Translate

बुधवार, 6 मार्च 2013

बात बोलेगी (Baat bolegi by Shamsherbahadur Singh)


बात बोलेगी 
हम नहीं 
भेद खोलेगी 
बात ही l 

सत्य का मुख 
       झूठ की आँखें 
       क्या  - देखें !
सत्य का रुख 
       समय का रुख है :
अभय जनता को 
       सत्य ही सुख है,
सत्य ही सुख l 

       दैन्य दानव ; काल 
       भीषण ; क्रूर 
       स्थिति ; कंगाल 
       बुद्धि ; घर मज़दूर l 

सत्य का 
        क्या रंग ?
पूछो 
       एक संग l 
एक - जनता का 
        दुःख एक l 
हवा में उड़ती पताकाएँ 
                     अनेक l 

दैन्य दानव l क्रूर स्थिति l 
कंगाल बुद्धि l मजूर घर भर l 
एक जनता का अमर वर l 
एकता का स्वर l 
- अन्यथा स्वातन्त्र्य इति l 


कवि - शमशेरबहादुर सिंह 
संकलन - दूसरा सप्तक
संपादक - अज्ञेय 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, पहला संस्करण - 1949

मंगलवार, 5 मार्च 2013

कर्फ्यू में एक घन्टे की छूट (Curfew mein ek ghante ki chhoot by Dhoomil)

मैं चिड़ियाघर से वापस आ रहा था 
और तुम लौट रहे थे खेल के मैदान से 
जब मैंने अपने छोटे भाई के गायब होने की खबर 
तुम्हें दी l 

हम कि जो प्यारे दोस्त थे l 
घबराने की कोई बात नहीं l 
गोलीकान्ड के बाद 
लड़कों का गायब होना नई बात नहीं है 
यह शान्ति का मसला है 
लेकिन खबरों के मलबों के नीचे 
सच्चाई का पता कब चला है ?
घबराने की कोई बात नहीं और 
यह खतरनाक भी नहीं 
जितना किसी लडकी का पीछा करना l 
देह के जलाशय में 
तैरना न जानते हुए भी 
कूल्हों के कशर कूद, भरना l 

आखिरकार लड़का अन्तिम बार 
कहाँ देखा गया l 
संसद की ओर जाने वाली सड़क पर
हरी कमीज़ पहने हुए,
और यह अच्छी बात है कि 
उसने लाल स्कार्फ को 
झण्डे की तरह तान लिया था 
जिसे सुबह उसने पीछा करके 
पड़ोस की लड़की से छीना था 

यौवन ऐसा सिक्का है 
जिसके एक ओर प्यार 
और दूसरी  तरफ गुस्सा छापा है l 
कम-से-कम यह एक सबूत है 
उसके जिन्दा रहने का 
कि वह 'लोकसभा-भवन' की ओर जा रहा था l 
महज लाल स्कार्फ के साथ 
जिसे उसने झण्डे की तरह उठा रखा था l 

और अभी उसके 
अपने 'मतदान' के खिलाफ 
होने का सवाल ही उठता नहीं था 
क्योंकि वह एक साथ चुन लेना चाहता है -
तितलियाँ, स्कार्फ, होंठ और फूलों 
के जादुई रंग l 

पेट और प्रजातन्त्र के बीच का सम्बन्ध 
उसके पाठ्यक्रम में नहीं है l 

वह एक दुधमुँही दिलचस्पी है 
कुलबुल जिज्ञासा है 
जिसे मारने के लिए इस पृथ्वी पर 
अभी कोई गोली नहीं बनी l 
(घनी-घनी उसकी बरौनियों के बीच की 
हवापट्टी पर दिवास्वप्नों की गूँजें 
उतरती हैं l )

और कर्फ्यू में शान्त ठण्डी सड़क पर 
सैनिक दस्तों के जूतों से 
कितनी सफेद और मार्मिक ध्वनि 
निकल रही है ...
जनतन्त्र...जनतन्त्र...जनतन्त्र...जनतन्त्र 

कवि - धूमिल 
संकलन - सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र 
संपादन एवं संकलन - रत्नशंकर 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2001

सोमवार, 4 मार्च 2013

अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ? (Geet by Mahadevi Verma)

         मुस्काता संकेत-भरा नभ
              अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ?
विद्युत के चल स्वर्णपाश में बँध हँस देता रोता जलधर ;
अपने  मृदु  मानस की ज्वाला गीतों से  नहलाता सागर ;

         दिन निशि को, देती निशि दिन को
               कनक-रजत   के   मधु-प्याले  हैं !
                     अलि  क्या  प्रिय  आनेवाले हैं ?

मोती  बिखरातीं  नूपुर  के   छिप   तारक-परियाँ   नर्तन  कर ;
हिमकण पर आता जाता, मलयानिल परिमल से अंजलि भर ;

         भ्रान्त पथिक से फिर-फिर आते
               विस्मित  पल  क्षण  मतवाले हैं !
                      अलि  क्या  प्रिय  आनेवाले हैं ?

सघन वेदना के तम में, सुधि जाती सुख-सोने के कण भर ;
सुरधनु नव रचतीं निश्वासें, स्मित का इन भीगे अधरों पर ;

        आज  आँसुओं  के  कोषों  पर,
                स्वप्न  बने  पहरे  वाले हैं !
                       अलि  क्या  प्रिय आनेवाले हैं ?

नयन श्रवणमय श्रवण नयनमय आज हो रही कैसी उलझन !
रोम  रोम  में  होता  री  सखी  एक नया उर का-सा  स्पन्दन !
        
         
          पुलकों  से  भर  फूल  बन  गये
                 जितने   प्राणों   के   छाले  हैं !
                        अलि  क्या  प्रिय  आनेवाले हैं ?


कवयित्री - महादेवी वर्मा
संकलन - सन्धिनी
प्रकाशक - लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2005

रविवार, 3 मार्च 2013

राधेश्याम बहार (Radheshyam bahar by Bhikhari Thakur)


सुनिलहमार कहल, मन बा तोहार दहल ;
                 उमिर मोहन के नादान बा हो गोरिया !
कइसे हेराइल बूध, बोलत नइखू बोली सूध ;
                 नखऊ बिचार बड़-छोट के हो गोरिया !
बबुआ नादान बाटे, लगलू कसीदा काटे ;
                 झूठहूँ के लहरा लगवलू हो गोरिया !
झगरे के हऊ मन, कतिना बा तोरा धन ;
                 हन-हन झन-झन छोड़ि दऽ हो गोरिया !
नाहीं त जुलुम होई, राजाजी से कही कोई ;
                 तब नाहीं बसबू नगर में हो गोरिया !
लगन हमार लखि, जरत-मरत बाडू सखी ;
                 अनभल(अशुभ) छोड़ि दऽ मनावल हो गोरिया !
परल बाडू हाथवा में, चलऽ हमरा साथवा में ;
                 कहब तोहरा भाई-भउजाई से हो गोरिया !
चलऽ बबुआ दूनों भइया, जहँवाँ इनिकर हवहिन मइया ;
                 नीके पुरवासाठ करिके छोड़ब हम हो गोरिया !
मुँहवाँ के राखऽ लाली, काली कलकत्ता वाली ;                              

                 कहत 'भिखारी' नाई गाइ के हो गोरिया ! 

कवि - भिखारी ठाकुर
किताब - भिखारी ठाकुर रचनावली
प्रकाशक - बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 2005

यह गीत 'राधेश्याम बहार' (कृष्ण-लीला या रास-लीला) संगीत-नृत्य रूपक से लिया गया है और यशोदा का कथन है। गोकुल की युवतियाँ माँ यशोदा से कृष्ण की छेड़छाड़ की शिकायत करती हैं तो यशोदा कृष्ण से पूछती हैं कि "बबुआ सुनहु बात, डगर आवत-जात ; केकरो से बोले के गरज का दुलरुआ?" इस पर कृष्ण अपनी सफाई देते हैं कि सखी ही उन्हें तंग कर रही थीं और "केहू हाथ धइल कसि के, केहू बोलल हँसि-हँसि के ; उटुकी-खुटुकिया (उकसानेवाली) चलावल केहू हो मइया !" इतना सुनना था कि "यशोदाजी बेटा का कहला में आ गइली आ लगली सखी लोग के सुनावे" !

शनिवार, 2 मार्च 2013

ऑशवित्ज़ (Auschwitz by Maria Lotocka)


दोजानू हो जाओ और याद करो —
              यह ज़मीन पाक है —
यह ऑशवित्ज़ की ज़मीन है
                   ... ये नन्हें जूते
दुखते नन्हें पाँवों से
              और केश, काले कुच-कुच केश
बसंत तक नहीं पहुँचे.
              ये कंबल भूरे, ठंडे
कंकालों को ढँकते थे.
             दोजानू हो जाओ और याद करो
यहाँ हर खित्ता पाक है
             यहाँ है ऑशवित्ज़ की ज़मीन.
मुँह फुसफुसाते रहे व्यर्थ
             पोलिश में, रूसी में
ओ गोस्पोंदी, ओ बोज़’—
             या ख़ुदा, मरने न दे हमें
मदद कर !
             ऑशवित्ज़ पहले ही ऑशवित्ज़ 
ट्रेन से उतर जाएँ प्लीज़  मैं सुनती हूँ –
             क्या यहाँ सचमुच ऑशवित्ज़ था ?
वह है – जवाब देती है दहशतनाक खामोशी ...


पोलिश कवयित्री - मारिया लोतोच्का 
संकलन - द ऑशवित्ज़ पोएम्स 
संपादक - ऐडम ए ज़िक (Zych)
पोलिश से अंग्रेज़ी अनुवाद - जून फ्रीडमैन
प्रकाशक - ऑशवित्ज़–बिरकानेऊ स्टेट म्यूजियम, 1999 
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी द्वारा बनाया गया ऑश्वित्ज़ कुख्यात यातना शिविर है. यह पोलैंड में स्थित है. युद्ध ख़त्म होने के बाद इस जगह को संग्रहालय का रूप दे दिया गया है.


शुक्रवार, 1 मार्च 2013

तुम्हारी आस्तीन पर (Tumhari aasteen par by Harry Martinson)


तुम्हारी आस्तीन पर 
अन्तिम पीली तितली आ बैठी थी 
खिल्ली उड़ाते सूर्य की ताक़त से 
जागरित हो गयी थी भूल से 
जब उसने ध्यान दिया कि कितना बेमानी था होश में आना 
झट से उड़ी वह तुम्हारे हाथ से,
और अपनी उड़ान को उसने गिरते हुए पत्तों में बुन दिया l 

स्वीडी कवि - हैरी मार्टिन्सन (1904-!978)
स्वीडी से हिन्दी अनुवाद - लार्श एण्डर्सन की मदद से तेजी ग्रोवर 
संकलन - बर्फ़ की खुशबू : स्वीडी कविताएँ 
संपादक - तेजी ग्रोवर, लार्श एण्डर्सन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिली, 2001 

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

नया शिवाला (Naya shivala by Iqbal)

सच कह दूँ ऐ बिरहमन ! गर तू बुरा न माने,
                             तेरे सनमकदोंके बुत हो गये पुराने ll
अपनों से बैर रखना तूने बुतों से सीखा,
                             जंगो जदल सिखाया वाअज़को भी ख़ुदाने ll
तंग आके मैंने आख़िर दैरोहरमको छोड़ा,
                              वाअज़का वाज़ छोड़ा, छोड़े तिरे फ़साने ll
             पत्थरकी मूरतोंमें समझा है तू ख़ुदा है,
             ख़ाके वतनका मुझको हर ज़र्रा देवता है ll
आ, गैरियतके पर्दे इक बार फिर उठा दें,
                               बिछड़ोंको फिर मिला दें, नक़शे दुई मिटा दें ll
सूनी पड़ी हुई है मुद्दतसे दिलकी बस्ती,
                               आ, इक नया शिवाला इस देसमें बना दें ll
दुनियाके तीरथोंसे ऊँचा हो अपना तीरथ,
                                दामने आस्मासे उसका कलस मिला दें ll
हर सुबह उठके गायें मन्तर वह मीठे मीठे,
                                सारे पुजारियोंको मय पीतकी पिला दें ll
               शक्ती भी शान्ती भी भगतोंके गीतमें है,
               धरतीके बासियोंकी मुकती पिरीतमें है ll


शायर - इक़बाल 

किताब - सितारे (हिन्दुस्तानी पद्योंका सुन्दर चुनाव)
संकलनकर्ता - अमृतलाल नाणावटी, श्रीमननारायण अग्रवाल, घनश्याम 'सीमाब'  
प्रकाशक - हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा, तीसरी बार, अप्रैल, 1952