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गुरुवार, 20 नवंबर 2014

इधर तोपते हैं, उधर झाँपते हैं (Idhar topte hain, udhar jhanpte hain by Ramgopal Sharma 'Rudra')

इधर तोपते हैं, उधर झाँपते हैं --
सड़ा ठाट ही है ! -- वृथा ढाँपते हैं !

इधर कुछ घटाकर, उधर कुछ बढ़ाकर 
गुणा क्या करेंगे ? --- वो क्या नापते हैं ?

ज़मीं ही ग़लत है -- महल क्या टिकेगा !
क़िला है तो यह ! जीभ क्या जाँपते हैं ?

करेंगे दवा मेरी जूड़ी की वो क्या ?
मेरे पास आते जो खुद काँपते हैं !

सराब है ! न चेते अगर 'रुद्र' तो फिर 
मरेंगे, जिधर जा रहे हाँपते हैं !
                                 - 1978 



कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991 

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

लताजी (Lataji by Purwa Bharadwaj)

कल की सुबह जाड़ा आने की तैयारी करने के नाम थी. उस क्रम में बेटी की रज़ाई खोज रही थी. पहले तो अपने पलंग के चारों बॉक्स को खँगाला. फिर दीवान की बारी आई. रज़ाई के चक्कर में सारे बक्से और सूटकेस (स्काई बैग से लेकर VIP के कचकड़ेवाले ब्रीफकेस) भी पलट डाले. अंत में याद आया कि रज़ाई ड्राई क्लीनर के पास ही है. इस पलटा-पलटी में मोढ़े के कुछ नए खोल मिल गए जिन्हें मैं पूरी तरह भूल चुकी थी. मिलते ही मैंने अपनी सहयोगी सरोज के साथ मिलकर उन्हें मोढ़े पर चढ़ा दिया. सरोज को मैंने उन मोढ़ों को अपनी दोस्त के साथ जयपुर से ढोकर लाने और शताब्दी में टी.टी.से बहस करने का वाकया भी सुना दिया. काले और सफ़ेद खोल में मोढ़े कायदे के लग रहे थे. मुदित भाव से मैं दूसरी तरफ मुड़ी. एक पुराने बैग में पुरानी फोटो, पुराने एलबम और एक-दो निगेटिव हाथ लग गए. जो पहली तस्वीर उठाई वह बेटी के छुटपन की थी. फिर घर-परिवार और सभा-सेमिनार, धरना-जुलूस की तस्वीरों का ढेर था. रामगढ़ में निर्मल वर्मा की, नैनीताल में मनोहर श्याम जोशी की, पटना के कलाकार संघर्ष समिति के जुलूस में नेमिचंद्र जैन, कारंथ वगैरह की, वर्धा में शिवकुमार मिश्र की, पटना में चंद्रशेखर स्मृति व्याख्यान में विशालाक्षी मेनन की, पटना में आयोजित इकबाल संगोष्ठी में अली सरदार जाफरी, मुहम्मद हसन, जगन्नाथ आज़ाद वगैरह की, पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में त्रिलोचन जी और नानाजी की, सीवान में चंद्रशेखर की, दिल्ली में शाहपुर जाटवाले घर में मेरी बहन कनु की, पटना के गुलबी घाटवाले घर में मनोरमा फुआ की, दिल्ली में रामशरण शर्मा की ... इन सबके साथ जीवंत तस्वीरें ! मगर झटका लगा यह सोच कर कि इतने सारे लोग अब हमारे साथ नहीं हैं. मतलब हम जिनके साथ पले-बढ़े, जिनकी सोहबत हमें मिली उनमें से 25 % से अधिक लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं ! ऐसे ख़यालों को ज़बरदस्ती अपने दिमाग से हटाकर मैं तैयार होकर शाम के मेहमानों के स्वागत के लिए अपनी ननद के साथ खरीदारी करने चली गई. सामान की सूची लंबी न थी - केवल मछली, मटन, अदरक, कॉफ़ी और बेसन. इसे निपटाकर मुझे भाषा, अस्मिता और शिक्षा पर हो रही चर्चा में जाना था. वहाँ अनीता रामपाल से मुलाकात हुई और बरबस विनोद रैना याद आए.

अभी सत्र शुरू ही होनेवाला था कि मुकुल से मालूम हुआ कि लता पांडे नहीं रहीं. मुझे विश्वास नहीं हुआ. वे हड़बड़ी में थीं क्योंकि उन्हें सत्र के लिए मंच पर जाना था. उन्होंने इतना बताया कि 10 दिन बुखार और खाँसी के बाद शुक्रवार को लताजी अस्पताल में भर्ती हुई थीं और निमोनिया निकला था. रविवार की देर रात यह सब हुआ ! मैंने बाहर निकलकर पहले लताजी का फोन लगाया. वह बजता रहा. फिर NCERT की उनकी सहकर्मी इंदुजी को लगाया. इंदुजी ने बताया कि खबर सही है और वे सब निगम बोध घाट ही जा रहे हैं. पीछे से लताजी को ला रहे हैं. क्या संयोग था कि भाषा और शिक्षा पर आजीवन काम करनेवाली लताजी के बारे में मैं उन्हीं के विषय पर आयोजित सेमिनार में ऐसे सुन रही थी ! अब वे आ नहीं रही थीं, उनको लाया जा रहा था. सब भाषा का ही खेल है न ? और आपकी पहचान का न ? आप जीवित हैं या मृत, सबसे पहला असर भाषा पर पड़ गया न ! इंदुजी से पता चला कि उनलोगों को घाट पहुँचने में आधा घंटा लगेगा. मैं अनमनी सी हॉल में आकर बैठ गई. फोन की आवाज़ बंद थी, इसलिए तुरत लताजी के नंबर से किसी ने पलट कर फोन किया था तो मैं सुन न सकी थी. मैं दस मिनट बैठ गई. गलत किया क्योंकि दस मिनट बाद निकलकर ऑटो खोजने में दस-पंद्रह मिनट और बर्बाद हो गए. कोई ऑटो कभी एक बार में जाने को तैयार ही नहीं होता है. और वह भी निगम बोध घाट जहाँ छोड़ने के बाद उनको दूसरी सवारी न मिले ! घाट का रिंग रोड पर होना भर ऑटोवालों के लिए सही नहीं है. 

चलते-चलते लताजी के नंबर पर फिर फोन लगाया. किसी पुरुष ने बताया कि वे लोग घाट पहुँच गए हैं. इतना मैंने पूछ लिया कि क्या बिजली से दाह संस्कार हो रहा है. जवाब मिला कि नहीं, लकड़ी से. मेरी चाल तेज़ हुई और मैं विश्वविद्यालय मेट्रो की दिशा में बढ़ी. आगे चलकर बीसियों ऑटोवालों से पूछने के बाद एक ने कृपा की. मैं पहुँच गई. अंदर जाकर खोजना शुरू किया. लताजी को नहीं, NCERT के परिचित चेहरों को. कहीं पंजाबियों का समूह था, कहीं साधारण रहन-सहनवाले लोगों का समूह था. अस्मिता के सहारे समूहों को पहचानते हुए मैं आगे बढ़ रही थी. कई समूह के पास जाकर दाह संस्कार किसका किया जा रहा है यह भी पूछ लिया. जब उलझ गई तब इंदुजी से दुबारा फोन से पूछा कि आपलोग किधर हैं. अब न उत्तराखंड मुझे पता था और न यमुना किनारे जाने का रास्ता मिल रहा था. खैर, फिर किसी ने एकदम नदी किनारे का रास्ता बता दिया. परिचित चेहरे भी मिल गए, लेकिन लताजी ढँक चुकी थीं. उनका शाल किनारे पड़ा था. मुझे पाँचेक मिनट की देर हो गई. मैं लताजी से मिल नहीं पाई. मन तो किया कि किसी को कहूँ कि लकड़ी हटाकर मुझे मिला क्या दो, दिखा भर दो. मगर कैसे कहती ? मैं न परिवार की सदस्य थी, न सहकर्मी, न गहरी दोस्त ! तुरत मुखाग्नि दे दी गई. किसी ने बताया कि लताजी के बड़े भाई इलाहाबाद से पहुँच गए थे. उनके चेहरे में थोड़ा लताजी का चेहरा भी झाँक रहा था. आसपास NCERT के साथी थे और कुछ पड़ोसी. मैं खड़ी होकर सोच रही थी कि आज जब मोढ़े पर खोल चढ़ा रही थी तो मैंने याद किया था कि वे मोढ़े मैंने जयपुर में साथ खरीदे थे. उस समय मैंने लताजी का साथ याद किया था, केवल उनका नाम सरोज को नहीं बताया था. उसकी सज़ा थी क्या यह ?

मैं इंदुजी से बात करने लगी. पता चला कि अस्पताल में दाखिल होने के बाद लताजी को एक के बाद एक करके कुल तीन दिल के दौरे पड़े जो जानलेवा साबित हुएहम तीनों की मुलाकात अक्सर उदयपुर में हुआ करती थी. इंदुजी उम्र में लताजी से छोटी हैं, लेकिन दोनों की खूब पटती थी. थी ? अब है नहीं कह सकते न ? मेरी लताजी से पहली मुलाकात 2012 के जून महीने में जयपुर में हुई थी. हालाँकि उनके नाम और उनके भाषा संबंधी काम से काफी पहले से परिचित थी. अपूर्वानंद के लिए 2006-7 से उनका फोन आता था तो कई बार मैंने बात की थी. हमेशा मीठे ढंग से बात करती थीं. उनकी आवाज़ में औपचारिकता नहीं, बल्कि सचमुच मिठास रहती थी. मेरी बेटी भी जब फोन उठाया करती थी तो उससे दो की जगह चार बातें करना उनको अच्छा लगता था. राजस्थान के लिए हिंदी की पाठ्य पुस्तक बनाने के क्रम में हम मिले. ऐसा लगा कि सचमुच बरसों से एक दूसरे को जानते हैं. हमारा मिलना उदयपुर में ही ज़्यादा हुआ, दिल्ली में तो केवल NCERT की कार्यशालाओं में आते-जाते मिले. उदयपुर में साथ में फिल्म देखी. दिन भर के काम के बाद जयपुर में भी हम नाइट शो देखकर आए. अगल-बगल के कमरे में रहने का लाभ उठाकर सुबह-शाम की चाय से लेकर खाना-नाश्ता सब साथ रहा. बाज़ार में भटक-भटक कर साड़ी, शलवार-कुरता, चादर-चूड़ी से लेकर अचार, हींगोली वगैरह सब खरीदने में हम दोनों को मन लगता था. बैठकर साहित्य और शिक्षा की दुनिया की नुक्ताचीनी करने में भी हम समय खर्च करते थे. लताजी की सबसे अच्छी बात यह थी कि उनका स्वर शिकायती नहीं रहता था. इलाहाबाद रेडियो स्टेशन से लेकर मैसूर-अजमेर-दिल्ली NCERT तक की उनकी यात्रा आसान नहीं थी. अकेले रहना भी कम संघर्षपूर्ण नहीं होता. कैसे उनके डैडी बीमार हुए, कैसे वे अपनी माँ का शव लेकर अकेले अजमेर से इलाहाबाद गईं, कैसे वे अपनी बहन के साथ रहती हैं, कब उन्होंने लिखना-पढ़ना शुरू किया, कब वे किताबों को रूप देने लगीं, कब कब उनके घरेलू नुस्खे बीमारी में काम आए, कैसे चुलबुल (लताजी का कुत्ता) आम खाता है और उनके लौटने की राह देखता है - यह सब मैंने जाना-सुना था.

लताजी की दुनिया लिखाई-पढ़ाई की दुनिया थी. बच्चों को लेकर वे दिल से सोचती थीं. पाठ्यपुस्तकों के लिए सामग्री लाने और जुटाने में हमेशा अव्वल रहती थीं. उनके पास पराग, बाल भारती जैसी पत्रिकाओं के पुराने-पुराने अंक थे और उनको न जाने कब कब की पढ़ी हुई कविया या कहानी याद रहा करती थी. पाठ्यपुस्तकों में अभ्यास बनाते समय भाषा संबंधी उनके सुझाव बड़े अच्छे हुआ करते थे. वे कभी बहुत अड़ती नहीं थीं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि उनके विचार पुख्ता नहीं थे. वे शांत ढंग से बात करने और बात मनवाने में माहिर थीं. शौक़ीन भी थीं, लेकिन खाने-पीने सबमें एहतियात बरतती थीं. मैं लापरवाही बरतती थी तो मुझे टोकती थीं. एक दो बार उनके साथ मैं उदयपुर में सुबह की सैर पर भी गई, वरना घर छोड़ते ही मैं सुबह की सैर गोल कर जाती हूँ और अपने डायबटीज़ को भूल जाती हूँ. एक बार रात में FB पर गप्प करके विदा लेते हुए उन्होंने कहां "शुभ रात्रि". मैंने लिखा, "स्वीट ड्रीम्स भी लगे हाथ." उन्होंने लिखा, "हा हा हा ज़रूरी हैं." मैंने मज़ाक किया, "लेकिन सुगर फ्रीवाला स्वीट". उनका जवाब था, "हाँ, हम दोनों के लिए तो यही चलेगा."

दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहनेवाली लताजी का अंतिम sms इंदुजी दिखा रही थीं. उन्होंने अस्पताल से ही घर में काम करनेवाले (शायद पेंटर) से संपर्क करने के बारे में लिखा था. सुनकर नीरजा दी' भी अपना किस्सा सुनाने लगीं. नीरजा रश्मि का जब पैर टूटा था तो लताजी आगे बढ़कर उनके पास आईं और अपने पैर टूटने के अनुभव का हवाला देकर घरेलू नुस्खे बताने लगीं. मुझे याद आया कि एक बार उदयपुर में मेरी साड़ी का पूरा फॉल एक तरफ से उधड़ गया. यात्रा का अंतिम दिन था और मेरे पास कोई धुला हुआ कपड़ा न बचा था क्योंकि बोझा कम करने के खयाल से दिन के हिसाब से गिनकर मैं कपड़े ले जाया करती थी. अब क्या करूँ ? लताजी को बुलाया. उन्होंने फौरन उपाय सुझा दिया. होटलवाले से उन्होंने स्टेपलर मँगवाया और खुद पूरी साड़ी में स्टेपल से फॉल टाँक दिया. हमारी कार्यशाला का वक्त हो चला था और मैंने साड़ी पहनने के बाद देखा था कि फॉल लटक रहा है. मेरे साड़ी पहने हुए में ही लताजी ने झुककर सारा स्टेपल किया. काश कोई ऐसा स्टेपलर होता जो दो फाँक हो गए जीवन को भी स्टेपल कर देता ! टिकाऊ न सही, कम से कम वक्ती मरम्मत हो जाती और फिर हम सब मिलकर लताजी को बचा लेते !

अभी अक्टूबर के अंत में उनके विभाग में एक कार्यशाला में मेरा जाना हुआ था. व्यस्त रही, इसलिए सोचा कि अगली बार लताजी से मिलूँगी. जबकि सिर्फ एक तल्ला ऊपर उनका दफ्तर था. उसके पहले शायद जून की कार्यशाला में उनसे मिलने गई थी. उन्होंने प्यार से अपने चैंबर में बैठाया. मैं बिना चाय पिए भाग रही थी, लेकिन उन्होंने आग्रह किया कि चाय के बहाने ही थोड़ा बैठ जाऊँ. बातचीत में यह तय हुआ कि मैं पंडिता रमाबाई पर लिखकर उनकी पत्रिका के लिए दूँगी. फिर हिंदी में अनुवाद की समस्याओं पर बात चल निकली. उसके बाद उनकी बनाई चाय का स्वाद लेकर मैं नीचे आ गई - अपनी कार्यशाला में. उसके बाद बीच में एकाध बार फोन पर बात हुई. हम बोलते थे कि दिल्ली में इत्मीनान से मिलेंगे कभी, मगर वह कभी कभी नहीं आया ! मृत्यु की छाया पूरे दिन पर ऐसी पड़ी कि अब तस्वीरों में एक तस्वीर लताजी की भी जुड़ जाएगी.



गुरुवार, 13 नवंबर 2014

तेज़ी से जाती हुई (Tezi se jati hui by Sarveshvar Dayal Saxena)

तेज़ी से जाती हुई कार के पीछे 
पथ पर गिर पड़े 
निर्जीव, सूखे, पीले पत्तों ने भी 
कुछ दूर दौड़कर गर्व से कहा - 

           'हममें भी गति है 
            सुनो, हममें भी जीवन है,
            रुको, रुको,
            हम भी साथ चलते हैं -
            हम भी प्रगतिशील हैं !'

लेकिन उनसे कौन कहे :
प्रगति पिछलग्गूपन नहीं है 
और जीवन आगे बढ़ने के लिए 
दूसरों का मुँह नहीं ताकता। 



कवि - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - कविताएँ - 1 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1978 

शनिवार, 1 नवंबर 2014

नानाजी (Nanaji by Purwa Bharadwaj)

आज नानाजी का जन्मदिन है. नानाजी यानी पं. राम गोपाल शर्मा 'रुद्र'. हिंदी और मगही के कवि. अनुवादक, संपादक और अनेक भाषाविद्. हमें उनकी विद्वत्ता से उतना मतलब नहीं था जितना उनके कुर्ते या बंडी की जेब से झाँकती रंग-बिरंगी कलम से. मास्टर साहब लोग के अलावा लाल कलम का कुछ और भी इस्तेमाल हो सकता है यह पहली बार उन्हीं से मैंने जाना. 

लाल कलम से भी ज़्यादा हरी और बैंगनी कलम आकर्षित करती थी. नीली और काली कलम भी उस कतार में थी, मगर उसके रंगो बू से हम वाकिफ़ थे. पहले अधिकतर कलमें स्याही वाली होती थीं और उनकी साज सज्जा में दावात और छोटा सा प्लास्टिक का ड्रॉपर हुआ करता था. बाद में डॉट पेन आ गया तो नानाजी की जेब में वे भी सजने लगे. उनमें से चारमुँहा पेन हमलोग ज़रूर छूकर ...टिप टिप करके देखना चाहते थे. बाद में मुझे लगा कि उस चतुर्मुख की कल्पना कहीं ब्रह्मा से तो नहीं आई थी ! बच्चे इस तरह की अटपटी कल्पना करें तो एक खेल है, लेकिन वयस्क दिमाग में यह आना तो फितूर ही माना जाएगा. अभी तो कहीं कोई संवेदना न आहत हो जाए, इसका भी डर लगना चाहिए ! 

उस समय सबकुछ जादुई लगता था. स्याही भरना, ड्रॉपर का दबाना, उसकी फुस फुस आवाज़ और फिर उसी तरह के ड्रॉपर से होमियोपैथी दवा खिलाना. नानाजी अच्छी खासी होमियोपैथी जानते थे. उनसे माँ और पापा दोनों ने सीखा. दोनों अभी तक गाहे बगाहे होमियोपैथी की किताब लेकर बैठ जाते हैं. मैंने माँ-पापा से कामचलाऊ जानकारी ले ली और जब तक बेटी बड़ी नहीं हुई थी अक्सर उसके सर्दी-जुकाम, लू लगने और आँव पड़ने के लिए होमियोपैथी दवा ही दिया करती थी. यहाँ तक कि कचनार खुद कहने लगी थी कि माँ नैट्रम म्यूर खिला दो या नक्स खिला दो या बेलाडोना खिला दो. कचनार को मीठी गोलियों की पड़ी रहती थी और उस समय कहीं न कहीं मेरे मन में रहता था कि यह नानाजी की परंपरा चली आ रही है. हालाँकि आजकल घर में मेरी दवा का छोटा बक्सा भी नहीं दिख रहा है जिसमें करीने से दवा मैंने भी लगा रखी थी. जब पटना से आते समय माँ ने वह बक्सा मुझे दिया था तब उस वक्त उसने भी शायद नानाजी को याद किया होगा. दवा के बक्से में झाँककर एक एक शीशी को उठाकर सही दवा चुनने का काम नानाजी जिस तरह किया करते थे वह कविता रचने से कम नहीं था. कम से कम उसकी लय कविता रचने की लय थी. उनकी कविता रचने की प्रक्रिया से जो परिचित है उसे पता है कि वाकई उनका 'हर अक्षर है टुकड़ा दिल का'. 

मुझे नानाजी का पहली बार महत्त्व पता चला उनकी व्याकरण की किताब से. आज तक वह चलित हिंदी व्याकरण मेरे लिए अंतिम प्रमाण है. उनके वैयाकरण होने से मुझे गर्व महसूस हुआ था, लेकिन उनका कवि रूप फिर भी पर्दे में था. इसके पीछे पापा की धारणाओं का भी हाथ था जो उन्हें गीतकार भर मानकर चलते थे. हालाँकि वे अपने मास्टर साहब (पापा शुरू में नानाजी से ही अपनी कविताओं को दुरुस्त करवाते थे. इसलिए वे उनके मास्टर साहब नहीं थे. नानाजी पेशे से मास्टर थे. पहले गया ज़िला स्कूल में और फिर पटना कॉलेजिएट में. अंत अंत तक पापा नानाजी को मास्टर साहब ही कहते रहे, माँ की तरह बाबूजी उन्होंने कभी नहीं कहा !) के ज्ञान की शुरू से कायल थे. आखिरकार पापा की प्रगतिशीलता ने एक दिन नानाजी के महत्त्व को मान लिया. उन्होंने उत्तर छायावाद काल के कवियों की पंक्ति में नानाजी को ससम्मान जगह दी. नानाजी का कवि रूप पापा के माध्यम से मेरे सामने आया, यह कहना गलत न होगा. हालाँकि मेरी माँ और मौसियाँ अपने जन्म के समय से इसे जानती और मानती थीं.

माँ और सबसे छोटी बेबी मौसी के साथ मैं भी 'बंधु ज़रूरी है मुझको घर लौटना / एक मुझे भी ले लो अपनी नाव पर' चाव से गाती थी (बेसुरी होने और गीत की गहराई न समझने के बावजूद). नानाजी के मुँह से भी मैंने यह सुना था और तब लगा था कि सचमुच जो लोग उनके स्वर की मिठास की तारीफ़ करते थे वे अतिशयोक्ति अलंकार का सहारा नहीं लेते थे, बल्कि अभिधा में अपनी बात कहते थे. वैसे अभिधा में जीवन में कितना कम होता है ? 'बंधु ज़रूरी है मुझको घर लौटना' कहनेवाले नानाजी एक दिन घर नहीं लौटे. 19 अगस्त, 1991 की रात रवीन्द्र भवन में कवि सम्मेलन था. वहाँ कविता पाठ करके मिलर हाई स्कूल के पास कविता मौसी के घर गए. खाना खाकर बुद्ध कॉलोनी में अपने घर लौटे. उनकी सवारी सायकिल हुआ करती थी (जिसे मनपसंद कहना उचित नहीं होगा और केवल मजबूरी कहना भी सही नहीं होगा). जैसे ही पहुँचे याद आया कि कविता की डायरी कहीं छूट गई है. बैचैनी में सायकिल उठाई और डायरी लाने निकल पड़े. बरसात की रात थी. घर से 500 मीटर भी न गए होंगे कि बिजली का नंगा तार कंधे पर आ गिरा. उनकी रामलीला समाप्त हो गई ! कविता की वजह से वे जीवन की मुश्किलों को पार करते चले गए थे, कविता उनका संबल था, नानी की मौत, दिनेश मौसा की मौत और मामू की मौत को झेलने में उनका साथ कविता ने दिया था और कविता ढूँढ़ते हुए ही वे चले गए. मैं अस्पताल में लेटे नानाजी को याद नहीं करना चाहती हूँ. मैं उनकी सायकिल की घंटी की आवाज़ याद करना चाहती हूँ जिसके साथ उनके बकलसवाले चमड़े के बैग से खाजा निकलने की आस जुड़ी है. सिलाव का ताज़ा ख़स्ता कुड़कुड़वाला खाजा !

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

बाबा (Baba by Purwa Bharadwaj)

आज का दिन कानूनी मसलों से जूझने में गया. हिंदी में अनुवाद और संपादन के काम ने मुझे अपने बाबा - बाबू राम परोहन सिंह की याद दिला दी. कानून पर काम करनेवाली अपनी युवा साथियों को भी मैंने बाबा का किस्सा सुना दिया. बात शुरू हुई थी भाषा से. अभी का कोई कानून हिंदी में उठाइए तो समझ में ही नहीं आएगा कि कहा क्या जा रहा है. फारसी तो नहीं कहूँगी, लेकिन शायद यह उर्दू के गायब होते जाने का नतीजा है. अदालतों का तो पता नहीं, मगर अभी के ढेर सारे कानूनी दस्तावेज़ों में जो संस्कृतनिष्ठ पदों से भरी भाषा है वह मुझे समझने में बहुत दिक्कत हो रही थी. संस्कृत की एम,ए. और पी.एच.डी. की डिग्री मददगार न थी. मुझे तो लगता है कि उसको शायद कोई वकील भी पूरा नहीं समझता होगा. ऐसे में अपने साथ होनेवाले अन्याय के खिलाफ अदालत का दरवाज़ा खटखटानेवाले कितना असहाय महसूस करते होंगे ! जो चाहे वह पट्टी पढ़ा दी जाए वे उसे कानून मानकर चुप बैठने को बाध्य कर दिए जाते हैं. सोचते हैं कि न किस्मत ने सुनी, न भगवान ने और न अदालत ने. सबकुछ अबूझ हो गया है. बात स्पष्ट करनी हो तो कानून का अंग्रेज़ी में लिखा दस्तावेज़ देखना पड़ता है. उसमें भी जब मेरे जैसे कानून के मामले में अनपढ़ को इतना झोल नज़र आता है तब जानकार लोग क्या अपना सर नहीं धुनते हैं ! फिर मेरे बाबा कैसे कानून समझ लेते थे ? 

पापा बताया करते हैं कि आस पास के गाँव के लोग बाबा को वकील साहब कहा करते थे. उन्होंने औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी. उस समय हमारे गाँव चाँदपुरा (हाजीपुर के करीब) में स्कूल नहीं था. चलन था घर पर मुंशी (कायस्थ) से कैथी पढने का. उसी में सारा हिसाब किताब हुआ करता था. बाबा भी कैथी जानते थे. अपना दस्तखत कर लेते थे. बाकी वक्त लिखने का मौका भी न था. किसान घर और 10 बच्चोंवाला परिवार (मेरे पापा चार भाई हैं और छः बहन. अब बड़का चच्चा नहीं हैं और गिरिजा फुआ, मनोरमा फुआ और नेकलेस फुआ नहीं हैं) ! इसके अलावा बाबा चार भाई थे यानी मेरे बाबा, मेरे बड़का बाबा, मँझले बाबा और छोटका बाबा. सबलोग साथ रहते थे. मेरी याद में बड़का बाबा घर से थोड़ी दूर बथान पर रहने लगे थे. सबलोग अपने इलाके की भाषा बज्जिका बोलते थे. अपने घर और ज़मीन के मुकदमे ने बाबा को कानून की भाषा सिखा दी. उसमें उनको मज़ा भी आने लगा तभी तो अगल बगल के गाँव के लोगों को भी कानूनी सलाह देने लगे थे. लोग क्या कई बार वकील भी उनसे मुकदमे पर चर्चा करते थे. उनका काफी समय इसमें जाता. कभी किसी मुद्दई के साथ तो कभी किसी गवाह के साथ वे अदालत के चक्कर काटते रहते थे.

1934 के भूकंप का आँखों देखा हाल सुनाते हुए बाबा मुजफ्फरपुर की अदालत के ज़मींदोज़ हो जाने की बात बताया करते थे. मुझे वह किस्सा थोड़ा थोड़ा याद है. बाबा मुजफ्फरपुर की अदालत से निकले और सड़क के ठीक उस पार गए ही थे कि ज़लज़ला आया. नज़र घुमाई तो अदालत गायब थी ! पूरी की पूरी इमारत ज़मीन में धँस गई थी. लेकिन बाबा का मुक़दमा प्रेम बरकरार रहा. पापा के मुताबिक़ बाबा मुक़दमे के शौक़ीन थे. वे अक्सर अपने पके बालोंवाले सर को सहलाते हुए मज़ाक के स्वर में पूछते थे कि क्या चार-पाँच किता मुक़दमा और कर दिया जाए. (बाबा के सर के मुलायम छोटे बाल मुझे याद हैं जो जवाकुसुम तेल से गुलाबी हो जाया करते थे. और यह भी कि कई बार अपने सर पर हाथ फेरते हुए वे बरामदे की चौकी पर लेटे रहते थे तो मुस्कुराते हुए अपूर्वानंद से पूछते थे, "कि हो कविजी, की हालचाल ?" ) बाबा के लिए कानून अबूझ न था और न कैथी और बज्जिका से दूर ! उसकी उर्दू-फारसी उन्हें समझ में आती थी. आज का दस्तावेज़ ज़रूर उन्हें किसी दूसरे लोक का लगता.

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

चेहरे (Faces by Moshe Dor)

नीचे
रेत के
तुम काटते हो मेरा पैर.
और अगर हो तुम्हारा पैर
मेरे चेहरे पर?
हम बँधे हैं
रस्सियों से ज़हर की,
कक्ष
हमारे हृदयों के भरे हुए
गाँठों से स्याह
ख्यालों की.
शायद हमारे बच्चे
जान पाएँगे
इससे बेहतर मुठभेड़ें
रेत और समंदर के बीच,
महान सितारों के नीचे.
अभी तो
रहने दो
खामोशी
हमारे बीच
इस तिक्त रेत
के सामने.  


इस्रायली कवि - मोशे दोर (Moshe Dor)
संकलन - क्रॉसिंग द रिवर 
संपादक - सेमोर माइन (Seymour Mayne)
प्रकाशन - मोज़ाइक प्रेस, लंदन, 1989 
हिब्रू से अंग्रेज़ी अनुवाद - मार्क व्हाइतिस-हेम (Mark Whiteis-Helm)
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 





मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

शरत्पूर्णिमा (Sharatpurnima by Ajneya)


चाँद चितेरा 
आँक रहा है शारद नभ में 
एक चीड़ का खाका l 



कवि - अज्ञेय 
संकलन - अरी ओ करुणा प्रभामय 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, प्रथम संस्करण -1959