राजसिंहासन     डाँवाडोल 

बोल कि तेरी ख़िदमत की है 
बोल कि तेरा काम किया है 
बोल कि  तेरे  फल  खाए हैं 
बोल  कि  तेरा दूध पिया है 
बोल कि  हमने हश्र उठाया 
बोल कि  हमसे हश्र उठा है 
                 बोल कि हमसे जागी दुनिया 
                 बोल कि हमसे जागी धरती 

                 बोल, अरी ओ धरती, बोल 
                 राजसिंहासन     डाँवाडोल 
                                     
                                       - 1945


अफ़रंगी = फ़िरंगी                           सरमाया = पूँजी 
सरमायादारी = पूँजीवाद                 हश्र = क़यामत 


शायर - मजाज़ लखनवी 
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मजाज़ लखनवी 
संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - राधाकृष्ण पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 2001 
                        

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

समझदार स्त्री (Samajhdar stree by Kunwar Narayan)


वह एक समझदार स्त्री है
        जो उन लोगों को समझती है
        जो घर के कमरे में बैठे
        स्त्रियों के बहाने
        उसके बारे में बात कर रहे हैं

उनके मन में नक़ली हमदर्दी
और असली कौतूहल है,
        कि देखें उसमें कितना आत्मबल है.




कवि - कुँवर नारायण
संकलन - इन दिनों
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2002




रविवार, 21 अप्रैल 2013

चिड़ियाँ आएँगी

 
चिड़ियाँ आएँगी  
हमारा बचपन 
धूप की तरह अपने पंखों पर 
लिये हुए l 
 
किसी प्राचीन शताब्दी के 
अँधेरे सघन वन से 
उड़कर चिड़ियाँ आएँगी,
और साये की तरह 
हम पर पड़े अजब वक़्त के तिनके 
बीनकर बनाएँगी घोंसले l 
 
चिड़ियाँ लाएँगी   
पीछे छूट गए सपने,
पुरखों के क़िस्से,
भूले-बिसरे छन्द,
और सब कुछ 
हमारे बरामदे में छोड़कर 
उड़ जाएँगी l 
 
चिड़ियाँ न जाने कहाँ से आएँगी   
चिड़ियाँ न जाने कहाँ जाएँगी l 
नीम और अमरूद के वृक्षों की शाखाओं पर 
हरी पत्तियों, निबौलियों और गदराते फलों के बीच 
चिड़ियाँ समवेत गान की तरह 
हमारा बचपन हमारा जीवन 
हमारी मृत्यु 
सब एक साथ 
गाएँगी l 
 
चिड़ियाँ अनन्त हैं 
अनन्त से आएँगी 
अनन्त में जाएँगी l    
 
 
कवि - अशोक वाजपेयी (2003)
संग्रह - विवक्षा
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2006

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

गीत (Geet by Ramgopal Sharma 'Rudra')

 मेरे गीतों को भी प्यार मिलेगा क्या !!

                  कलियाँ हो जाएँगी बासी,
                  जब तक आएगी पुनवाँसी !
पतझर के काँटों में फूल खिलेगा क्या !

                  काँटे जो लगते आए हैं,
                  लाल-गुलाबी दल लाए हैं !
इनसे पत्थर का भी मर्म छिलेगा क्या !

                  सूई भी है, डोरा भी है ;
                  शशि है, और चकोरा भी है !
टाँके पाकर मेरा घाव सिलेगा क्या !
                                              - 1954




कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र 
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

बड़ी हो रही है लड़की (Badi ho rahi hai ladki by Raghuvir Sahai)


जब वह कुछ कहती है
उसकी आवाज़ में
एक कोई चीज़
मुझे एकाएक औरत की आवाज़ लगती है जो
अपमान बड़े होने पर सहेगी

वह बड़ी होगी
डरी और दुबली रहेगी
और मैं न होऊँगा
वे किताबें वे उम्मीदें न होंगी
जो उसके बचपन में थीं
कविता न होगी साहस न होगा
एक और ही युग होगा जिसमें ताक़त ही ताक़त होगी
और चीख़ न होगी

लम्बी और तगड़ी बेधड़क लड़कियाँ
धीरज की पुतलियाँ
अपने साहबों को सलाम ठोंकते मुसाहबों को ब्याहकर
आ रही होंगी जा रही होंगी
वह खड़ी लालच में देखती होगी उनका क़द

एक कोठरी होगी
और उसमें एक गाना जो ख़ुद गाया नहीं होगा किसी ने
क़ैदी से छीनकर गाने का हक़ दे दिया गया होगा वह गाना
कि उसे जब चाहो तब नहीं जब वह बजे तब सुनो
बार-बार एक-एक अन्याय के बाद वह बज उठता है

वह सुनती होगी मेरी याद करती हुई
क्योंकि हम कभी-कभी साथ-साथ गाते थे
वह सुर में मैं सुर के आसपास

एक पालना होगा
वह उसे देखेगी और अपने बचपन की यादें आयेंगी
अपने बचपन के भविष्य की इच्छा
उन दिनों कोई नहीं करता होगा
वह भी न करेगी



कवि - रघुवीर सहाय  
संकलन - रघुवीर सहाय : प्रतिनिधि कविताएँ  
संपादक - सुरेश शर्मा  
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1994



लड़की को बड़ी होने के पहले ही सबकुछ झेलना पड़ता है ! आज दिल्ली की दुर्घटना उस अंतहीन श्रृंखला की एक कड़ी है !



गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

कोई आशिक़ किसी महबूबा से (Koi ashique kisi mahbooba se by Faiz Ahmad Faiz)

गुलशने-याद में गर आज दमे-बादे-सबा 
फिर से चाहे तो गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दो 
उम्रे-रफ़्ता के किसी ताक़ पे बिसरा हुआ दर्द 
फिर से चाहे कि फ़रोज़ाँ हो तो हो जाने दो 

जैसे बेगाने से अब मिलते हो वैसे ही सही 
आओ दो-चार घड़ी मेरे मुक़ाबिल बैठो 
गरचे मिल बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बाद 
अपना एहसासे-ज़ियाँ और ज़ियादा होगा 
हमसुखन होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीच 
अनकही बात का मौहूम-सा पर्दा होगा 
कोई इक़रार न मैं याद दिलाऊँगा न तुम 
कोई मज़्मून वफ़ा का न ज़फ़ा का होगा 

गर्दे-अय्याम की तहरीर को धोने के लिए 
तुम से गोया हों दमे-दीद जो मेरी पलकें 
तुम जो चाहो वो सुनो 
और जो न चाहो न सुनो 
और जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ाँ आँखें 
तुम जो चाहो तो कहो 
और जो न चाहो न कहो 
                            - लंदन, 1978


दमे-बादे-सबा = हवा का झोंका                 गुल-अफ़शाँ= फूल बिखराना 
उम्रे-रफ़्ता = बीती हुई उम्र                        फ़रोज़ाँ = उज्ज्वल, रौशन 
एहसासे-ज़ियाँ = खोने की अनुभूति          हमसुखन = दूसरे से बात करते हुए 
मौहूम = आशंकित, हल्का                       गर्दे-अय्याम = युग 
तहरीर = लिखावट                                  दमे-दीद= देखते समय 
गुरेज़ाँ = बचते हुए  


शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - सारे सुख़न हमारे 
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण - 1987

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

बिहारी सतसई में नैन (Bihari Satsai mein nain by Bihari)


कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात l 
भरे भौन में करत हैं नैननु ही सब बात ll 62 ll 


नटत = नाहीं-नाहीं करते हैं 

कहते हैं, नाहीं करते हैं, रीझते हैं, खीजते हैं, मिलते हैं, खिलते हैं और लजाते हैं l (लोगों से) भरे घर में (नायक-नायिका) दोनों ही आँखों द्वारा बातचीत कर लेते हैं l 


करे चाह-सौं चुटकि कै सरैं उड़ौहैं मैन l 
लाज नवाएँ तरफत करत खूँद-सी नैन ll 79 ll 

चुटकि कै = चाबुक मारकर 
उड़ौहैं= उड़ाकू, उड़ान भरनेवाला 
मैन = कामदेव 
खूँद = जमैती, घोड़े की ठुमुक चाल 


कामदेव ने चाह का चाबुक मारकर नेत्रों को बड़ा उड़ाकू बना दिया है l किंतु लाज (लगाम) से रोके जाने के कारण उसके नेत्र (रूपी-घोड़े) तड़फड़ाकर जमैती-सी कर रहे हैं l 


नोट - जब घोड़े को जमैती सिखाई जाती है, तब एक आदमी पीछे चाबुक फटकारकर उसे उत्तेजित करता रहता है और दूसरा आदमी उसकी लगाम कसकर पकड़े रहता है l यों घोड़ा पीछे की उत्तेजना और आगे की रोकथाम से छटपटाकर जमैती करने लगता है l 


बेधक अनियारे नयन बेधत करि न निषेधु l 
बरबट बेधत मो हियौ तो नासा कौ बेधु ll 86 ll 

बेधक = बेधनेवाला 
अनियारे = नुकीले  
निषेधु= रुकावट 
बरबट = अदबदाकर, जबरदस्ती 
नासा = नाक 
बेधु = छेद 

चुभीली नुकीली आँखें यदि ह्रदय को छेदती हैं, तो छेड़ने दे, उन्हें मना मत कर (वे ठहरी चूभॆलॆ नुकीली, बेधना तो उनका काम ही है); क्योंकि तेरी नाक का बेध - लौंग पहनने की जगह का छेद - मेरे ह्रदय को बरबस बेध रहा है - जो स्वयं बेध रहा है, यही बेध रहा है, तो फिर बेधक क्यों न बढ़े ?



कवि - बिहारी 
टीकाकार - रामवृक्ष बेनीपुरी 
किताब - बेनीपुरी ग्रंथावली
सामग्री संकलन - जितेन्द्र कुमार बेनीपुरी
संपादक - सुरेश शर्मा 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1998