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गुरुवार, 12 जून 2014

मुखौटे (Mukhaute by Dinkar)

 20 मई, 1963 (पटना)

आज मुखौटे पर रिल्के की मार्मिक उक्ति पढ़ी। 
हर आदमी के कई चेहरे होते हैं।  कुछ लोग सालों तक एक ही चेहरा पहने रहते हैं।  इस चेहरे का घिस जाना स्वाभाविक है। वह गंदा हो जाता है, मुड़ जाता है, फट जाता है।
मितव्ययी लोग चेहरे नहीं बदलते, न उसे धोते, न साफ करते हैं। वे समझते हैं, चेहरा अच्छा है।  मगर चेहरा बुरा हो गया है, यह बात उनको कौन समझाये ?
जिनके पास चेहरे बहुत हैं, उन्हें कठिनाई होती है। एक को तो पहन लिया। बाकी का क्या करें ? बाकी चेहरे बाल-बच्चे पहनेंगे या घर का कुत्ता भी एकाध को पहन कर निकल सकता है। 
कुछ लोग फिजूलखर्ची करते हैं।  वे सोचते हैं, चेहरों से सारा गोदाम भरा हुआ है।  जितना भी पहनो, वे घटेंगे नहीं। मगर पचास की उम्र होते-होते उन्हें भी लगने लगता है, चेहरों का स्टाक खत्म हो गया। 


लेखक - रामधारी सिंह दिनकर 
किताब - दिनकर की डायरी
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, दूसरा संस्करण - 1998 


बुधवार, 11 जून 2014

बिर्कताई (Birktai by Kabeer)

बिर्कताई  (विरक्त) कौ अंग 

मेरे मन मैं परि गई, ऐसी एक दरार l 
फाटा फटिक पषांन ज्यौं, मिला न दूजी बार ll 1 ll 

फटिक = स्फटिक, बिल्लौर 
पषांन = पाषाण, पत्थर
जैसे फटे हुए बिल्लौर पत्थर में दरार पड़ जाने से वह पुनः नहीं जुड़ सकता, उसी प्रकार मेरे मन में संसार से ऐसी विरक्ति पैदा हो गई कि अब उसके प्रति अनुराग नहीं जग सकता l


मन फाटा बाइक बुरै, मिटी सगाई साक l 
जैसे दूध तिवास का, उलटि हुआ जो आक ll 2 ll

बाइक = एक बार
सगाई = संबंध, प्रेम 
साक = साख, विश्वास 
तिवास = तीन दिन का बासी 
आक = मदार
जैसे तीन दिन का बासी दूध फटकर मदार के दूध की तरह विषैला हो जाता है, वैसे ही मेरा मन एक बार ही एकदम संसार से बुरी तरह फट गया और उसके प्रति अनुराग और विश्वास जाता रहा l


कवि - कबीर
संकलन - साखी, कबीर वाङ्मय : खंड 3 
संपादक - डॉ. जयदेव सिंह डॉ. वासुदेव सिंह 
प्रकाशक - विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, तृतीय संस्करण - 2000

आज के संदर्भ में भी कबीर की बात सच्ची है !

मंगलवार, 10 जून 2014

बाले दीप (Baale deep by Shamsherbahadur Singh)

बाले दीप 
चतुर नारि ने 
पिय आगमन को l 
 
संध्या की पलकें झुकीं,
फैली अलकें भारी 
पिय की सुमुखि प्यारी ने 
अँगिया से दीप धर 
बाले 
पिय आगमन को l 
 
दीर्घ निशा की वेला,
रे वह प्रेम की वेला l 
एकाकी कवि ही करता उस की अवहेला l 
 
नव रस सनी नारि,
निज तन आँचल सँवार उर 
अपने प्यारे को अगोरती 
         यौवन द्वारे 
         बाले दीप रे 
         चतुर नारि ने 
         पिय आगमन को l  
 
 
कवि - शमशेरबहादुर सिंह 
संकलन - दूसरा सप्तक
संपादक - अज्ञेय 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, पहला संस्करण - 1949

सोमवार, 9 जून 2014

पास रहो (Paas raho by Faiz Ahmad Faiz)

तुम मेरे पास रहो 
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो 
जिस घड़ी रात चले 
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले 
मर्हम-ए-मुश्क लिये नश्तर-ए-अल्मास लिये 
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले 
दर्द की कासनी पाज़ेब बजाती निकले 
जिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिल 
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगे 
आस लिये 
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुलक़ुल-ए-मय
बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न: मने 
जब कोई बात बनाये न: बने 
जब न कोई बात चले 
जिस घड़ी रात चले 
जिस घड़ी मातमी सुनसान, सियह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
 
              मर्हम-ए-मुश्क = सुगंध का मरहम  
              नश्तर-ए-अल्मास = हीरे का नश्तर 
              निहाँ = छिपे हुए 
              क़ुलक़ुल-ए-मय = शराब ढलने का स्वर 
              बहर-ए-नासूदगी = निराशा के कारण 
  
शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1984

रविवार, 8 जून 2014

नारंगी (Narangee by Sudha Chauhan)

नारंगी रंग की नारंगी 
बेच रहा फलवाला गाकर 
और बजाता है सारंगी 

चमक रहा है छिलका पीला 
सुन्दर फल है बड़ा रसीला 
प्यास बुझे मन खुश हो जाता 
ढीली तबियत होती चंगी



कवयित्री - सुधा चौहान 
संकलन - महके सारी गली गली (बाल-कविताएं)
संपादक - निरंकार देव सेवक, कृष्ण कुमार 
प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, पहला संस्करण, 1996

मंगलवार, 3 जून 2014

स्वांतः सुखाय (Swantah sukhay by Kumar Ambuj)


जो स्वांतः सुखाय था 
उसकी सबसे बड़ी कमी सिर्फ़ यह नहीं थी 
कि उसे दूसरों के सुख की कोई फ़िक्र न थी 

बल्कि यह थी कि वह अक्सर ही 
दूसरों के सुख को 
निगलता हुआ चला जाता था l


कवि - कुमार अंबुज
संकलन - अमीरी रेखा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2011

सोमवार, 2 जून 2014

जो रास्ता भूलेगा (Jo rasta bhoolega by Chandrakant Devtale)


मैं सुन रहा हूँ 
किसी की पास आने की आहट 

मेरी देह बता रही है 
कोई मुझे देख रहा है

जो रास्ता भूलेगा
मैं उसे भटकावों वाले रास्ते ले जाऊँगा 

जो रास्ता नहीं भूलते
उनमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है।



कवि - चंद्रकांत देवताले 
संकलन - पत्थर की बैंच 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1996