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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

शोपेन का नग़मा बजता है (Shopen ka nagma bajta hai by Faiz Ahmad Faiz)

छलनी है अँधेरे का सीना, बरखा के भाले बरसे हैं 
दीवारों के आँसू हैं रवाँ, घर ख़ामोशी में डूबे हैं 
पानी में नहाये हैं बूटे,
गलियों में हू का फेरा है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 
शोपेन = Chopin, पोलैंड का प्रसिद्ध संगीतकार 

इक ग़मगीं लड़की के चेहरे पर चाँद की ज़र्दी छाई है
जो बर्फ़ गिरी थी इस पे लहू के छीटों की रुशनाई है
खूँ का हर दाग़ दमकता है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 

कुछ आज़ादी के मतवाले, जाँ कफ़ पे लिये मैदाँ में गये 
हर सू दुश्मन का नर्ग़ा था, कुछ बच निकले, कुछ खेत रहे 
आलम में उनका शोहरा है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 
कफ़ = हथेली, नर्ग़ा = घेरा 

इक कूँज को सखियाँ छोड़ गयीं आकाश की नीली राहों में 
वो याद में तन्हा रोती थी, लिपटाये अपनी बाँहों में 
इक शाहीं उस पर झपटा है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 
शाहीं = बाज़ की तरह का एक पक्षी 

ग़म ने साँचे में ढाला है 
इक बाप के पत्थर चेहरे को 
मुर्दा बेटे के माथे को 
इक माँ ने रोकर चूमा है 
शोपेन का  नग़मा बजता है 

फिर फूलों की रुत लौट आई 
और चाहने वालों की गर्दन में झूले डाले बाँहों ने 
फिर झरने नाचे छन छन छन 
अब बादल है न बरखा है 
शोपेन का नग़मा बजता है 




शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - सारे सुख़न हमारे 
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण - 1987

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

करवटें लेंगे बूँदों के सपने (Karvatein lenge boondon ke sapne by Nagarjun)



अभी-अभी 
कोहरा चीरकर चमकेगा सूरज 
चमक उठेंगी ठूँठ की नंगी-भूरी डालें 

अभी-अभी 
थिरकेगी पछिया बयार 
झरने लग जायेंगे नीम के पीले पत्ते 

अभी-अभी
खिलखिलाकर हँस पड़ेगा कचनार 
गुदगुदा उठेगा उसकी अगवानी में 
अमलतास की टहनियों का पोर-पोर 

अभी-अभी 
करवटें लेंगे बूँदों के सपने 
फूलों के अन्दर 
फलों-फलियों के अन्दर 
                     (1964)

कवि - नागार्जुन 
संकलन - नागार्जुन : चुनी हुई रचनाएँ- 2
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1993

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

एक सपना (Ek sapana by Muktibodh)


पता नहीं न जाने कब से डाल रक्खा है 
शिखरों के रुँधे हुए विवरों में 
आत्म-चेतन अँधेरे में 
              कोई मैला जाल रक्खा है 
नगरों का कचरा सब पाल रक्खा है l

रामायण के न जाने कब के सड़े पत्ते 
गयी-गुज़री रोशनी के टूटे हुए कुछ स्विच 
रौबदार वसीलों से फूले हुए थीसिस 
मरी हुई परियों की
कुर्सियों के टूटे हुए हत्थे 
श्रृंगार-प्रसाधन का अटाला व जाँघिए
पीले पड़े प्रेमपत्र भरे हुए बैंक-बुक 
अँगड़ाई लेती हुई कलाओं की मेहराब 
अध-नंगे वाक़ए 
भिन्न-भिन्न पोज़ और भिन्न रूप-कोण लिए फ़ोटो
रौब-दाब, दाँव-पेंच छक्के-सत्ते
विदेशों के लिए सिये फ़ैशनेबल कपड़े-लत्ते
भूरे पड़े पासपोर्ट सड़े हुए पोर्टमेंटो
और इस सब शुची सामग्री की राशि पर 
भूतपूर्व ज्वालाओं के इन सब 
भवनों के अंदर
तहख़ाने तलघर 
जिनके गहरे सावधान अँधेरे में घनघोर 
मरी हुई परियों के मिले-जुले कमज़ोर 
नाज़ुक-नाज़ुक गलों से 
फूट पड़ता एकाएक 
कोई रोना नभ तक 
गूँजता है अब भी 
कहता है -सारी आग 
जाने कब की बुझ गयी;
गरम-गरम झरनों का झाग भी न बचा है 
सिर्फ़ देह पर रह गयी रह गयी आदतें 
हर चीज़ मुट्ठी में रखने की सिफ़तें 
बन गयी खूँख़ार
इसीलिए, बचा-खुचा जो भी रह गया है 
ब्याजं उसका, दर उसका बहुत बढ़ गया है !!

इतने में देखता मैं क्या हूँ कि 
उन्हीं ज्वालामुखियों के दल में से एक ने 
सीसे-जैसी लंबी-लंबी आसमानी हदों तक 
लंबी चुरुट सुलगायी
दाँतों से होठ दाब जाने किस तैश में 
चहरे की सलवटें और रौबदार कीं
गड़गड़ाते हुए वह कहने लगा - हे मूर्ख,
देख मुझे पहचान 
मुझे जान 
मैं मरा नहीं हूँ 
देखते नहीं हो क्या 
मेरी यह सिगरेट धुँआती है अब तक 
मेरी आग मुझमें है जल रही अब भी l 

इतने में मेरा सपना खुल गया 
                    उचट गयी मेरी नींद l 


कवि - मुक्तिबोध 
किताब - मुक्तिबोध रचनावली, भाग 2 
प्रकाशक - राजकमल, 

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

उस आँगन का चाँद (Us aangan ka chand by Ibne Insha


अंबर ने धरती पर फेंकी नूर की छींट उदास-उदास
आज की शब तो अंधी शब थी, आज किधर से निकला चाँद?
इंशा जी यह और नगर है, इस बस्ती की रीत यही
सबकी अपनी-अपनी आँखें, सबका अपना-अपना चाँद !
अपने सीने के मतला पर जो चमका वह चाँद हुआ
जिसने मन के अँधियारे में आन किया उजियारा,चाँद
चंचल मुस्काती-मुस्काती गोरी का मुखड़ा महताब
पतझड़ के पेड़ों में अटका पीला-सा इक पत्ता चाँद
दुख का दरिया, सुख का सागर इसके दम से देख लिए
हमको अपने साथ ही लेकर डूबा चाँद और उभरा चाँद 



शायर - इब्ने इंशा (1927-1978) 
किताब - इब्ने इंशा : प्रतिनिधि कविताएँ
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स , दिल्ली, पहला संस्करण - 1990

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

हादसा (Hadsa by Amrita Pritam)

बरसों की आरी हँस रही थी
घटनाओं के दाँत नुकीले थे

अकस्मात् एक पाया टूटा
आसमान की चौकी पर से
शीशे का सूरज फिसल गया

आँखों में कंकड़ छितरा गये
और नज़र ज़ख्मी हो गयी
कुछ दिखायी नहीं देता
दुनिया शायद अब भी बसती होगी !

यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

रविवार, 16 दिसंबर 2012

मुझे पुकार लो (Mujhe pukar lo by Harivansh Rai Bachchan)


इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो !

ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे नहीं ज़बान खोलता,
नहीं जगह कहीं जहाँ न अजनबी गिना गया,
कहाँ-कहाँ न फिर चुका दिमाग़-दिल टटोलता,
कहाँ मनुष्य है कि जो उम्मीद छोड़कर जिया,
इसीलिए अड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो ;
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो !

तिमिर-समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी,
विनष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी,
न कूल भूमि का मिला, न कोर भोर की मिली,
न कट सकी, न घट सकी विरह-घिरी विभावरी,
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे दुलार लो !
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो !

उजाड़ से लगा चुका उमीद मैं बहार की,
निदाघ से उमीद की बसन्त के बयार की,
मरुस्थली मरीचिका सुधामयी मुझे लगी,
अँगार से लगा चुका उमीद मैं तुषार की,
कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गड़ी,
इसीलिए खड़ा रहा कि भूल तुम सुधार लो !
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो !
पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो !


कवि - हरिवंशराय बच्चन
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : हरिवंशराय बच्चन
संपादक - मोहन गुप्त
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1986

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

डोर (Dor by Arun Kamal)


मेरे पास कुछ भी तो जमा नहीं
कि ब्याज के भरोसे बैठा रहूँ
हाथ पर हाथ धर
मुझे तो हर दिन नाखून से
खोदनी है नहर
और खींच कर लानी है पानी की डोर
धुर ओठ तक

जितना पानी नहीं कंठ में
उससे अधिक तो पसीना बहा
दसों नाखूनों में धँसी है मट्टी
खून से छलछल ऊँगलियाँ
दूर चमकती है नदी
एक नदी बहुत दूर जैसे
थर्मामीटर में पारे की डोर l


कवि - अरुण कमल
संकलन - पुतली में संसार
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2004