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शनिवार, 17 अगस्त 2013

बन जाता दीप्तिवान (Ban jata deeptiwan by Vijay Dev Narayan Sahi)

सूरज सवेरे से 
       जैसे उगा ही नहीं 
       बीत गया सारा दिन 
       बैठे हुए यहीं कहीं 

टिपिर टिपिर टिप टिप 
       आसमान चूता रहा
       बादल सिसकते रहे 
       जितना भी बूता रहा


सील रहे कमरे में 
        भीगे हुए कपड़े 
        चपके दीवारों पर 
        झींगुर औ' चपड़े 

ये ही हैं साथी और 
        ये ही सहभोक्ता 
        मेरे हर चिन्तन के 
        चिन्तित उपयोक्ता 

दोपहर जाने तक 
        बादल सब छँट गये 
        कहने को इतने थे 
        कोने में अँट गये 

सूरज यों निकला ज्यों 
        उतर आया ताक़ से 
        धूप वह करारी, बोली 
        खोपड़ी चटाक से 

ऐसी तच गयी जैसे 
       बादल तो थे ही नहीं 
       और अगर थे भी तो 
       धूप को है शर्म कहीं ?

भीगे या सीले हुए 
       और लोग होते हैं 
       सूरज की राशि वाले 
       बादल को रोते हैं ?

ओ मेरे निर्माता 
देते तुम मुझको भी 
हर उलझी गुत्थी का 
ऐसा ही समाधान 
        या ऐसा दीदा ही
        अपना सब किया कहा 
        औरों पर थोपथाप

        बन जाता दीप्तिवान l 

कवि - विजयदेवनारायण साही
संकलन - मछलीघर 

प्रथम संस्करण के प्रकाशक - भारती भण्डार, इलाहाबाद, 1966
दूसरे संस्करण के प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1995

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

बज उठती वीणा (Baj uthati veena by Ram Iqabal singh 'Rakesh')

रह-रह कर बज उठती वीणा अन्तर की,
जा रही सधी सीमा में पंचम स्वर की l 

आवरण पड़ा हट गया ज्ञान-दर्शन पर,
खिंच गई रश्मि-रेखा-सी भीतर-बाहर l 

भर मन-अम्बर रंगों के घन से घुमड़ा,
सागर ही जैसे हृदयराग का उमड़ा l 

उठ रही भैरवी की मरोर अनजानी,
हिय में गहरे घावों की पीर पुरानी l 

बन गई वेदना आँखों में अंजन-सी,
गीतों के गुंजन में नव अभिव्यंजन-सी l 

संगीत उतर आया क्षर में, अक्षर में,
सब एक हो गए स्वर के लहर-भँवर में l 
                                  (सितंबर, 1976)

कवि - रामइकबाल सिंह 'राकेश'

किताब - राकेश समग्र

संपादन - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2001


गुरुवार, 8 अगस्त 2013

फज़िर की अज़ान (Fazir ki azaan by Gyanendrapati)


फज़िर की अज़ान
लाने चली सूरज को 
आकाशलंघी आलाप की लम्बी रस्सी से खींच 
खिंचा चला आता है नलकों में पानी 
करता तर, खुली टोंटियोंवाले, देर से सन्नाते, नलकों के ख़ुश्क हलक 
और जग उठती हैं हलक में फँसी 
दमदार बूढ़ी देहों की दमादार खाँसियाँ
और खड़क उठती हैं खाली बाल्टियाँ बेसाख़्ता 
और भरी बची रात छलक उठती है 
उनके भीतर से बाहर, गोलार्ध के बाहर 


यह एक भारतीय भोर है 
एक मँझोले नगर का 
झंगोले पर लेटा 
प्रत्यूष को सुनता हूँ 
पृथ्वी पर प्रतिध्वनित 
और लगता है 
कबसे सुनता ही आ रहा हूँ
अपने होने से भी पहले से 
भारतीय भोर की यह आहट 
सुनता हूँ 
और बड़ी भोरहरिया, बाबा जिसे कहते थे ब्राह्म वेला 
झलफलाह में जब दिशाएँ खुलने लगती हैं 
पुरुब में बलता हुआ भुरुकवा 
औचक और अजीब एक ख़याल बन उजलता है भीतर :
भारतीय आकाश से 
खदेड़ने न देंगे कभी किसी गिद्ध-दल को
फज़िर की अज़ान


कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

बुधवार, 7 अगस्त 2013

कोयल और बच्चा (Koyal aur bachcha by Vijay Dev Narayan Sahi)

सन्तों ऐसा मैंने एक अजूबा देखा l

आज कहीं कोयल बोली 
मौसम में पहली बार 
और उसके साथ ही, पिछवाड़े,
किसी बच्चे ने उसकी नकल कर के 
उसे चिढ़ाया कू … कू … 

देर तक यह बोलना चिढ़ाना चला l 
खीज कर कोयल चुप हो गयी 
खुश हो कर बच्चा l
 
कवि - विजय देव नारायण साही 
संग्रह - साखी
प्रकाशन - सातवाहन पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 1983

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

पिंजड़े में (Pinjade mein by Vinod Kumar Shukla)

पिंजड़े में 
लिपिक ! लिपिक !!
बोलने वाला तोता 
साहब के घर में था l 

बहुत प्राचीन पक्षी लिपि है 
सांध्य आकाश में पक्षियों की पंक्ति 
संदर्भ लौटने का, वाक्य है 
यह विषय भी लौटने का  इतना है 
कि वाक्य भी लौटता है l 
अपने कार्यालय की खिड़की से 
उन उड़ते हुए पक्षियों से 
मैंने कहा आभार l

आभार पक्षियों की ओर उड़ गया 
पहले एक मेरा आभार था
और बाकी सब सारस थे 
फिर उसका भी आभार था 
और सब सारस थे l


कवि -  विनोदकुमार शुक्ल
संकलन - अतिरिक्त नहीं
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000

सोमवार, 5 अगस्त 2013

मेघ मल्लार (Megh mallar by Nirala)

श्याम घटा घन घिर आयी l
पुरवाई फिर फिर आयी l 

बिजली कौंध रही है छन-छन,
काँप रहा है उपवन-उपवन,
चिड़ियाँ नीड़-नीड़ में निःस्वन,
सरित-सजलता तिर आयी l 

गृहमुख बूँदों के दल टूटे,
जल के विपुल स्रोत थल छूटे,
नव-नव सौरभ के दव फूटे,
श्री जग-तरु के सर आयी l 
(संगम, साप्ताहिक, इलाहाबाद, 7 अगस्त, 1949)


कवि - निराला
संग्रह - असंकलित कविताएँ : निराला 
संपादक - नन्दकिशोर नवल 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1981

शनिवार, 3 अगस्त 2013

पोस्टकार्ड (Postcard by Kedarnath Singh)

यह खुला है 
इसलिए ख़तरनाक है 
ख़तरनाक है इसलिए सुंदर 

इसे कोई भी पढ़ सकता है 
वह भी जिसे पढ़ना नहीं 
सिर्फ़ छूना आता है 

इस पर लिखा जा सकता है कुछ भी 
बस, एक ही शर्त है 
कि जो भी लिखा जाय 
पोस्टकार्ड की अपनी स्वरलिपि में 
लिखा जाय 

पोस्टकार्ड की स्वरलिपि 
कबूतरों की स्वरलिपि है 
असल में यह कबूतरों की किसी भूली हुई 
प्रजाति का है 
उससे टूटकर गिरा हुआ 
एक पुरातन डैना 

इसका रंग 
तुम्हारी त्वचा के रंग से 
बहुत मिलता है 
पर नहीं 
तुम दावा नहीं कर सकते 
कि जो तुम्हें अभी-अभी देकर गया है डाकिया 
वह तुम्हारा 
और सिर्फ़ तुम्हारा पोस्टकार्ड है 

पोस्टकार्ड का नारा है - 
लिखना 
असल में दिखना है 
समूची दुनिया को 
जिसमें अंधे भी शामिल हैं 

एक कोरा पोस्टकार्ड 
ख़ुद एक संदेश है
मेरे समय का सबसे रोमांचक संदेश l


कवि - केदारनाथ सिंह 
संकलन - उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1995