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गुरुवार, 30 जून 2022

मन (Mann by Bhawaniprasad Mishra)

मन 

हल्का करने वाले सुख 

चाहे पल या दो पल के हों 

पर उनका मिलना 

रोज जरूरी लगता है 

यह क्षणिक सुखों का जादू है 

जो बड़े-बड़े दुख ठगता है। 

                              - 7 जून, 1953 


कवि - भवानीप्रसाद मिश्र 

संकलन - भवानीप्रसाद मिश्र रचनावली 

संपादन - विजय बहादुर सिंह 

प्रकाशन - अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, नई दिल्ली 

                 प्रथम संस्करण, 2002 

सोमवार, 27 जून 2022

विदूषक (Clowns by Miroslav Holub translated in Hindi)


विदूषक कहाँ जाते हैं?

विदूषक कहाँ सोते हैं?

विदूषक क्या खाते हैं?

विदूषक क्या करते हैं
जब कोई नहीं
कोई नहीं क़तई
हँसता है अब और 

अम्माँ?

चेक कवि - मिरोस्लाव होलुब, 1961
संग्रह - पोएम्स : बिफोर एंड आफ्टर
चेक से अंग्रेज़ी अनुवाद - एवाल्ड (Ewald Osers)
प्रकाशन - ब्लडैक्स बुक्स, ग्रेट ब्रिटेन, 1990
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद

शनिवार, 25 जून 2022

उन्हें हड़प लो (Poem by Bhuchung D. Sonam translated in Hindi)

आपकी प्लेट में रखा बटर चिकेन 

कल तक वह मुर्गी था 

जिसके चूजे अंडों से निकले नहीं अभी 

आप स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लीजिए 


पिछली गर्मियों [में] मैंने जिस ऊँट की सवारी की थी 

वह अब चमड़े का एक बैग बन चुका है 

सजा है एक आधुनिक शोरूम में 

कुबड़ा होना भी एक श्राप है 


उस पर बहुत फबता है मस्कारा 

पर उसकी आँखों तक आने से पहले 

वह कितने ही चूहों की आँखें फोड़ चुका होता है 

चूहे अब बिल्लियों से अधिक मसकारे से डरते हैं 


बुद्ध की प्राचीन मूर्ति की नकल 

उसके आलीशान स्नानगृह में खड़ी है 

जनमानस की सामूहिक आस्था का प्रतीक 

अब रोज़ उसे मूतते हुए घूरता है 


वह दहाड़ता हुआ गर्वीला बाघ 

जो बड़ी शान से बंगाल के जंगलों में 

चहलकदमी किया करता था 

अब तुम्हारी पोशाक का बॉर्डर है 

लेकिन 

उसे पहन कर भी तुम 

बस एक भीगा हुआ कुत्ता दिखते हो। 


तिब्बती कवि - भुचुंग डी. सोनम (जन्म 1972)

संग्रह - ल्हासा का लहू, निर्वासित तिब्बती कविता का प्रतिरोध 

संकल्पना एवं अनुवाद - अनुराधा सिंह 

प्रकाशन - वाणी प्रकाशन और रज़ा फ़ाउण्डेशन, प्रथम संस्करण, 2021 


निर्वासन में रह रहे तिब्बती कवि की यह बात कहाँ नहीं लागू होती है ! बस कवि से असहमति वहाँ है जहाँ हड़पनेवाले को भीगा हुआ कुत्ता कहा गया है क्योंकि यह कुत्ते के लिए अपमानजनक है। सवाल है कि सबको हड़पने-निगलने-मसलने में लगे हुओं को क्या कहा जाए !

शुक्रवार, 24 जून 2022

गवाची लकीर (Sara Shagufta translated in Hindi)

 सारी चीज़ें खो गई हैं 

आसमान के पास भी काँटा तक नहीं रहा 

जभी तो मिट्टी में बोलने वाले बोलते नहीं 

गूँज भी गूँगी हो गई है

रब भी नहीं बोलता  

सारी चीज़ें खो गई हैं 

मेरे बर्तन 

मेरी हँसी  

मेरे आँसू 

मेरे मक्र 

सारी चीज़ें खाली हैं और खो गई हैं 

बच्चों के खिलौने 

और मेरे श्टापू का कोयला वक़्त लकीर गया है 

आँखों में कोई शक्ल नहीं रह गई है 

सारी चीज़ें खो गई हैं 

मेरे चेहरे 

मेरे रंग 

मेरे इन्साफ़ 

जाने कहाँ खो गए हैं 

दिल का चेहरा आँख हुआ जाता है 


मज़ाक पुराने हो गए हैं 

हँसी चारपाई कस रही है 

चाँद की रूनुमाई के लिए सूरज आया है 

तो आसमान खो गया है 

सुलूक भी खो गए हैं 

वो भी कभी नहीं आए 

जिनके लिए आँखें रखी थीं 

और दिल खत्म किए थे 

आँखों को रसूल  कहा था 

और दिल को रब कहा था 

सारी चीज़ें खो गई हैं 


मक्र = छल, बहाना 

रूनुमाई = मुँहदिखाई 


पाकिस्तानी शायरा - सारा शगुफ़्ता 

संग्रह - नींद का रंग 

लिप्यंतरण और संपादन - अर्जुमंद आरा 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2022  


कुछ रोज़ पहले मैंने भोपाल की यात्रा में इस किताब को उठाया। शीर्षक ने ही अपनी तरफ ध्यान खींचा था। तब तक मुझे सारा शगुफ़्ता के बारे में कुछ खास मालूम नहीं था। अर्जुमंद आरा ने जो परिचय दिया है उसने काफी उत्सुकता जगा दी। "पाकिस्तान में नारीवादी उर्दू शायरी की एक उत्कृष्ट लेकिन बहिष्कृत सारा शगुफ़्ता" यह पहला ही वाक्य पर्याप्त था संग्रह को पढ़ जाने के लिए। ईमानदारी की बात है कि एक साँस में यह छोटा-सा संग्रह नहीं पढ़ पाई। साँस टूटती रही कविताओं में से झाँकती सारा शगुफ़्ता की ज़िंदगी का अंदाजा लगाकर। भाषा की दिक्कत भी बीच बीच में आड़े आई। यात्रा से लौटकर हिन्दी और उर्दू के शब्दकोशों को पलटा तो भी कुछ अर्थ हाथ न आए, जैसे 'गवाची' या 'श्टापू' का। सारा खुद बहुत जगह उखड़ी उखड़ी नज़र आती हैं तो तारतम्यता खोजने का मेरा प्रयास भी व्यर्थ जा रहा था। बातों का सिरा कई बार पकड़ में नहीं आया मेरे, फिर भी जो कशिश है उनमें वह दूसरी शायरी से जुदा है। बानगी के तौर पर यह ! हाँ, एक बात जो बड़ी देर तक मेरे मन में चक्कर काटती रही, वह है आँखों को लेकर सारा शगुफ़्ता के प्रयोग। उनकी फ़ेहरिस्त बनाने का मन किया। वैसे अनोखे और अजीबोगरीब वाक्य देखकर सारा की तड़प ही नहीं, ताकत का भी पता चलता है। 

गुरुवार, 23 जून 2022

मुम्बई का तिब्बती (The Tibetan in Mumbai by Tenzin Tsundue)

वह जो  तिब्बती है मुम्बई में 

विदेशी नहीं 

चाइनीज होटल 

में रसोइया है 

लोग उसे 

बीजिंग से आया हुआ चीनी समझते हैं 


गर्मियों में परेल ब्रिज के नीचे 

स्वेटर बेचता है 

लोग सोचते हैं कि 

कोई रिटायर्ड 'बहादुर' है  


मुम्बई का तिब्बती 

ज़रा तिब्बती लहजे में 

मुम्बइया गाली दे लेता है 

भाषा का संकट आते ही 

तिब्बती बोलने लगता है 

पारसी उसकी इसी बात पर हँसते हैं 


मुम्बई के तिब्बती को 

मिड-डे पढ़ना पसन्द है 

एफएम उसका पसन्दीदा है 

यह जानते हुए भी कि इसमें 

कभी तिब्बती गाना नहीं बजेगा 


वह एक सिग्नल से बस पकड़ता 

चलती ट्रेन में चढ़ता 

एक लम्बी काली गली से गुज़रते हुए 

बहुत नाराज़ हो जाता है जब 

लोग 'चिंग-चौंग, पिंग-पौंग' कहकर 

उस पर हँसते हैं 


मुम्बई का तिब्बती 

बहुत थक गया है 

उसे थोड़ी नींद चाहिए और एक सपना 

कि 11 बजे की विरार फास्ट 

उसे हिमालय ले जाये 

और 8.05 की फास्ट लोकल 

वापस पहुँचा दे चर्चगेट  

फिर उसी महानगर के उसी नव साम्राज्य में। 


तिब्बती कवि - तेनज़ीं सुण्डु 

संग्रह - ल्हासा का लहू, निर्वासित तिब्बती कविता का प्रतिरोध 

संकल्पना एवं अनुवाद - अनुराधा सिंह 

प्रकाशन - वाणी प्रकाशन और रज़ा फ़ाउण्डेशन, प्रथम संस्करण, 2021 

बुधवार, 22 जून 2022

प्यारी (Poem by Bahadur Shah Zafar)

प्यारी तेरो प्यारो आयो प्यारी 

प्यारी बातें कर प्यारे को मनाइये । 

अनेक भाँतन कर प्यारे को रिझाइए

आली ऐसी प्यारो कहाँ घर बैठे पाइये ।। 

लाइए समुझाइए कौन भाँतन 

कर सुखदे बुलाइये । 

साह बहादुर तेरे रसबस भए 

अनरस कर कर सौतन हँसाइये ।। 


शायर - बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र 

संग्रह  - मुग़ल बादशाहों की हिन्दी कविता 

संकलन एवं संपादन - मैनेजर पाण्डेय 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2016  


यह अच्छा संकलन है। बस मुझे उलझन हो रही है हिज्जे को देखकर। कहीं 'पाइये' तो कहीं 'लाइए'। मुमकिन है कि मूल से हिन्दी में छपाई तक आते आते यह हुआ हो। अक्सर इतने हाथों से रचना गुज़रती है कि एकरूपता नहीं रह जाती है। हालाँकि हर जगह एकरूपता लाना या खोजना भी बहुत सही नहीं। 



मंगलवार, 21 जून 2022

मुल्का (Mulka by Dhoomil)

 मुल्का मियाँइन हैं 

उम्र साठ-बासठ के बीच है 

ए बचवा! ई सब कहकूत है। 

न हिन्नू मरै न मुसल्मान  

दंगा फसाद पेट भरले का गलचऊर है। 

- असल बात अउर है। 

जे सच पूछा तो परान 

ई गरीबन कै जात है। 

मुल्का क जिनगी एकर सबूत है। 

बीस बरिस बीत गयल मुल्का के। 

कुक्कुर एस गाँव-गाँव, घरे-घरे घूमते 

लेकिन कभी केहू एनसे ना पुछलेस - 

कि ए मुल्का बुजरो !

का तुहऊँ इंसान है ?


लोग राजा से रंक और रंक से राजा भयेल 

लेकिन मुल्का के दुनिया 

ई दौरी में दुकान है । 

                          - 1969 


संकलन : धूमिल समग्र, खंड 1  

संकलन-संपादन : डॉ. रत्नशंकर पाण्डेय 

प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स, पहला संस्करण, 2021