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शुक्रवार, 24 जून 2022

गवाची लकीर (Sara Shagufta translated in Hindi)

 सारी चीज़ें खो गई हैं 

आसमान के पास भी काँटा तक नहीं रहा 

जभी तो मिट्टी में बोलने वाले बोलते नहीं 

गूँज भी गूँगी हो गई है

रब भी नहीं बोलता  

सारी चीज़ें खो गई हैं 

मेरे बर्तन 

मेरी हँसी  

मेरे आँसू 

मेरे मक्र 

सारी चीज़ें खाली हैं और खो गई हैं 

बच्चों के खिलौने 

और मेरे श्टापू का कोयला वक़्त लकीर गया है 

आँखों में कोई शक्ल नहीं रह गई है 

सारी चीज़ें खो गई हैं 

मेरे चेहरे 

मेरे रंग 

मेरे इन्साफ़ 

जाने कहाँ खो गए हैं 

दिल का चेहरा आँख हुआ जाता है 


मज़ाक पुराने हो गए हैं 

हँसी चारपाई कस रही है 

चाँद की रूनुमाई के लिए सूरज आया है 

तो आसमान खो गया है 

सुलूक भी खो गए हैं 

वो भी कभी नहीं आए 

जिनके लिए आँखें रखी थीं 

और दिल खत्म किए थे 

आँखों को रसूल  कहा था 

और दिल को रब कहा था 

सारी चीज़ें खो गई हैं 


मक्र = छल, बहाना 

रूनुमाई = मुँहदिखाई 


पाकिस्तानी शायरा - सारा शगुफ़्ता 

संग्रह - नींद का रंग 

लिप्यंतरण और संपादन - अर्जुमंद आरा 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2022  


कुछ रोज़ पहले मैंने भोपाल की यात्रा में इस किताब को उठाया। शीर्षक ने ही अपनी तरफ ध्यान खींचा था। तब तक मुझे सारा शगुफ़्ता के बारे में कुछ खास मालूम नहीं था। अर्जुमंद आरा ने जो परिचय दिया है उसने काफी उत्सुकता जगा दी। "पाकिस्तान में नारीवादी उर्दू शायरी की एक उत्कृष्ट लेकिन बहिष्कृत सारा शगुफ़्ता" यह पहला ही वाक्य पर्याप्त था संग्रह को पढ़ जाने के लिए। ईमानदारी की बात है कि एक साँस में यह छोटा-सा संग्रह नहीं पढ़ पाई। साँस टूटती रही कविताओं में से झाँकती सारा शगुफ़्ता की ज़िंदगी का अंदाजा लगाकर। भाषा की दिक्कत भी बीच बीच में आड़े आई। यात्रा से लौटकर हिन्दी और उर्दू के शब्दकोशों को पलटा तो भी कुछ अर्थ हाथ न आए, जैसे 'गवाची' या 'श्टापू' का। सारा खुद बहुत जगह उखड़ी उखड़ी नज़र आती हैं तो तारतम्यता खोजने का मेरा प्रयास भी व्यर्थ जा रहा था। बातों का सिरा कई बार पकड़ में नहीं आया मेरे, फिर भी जो कशिश है उनमें वह दूसरी शायरी से जुदा है। बानगी के तौर पर यह ! हाँ, एक बात जो बड़ी देर तक मेरे मन में चक्कर काटती रही, वह है आँखों को लेकर सारा शगुफ़्ता के प्रयोग। उनकी फ़ेहरिस्त बनाने का मन किया। वैसे अनोखे और अजीबोगरीब वाक्य देखकर सारा की तड़प ही नहीं, ताकत का भी पता चलता है। 

गुरुवार, 23 जून 2022

मुम्बई का तिब्बती (The Tibetan in Mumbai by Tenzin Tsundue)

वह जो  तिब्बती है मुम्बई में 

विदेशी नहीं 

चाइनीज होटल 

में रसोइया है 

लोग उसे 

बीजिंग से आया हुआ चीनी समझते हैं 


गर्मियों में परेल ब्रिज के नीचे 

स्वेटर बेचता है 

लोग सोचते हैं कि 

कोई रिटायर्ड 'बहादुर' है  


मुम्बई का तिब्बती 

ज़रा तिब्बती लहजे में 

मुम्बइया गाली दे लेता है 

भाषा का संकट आते ही 

तिब्बती बोलने लगता है 

पारसी उसकी इसी बात पर हँसते हैं 


मुम्बई के तिब्बती को 

मिड-डे पढ़ना पसन्द है 

एफएम उसका पसन्दीदा है 

यह जानते हुए भी कि इसमें 

कभी तिब्बती गाना नहीं बजेगा 


वह एक सिग्नल से बस पकड़ता 

चलती ट्रेन में चढ़ता 

एक लम्बी काली गली से गुज़रते हुए 

बहुत नाराज़ हो जाता है जब 

लोग 'चिंग-चौंग, पिंग-पौंग' कहकर 

उस पर हँसते हैं 


मुम्बई का तिब्बती 

बहुत थक गया है 

उसे थोड़ी नींद चाहिए और एक सपना 

कि 11 बजे की विरार फास्ट 

उसे हिमालय ले जाये 

और 8.05 की फास्ट लोकल 

वापस पहुँचा दे चर्चगेट  

फिर उसी महानगर के उसी नव साम्राज्य में। 


तिब्बती कवि - तेनज़ीं सुण्डु 

संग्रह - ल्हासा का लहू, निर्वासित तिब्बती कविता का प्रतिरोध 

संकल्पना एवं अनुवाद - अनुराधा सिंह 

प्रकाशन - वाणी प्रकाशन और रज़ा फ़ाउण्डेशन, प्रथम संस्करण, 2021 

बुधवार, 22 जून 2022

प्यारी (Poem by Bahadur Shah Zafar)

प्यारी तेरो प्यारो आयो प्यारी 

प्यारी बातें कर प्यारे को मनाइये । 

अनेक भाँतन कर प्यारे को रिझाइए

आली ऐसी प्यारो कहाँ घर बैठे पाइये ।। 

लाइए समुझाइए कौन भाँतन 

कर सुखदे बुलाइये । 

साह बहादुर तेरे रसबस भए 

अनरस कर कर सौतन हँसाइये ।। 


शायर - बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र 

संग्रह  - मुग़ल बादशाहों की हिन्दी कविता 

संकलन एवं संपादन - मैनेजर पाण्डेय 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2016  


यह अच्छा संकलन है। बस मुझे उलझन हो रही है हिज्जे को देखकर। कहीं 'पाइये' तो कहीं 'लाइए'। मुमकिन है कि मूल से हिन्दी में छपाई तक आते आते यह हुआ हो। अक्सर इतने हाथों से रचना गुज़रती है कि एकरूपता नहीं रह जाती है। हालाँकि हर जगह एकरूपता लाना या खोजना भी बहुत सही नहीं। 



मंगलवार, 21 जून 2022

मुल्का (Mulka by Dhoomil)

 मुल्का मियाँइन हैं 

उम्र साठ-बासठ के बीच है 

ए बचवा! ई सब कहकूत है। 

न हिन्नू मरै न मुसल्मान  

दंगा फसाद पेट भरले का गलचऊर है। 

- असल बात अउर है। 

जे सच पूछा तो परान 

ई गरीबन कै जात है। 

मुल्का क जिनगी एकर सबूत है। 

बीस बरिस बीत गयल मुल्का के। 

कुक्कुर एस गाँव-गाँव, घरे-घरे घूमते 

लेकिन कभी केहू एनसे ना पुछलेस - 

कि ए मुल्का बुजरो !

का तुहऊँ इंसान है ?


लोग राजा से रंक और रंक से राजा भयेल 

लेकिन मुल्का के दुनिया 

ई दौरी में दुकान है । 

                          - 1969 


संकलन : धूमिल समग्र, खंड 1  

संकलन-संपादन : डॉ. रत्नशंकर पाण्डेय 

प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2021 

सोमवार, 20 जून 2022

लुकाछिपी (Hide-And-seek by Vasko Popa translated in Hindi)


कोई किसी और से छिपता है
छिपता है अपनी जीभ के नीचे
और दूसरा खोजता है उसे ज़मीन के नीचे

वह अपने ललाट में छिपता है
वह दूसरा खोजता है उसे आसमान में

वह छिपता है अपनी विस्मृति में
वह दूसरा खोजता है उसे घास में

खोजता है उसे खोजता है
कोई जगह नहीं जहाँ वह उसे नहीं खोजता
और खोजते हुए ख़ुद को खो देता है



सर्बियाई कवि वास्को पोपा (29.6.22 - 5.6.91)
स्रोत : https://mypoeticside.com/poets/vasko-popa-poems
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद : अपूर्वानंद 


मैक्सिको के नामी कवि ऑक्टोवियो पाज़ ने पोपा के बारे में कहा था - कवियों के पास हुनर है कि वे दूसरों के लिए बोलते हैं, मगर पोपा की नायाब खासियत यह है कि वे दूसरों की सुनते हैं। 

रविवार, 19 जून 2022

जीना 2 (On Living by Nazim Hikmet, translated In Hindi)


मान लें कि हम सख़्त बीमार हैं, हमें ज़रूरत है सर्जरी की -

जिसका मतलब यह है कि मुमकिन है कि हम उतर न पाएँ

                                 उस उजली मेज़ से।

हालाँकि नामुमकिन है उदासी न महसूस करना

                   सोचकर कुछ जल्दी जाने के ख़याल से,

फिर भी हम हँसेंगे चुटकुलों पर,

हम खिड़की के बाहर देखेंगे जानने को कि बारिश हो रही है -

और बेचैनी से इंतज़ार करेंगे

                   सबसे ताज़ा ख़बर का .. .

मान लें कि हम मोर्चे पर हैं -

         ऐसी जंग के लिए जो लड़ने लायक है और मान लो

वहाँ, उस पहले हमले में, पहले ही दिन

         हम अपने मुँह के बल गिर पड़ें, मृत।

हम इसे जानेंगे एक विचित्र क्रोध के साथ,

         फिर भी हम फ़िक्र में मरते रहेंगे

         जंग के नतीजों को लेकर, जो हो सकता है सालो साल चले।

मान लें कि हम जेल में हैं

और पचास के क़रीब हैं

और मान लो हमारे पास हैं और अठारह साल ,

          इसके पहले कि लोहे के फाटक खुलें,

फिर भी हम रहेंगे उस बाहर के साथ,

उसके लोगों और जानवरों, जद्दोजहद

और हवा के साथ

          मेरा मतलब है बाहर के साथ दीवारों के पार 

मेरा मतलब है जैसे भी और जहाँ भी हम हैं

          हमें जीना ही चाहिए मानो कि हम कभी नहीं मरेंगे।

 

तुर्की कवि नाज़िम हिकमत (1902-1963)

स्रोत : /poets.org/poem/living

मूल संकलन : Poems of Nazim Hikmet

तुर्की से अंग्रेज़ी अनुवाद : Randy Blasing and Mutlu Konuk

प्रकाशन : Persea Books

अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद : अपूर्वानंद



आज पूरे 10 साल हुए मनमाफ़िक शुरू किए हुए। 19 जून की दोपहर अनाड़ी की तरह ब्लॉग शुरू किया था अपने दोस्त कब्बू से पूछ-पूछ कर। पहले दो दिन तो ब्लॉग सिर्फ मुझे दिख रहा था। कब्बू से अपनी परेशानी बताई तो उसने सेटिंग में जाकर सर्च इंजन के सामने ला दिया था। उसके बाद मज़ा दुगुना-तिगुना-चौगुना बढ़ता गया। नशे-सा। फिर बीच में मेरा उत्साह जाता रहा कई वजहों से। मनमाफ़िक न कविता मिलती थी, न मन था। इसके बावजूद ब्लॉग ने ही मुझे कुछ-कुछ लिखने की जगह दी जो न कविता है न कहानी।

अब ब्लॉग पर वापस आई हूँ और उम्मीद कर रही हूँ कि इसकी रफ़्तार बनाए रखूँ। आज चंडीगढ़ से आते हुए ट्रेन में अपूर्वानंद ने मनमाफ़िक के लिए अनुवाद किया। इंटरनेट की गति के कारण मुश्किल पेश आई तो अनुवाद की फ़ोटो भेजी और तब उसे टाइप किया मैंने। फ़ॉण्ट और फ़ॉर्मैटिंग की समस्या ने उलझा रखा था, मगर कविता इतनी प्यारी है कि मन आनंदित है।

शनिवार, 18 जून 2022

पृथिवी-सूक्त (Prithivi Sukta translated by Mukund Lath)

 अपने-अपने घरों में 

अपनी भाषा 

अपने आचार । 


कितने अलग लोगों को 

पालती है पृथिवी 

शान्त, निश्चल धेनु की तरह। 


मुझे सहस्रधाराओं में 

उज्ज्वल धन देना। 


जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम् । 

सहश्रं धरा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती ।। 45 ।।   


संकलन : पृथिवी-सूक्त 

अनुवाद : मुकुन्द लाठ 

प्रकाशन: सेतु प्रकाशन, रज़ा फ़ाउण्डेशन  


अथर्ववेद मुझे पसंद है। इसलिए नहीं कि मेरा शोध प्रबंध उस पर है, बल्कि उसमें प्रवाहित जीवन-रस के लिए। जिन दिनों मैं एम. ए. में पढ़ रही थी वेद में रुचि जग गई थी। श्री उमाशंकर शर्मा 'ऋषि' के पढ़ाने के रुचिकर तरीके की वजह से उसमें बढ़ोत्तरी हुई। कुछ साल जब मैंने बतौर शोधार्थी वैदिक व्याकरण पढ़ाया तो वैदिक संस्कृत में मज़ा भी आने लगा। अब लगता है कि अभ्यास एकदम से छूट गया है, मगर प्रयास है कि कम से कम उठाकर आनंद तो ले लूँ। अब जबकि ब्लॉग की तरफ़ फिर मन चला गया है, आज मुकुन्द लाठ जी का अनुवाद पूरा पढ़ गई। धीरे-धीरे कुछ मनके यहाँ पेश करूँगी। कितना सुंदर और सादा अनुवाद है !