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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

संभाषण (Sambhashan by Balkrishn Sharma 'Naveen')



आज चाँद ने खुश-खुश झाँका,
काल-कोठरी के जँगले से ;
गोया मुझसे पूछा हँसकर
कैसे बैठे हो पगले-से ?

कैसे ? बैठा हूँ मैं ऐसे -
कि मैं बंद हूँ गगन-विहारी ;
पागल-सा हूँ ? तो फिर ? यह तो
कह कर हारी दुनिया बेचारी ;

मियाँ चाँद, गर मैं पागल हूँ -
तो तू है पगलों का राजा ;
मेरी तेरी खूब छनेगी,
आ जँगले के भीतर आ जा ;

लेकिन तू भी यार फँसा है -
इस चक्कर के गन्नाटे में ;
इसीलिए तू मारा-मारा -
फिरता है इस सन्नाटे में ;

अमाँ, चकरघिन्नी फिरने का -
यह भी है कोई मौजूँ छिन ?
गर मंजूर घूमना ही है,
तो तू जरा निकलने दे दिन ;

यह सुन वह आदाब बजाता -
खिसक गया डंडे के नीचे ;
और कोठरी में 'नवीन' जी
लगे सोचने आँखें मीचे.
                       - 1933

कवि - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
संग्रह - पदचिह्न 
संपादक - नंदकिशोर नवल, संजय शांडिल्य 
प्रकाशक - दानिश बुक्स, दिल्ली, 2006

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आलोचनात्मक रवैया (On the Critical Attitude by Bertolt Brecht)





     
            आलोचनात्मक रवैया 
            कई लोगों को व्यर्थ प्रतीत होता है 
            इसलिए कि वे राज्य को पाते हैं 
            अपनी आलोचना के प्रति असंवेदनशील           
            लेकिन इस मामले में जो निष्फल है
            
वह दरअसल सिर्फ एक कमज़ोर रवैया है
            
आलोचना को शस्त्र दो            
            और उससे राज्य ध्वस्त किए जा सकते हैं

           
 किसी नदी को नहरों में बाँधना
            
एक फलदार वृक्ष की कलम लगाना
           
किसी एक व्यक्ति को शिक्षित करना
            
एक राज्य को बदलना
            
ये सब सार्थक आलोचना के उदाहरण हैं
           
 और साथ ही कला के उदाहरण भी.                   



              जर्मन कवि - बर्तोल्त ब्रेख्त 
            स्रोत - पोएमहंटर डॉट कॉम
            अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद    
  

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

बचपन के दोस्त जयदेव गुप्ता के नाम पत्र (Bhagat Singh's letter to Jaydev Gupta, a Childhood friend)



सेण्ट्रल जेल, लाहौर
3 जून, 1930
मेरे प्रिय श्री जयदेव,
               कृपा करके मेरा हार्दिक धन्यवाद स्वीकार कीजिए, कपड़े के उन जूतों और सफ़ेद पालिश की शीशी के लिए जो आपने भेजे हैं. आपके शब्दों में (जैसा कि श्री कुलबीर ने कहा) मैं आपको कुछ अन्य चीजें लाने को यह पत्र लिख रहा हूं. मुझे विश्वास है कि आप इसे महसूस नहीं करेंगे. कृपया देख लें कि क्या आप श्री बी.के. दत्त के लिए कपड़े का एक और जूता भेजने की व्यवस्था कर सकते हैं (साइज नं. सात), लेकिन दुकानदार से वापसी की शर्त पर लेना, शायद इनके पैर में फिट न आए. यह बात मैंने अपने लिए लिखते समय ही लिखी होती, पर श्री दत्त उस दिन सरल भाव (ईजी मूड) में नहीं थे. लेकिन मेरे लिए इसे अकेले पहनना मुश्किल है. इसलिए मैं आशा करता हूं कि अगली मुलाक़ात के समय एक और जूता यहां होगा. 
               साथ ही कृपया एक ट्वैल शर्ट (कमीज) जिसका साइज छाती 34 और कमर 29 हो, भेज दें. उस पर शेक्सपीरियन कालर हो और आधी आस्तीन हो. यह भी श्री दत्त के लिए चाहिए. क्या आप सोचेंगे कि हम जेल में भी अपने रहन-सहन के खर्चीले ढंग पर रोक नहीं लगा सके ? अंततः यह आवश्यकताएं हैं, विलासिताएं नहीं. नहाने और व्यायाम करने के लिए किसी मुलायम कपड़े के दो लंगोट भी भेज दें और कपड़े धोने के साबुन की कुछ टिकियाएं भी. साथ ही कुछ बादाम और स्वान इंक की एक शीशी भी.
              सरदार जी (पिता जी) के बारे में क्या खबर है ? क्या वे लुधियाना से वापस आ गए हैं ? इन दिनों में कचहरी बन्द रहेगी और मुकदमा आगे नहीं बढ़ा. यदि वे नहीं आए तो उन्हें लाने के लिए किसी को भेज दें. जो हो, उनके और मेरे मुकदमे का अन्त करीब ही है. कह नहीं सकता कि हमें एक-दूसरे को मिलने का और अवसर मिलेगा या नहीं, इसलिए उन्हें तुरंत बुला लें, ताकि वे इस सप्ताह में मुझसे दो बार मिल सकें. यदि वे जल्दी ही नहीं आ पा रहे हैं तो कृपा कर कुलबीर और बहन जी को मुझसे मुलाकात के लिए कल या परसों भेज दें. मेरे मित्रों को मेरी याद दिलाना. क्या आप फारसी का एक कायदा उर्दू अनुवाद सहित भेजने की व्यवस्था कर सकेंगे ? चार आने की सूची भी भेज दें.
तुम्हारा भगतसिंह 


लेखक - भगतसिंह 
किताब - भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज 
संपादक - चमनलाल 
प्रकाशक - आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, 2004

सोमवार, 13 अगस्त 2012

क्लैरा रिल्के के नाम ख़त (Letter to Clara Westhoff Rilke by Rainer Maria Rilke)



होटल द फ़्लोरेंस, वीआरेग्गिओ, पीसा के पास (इटली),अप्रैल 8, 1903 
                                                                                                                                                                                                                                                                        

फिर एक व्यग्र और आक्रामक दिन. समुद्र में तूफ़ान पर तूफ़ान. भागती दौड़ती रोशनी. जंगल में रात. चारों ओर शोर. मैं पूरी सुबह जंगल में घूमता रहा. चार पाँच चौंधियाए दिनों के बाद वहाँ का अँधेरा, शीतलता और ठण्डी हवाओं का स्पर्श मेरी इन्द्रियों को सुखद लगा. तुम इस जंगल की कल्पना करो-बहुत लम्बे तनों वाले, घने, शाखाएँ फैलाए सीधे उठते हुए चीड़ के पेड़ और ऊँचे पहुँचकर उनके सर पर फैलती शाखाएँ. नीचे की ज़मीन झरी हुई तीलियों से पूरी तरह काली, उस पर खड़ी लम्बी कँटीली ब्रूमबुश की झाड़ियाँ...झाड़ियों पर पीले फूलों की लदान...लदान पर लदान. इस ठण्डी अँधेरी साँझ में यह झूमता डोलता पीला रंग ऐसे लग रहा था जैसे यह अकेला जंगल अन्दर से दीप्त हो गया हो. मैं घण्टों इधर से उधर घूमता रहा (धूप खाने के बाद मैं नंगे पाँव इधर निकल आया था) और देर तक सोचता रहा....मुझे लगता है जहाँ तक सम्भव हो हर किसी को अपने ही कर्म में अपने जीवन का केन्द्र ढूँढ सकना चाहिए और उसी केन्द्र से विकसित होते-होते, विस्तृत होना चाहिए. यह ज़रूरी है कि इस प्रक्रिया को कोई देख न रहा हो. अपना अभिन्न व्यक्ति तो बिल्कुल नहीं, बल्कि अपना आप भी नहीं. अपने से परे होकर देखने की क्रिया में एक प्रकार की शुद्धता और शुचिता है. जब दृष्टि, किसी प्रकृतिप्रदत्त वस्तु पर लगी हो, उसे आत्मसात कर रही हो और अपने हाथ स्वतः ही, बहुत नीचे, डरते टटोलते आह्लादित होते चेहरे से दूर, कहीं बहुत दूर चले गये हों ; तो चेहरा सितारे की तरह रह जाता है, जो देखता नहीं केवल 'चमकता' है. मुझे लगता है मैंने सदा ऐसे ही किया है. मेरी दृष्टि दूर सुदूर की किन्हीं चीज़ों में लिप्त रही है और मेरे हाथ अलग से कहीं और कार्यरत रहे हैं. ऐसा ही होना चाहिए. ऐसा आगे भी होगा पर इसके लिए मुझे इतना एकान्त मिलना चाहिए जितना अब है. 
मेरे एकान्त को पहले उस बिनरौंदे जंगल की तरह सुदृढ़ और सुरक्षित होना चाहिए जिसे पैरों की आहट का कोई डर नहीं होता. उसे हर आग्रह, हर असाधारण मूल्य और हर बाध्यता से रहित होना चाहिए. उसे रोजमर्रा जैसा स्वाभाविक और सामान्य होना चाहिए. विचार जो आएँ चाहे वह कितने भागते हुए हों मेरे एकान्त में मुझसे मिलें और मुझे विश्वस्त मानने के लिए संकल्पित हों. मेरे लिए इससे भयानक कोई दूसरी बात नहीं है कि मैं अपने एकान्त का अभ्यस्त न हो पाऊँ, बल्कि अब तो हो चला हूँ.                                                                                                                                                                                                                          


लेखक - राइनेर मारिया रिल्के
किताब - रिल्के के प्रतिनिधि पत्र 
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - राजी सेठ
प्रकाशक - साहित्य अकादेमी, दिल्ली, 1999   


जर्मन कवि रिल्के (1875 -1926) का गद्य कविता से कम नहीं. और वे कहते हैं, "मेरी कविताएँ मेरी आत्मा की खुशहाली से उपजती हैं. बड़े भूखण्ड, लम्बी सड़कें, नरम दूब, कड़ी सड़कों पर या शुभ्र हिम पर नंगे पाँव चलते होना, गहरे श्वास सुनना, केवल सुनना, घोर निश्शब्दता, लम्बी शामों के प्रति नमित हो सकना यह (ये) सब क्रियाएँ मेरी कविताओं की सम्पत्ति हैं."   

रविवार, 12 अगस्त 2012

मिरातुल-उरूस (Miratul-Uroos by Nazir Ahmad)




लिखने को लोगों ने नाहक़ बदनाम कर रखा है कि मुश्किल है मुश्किल. कुछ भी मुश्किल नहीं है. लेकिन फ़र्ज़ करो कि पढ़ने की निस्बत लिखना कुछ मुश्किल है तो वैसी ही उसकी मुनफ़अतें भी हैं. जो शख़्स पढ़ना जानता है और लिखना नहीं जानता उसकी मिसाल उस गूँगे की सी है जो दुसरे की सुनता और अपनी नहीं कह सकता. अगर कोई शख़्स शुरू-शुरू में किसी किताब से ज़्यादा नहीं एक सतर दो सतर रोज़ नक़ल किया करे और इसी तरह अपने दिल से बनाकर लिखा करे और इस्लाह लिया करे और नक़ल करने और लिखने में झेंपे और झिझके नहीं तो ज़रूर चंद महीनों में लिखना सीख जायगा. खुशख़ती से मतलब नहीं. लिखना एक हुनर है जो ज़रूरत के वक्त बहुत काम आता है. अगर ग़लत हो या हर्फ़ बदसूरत और नादुरुस्त लिखे जायँ तो बेदिल होकर मश्क़ को मौकूफ़ मत करो. कोई काम हो इब्तदा में अच्छा नहीं हुआ करता. अगर किसी बड़े आलिम को एक टोपी कतरने और सीने को दो जिसको कभी ऐसा इत्तिफ़ाक़ न हुआ हो वो ज़रूर टोपी ख़राब करेगा. चलना-फिरना जो तुमको अब ऐसा आसान है कि बेतकल्लुफ़ दौड़ी-दौड़ी फिरती हो, तुमको शायद याद न रहा हो कि तुमने किस मुश्किल से सीखा. मगर तुम्हारे माँ-बाप और बुज़ुर्गों को बखूबी याद है कि पहले तुमको बेसहारे बैठना नहीं आता था. जब तुमको गोद से उतारकर नीचे बिठाते एक आदमी पकड़े रहता था. या तकिये का सहारा लगा देते थे. फिर तुमने गिर-पड़कर घुटनों चलना सीखा. फिर खड़ा होना लेकिन चारपाई पकड़कर. फिर जब तुम्हारे पाँव ज़्यादा मज़बूत हो गए रफ़्ता-रफ़्ता चलना आ गया मगर सदहा मर्तबा तुम्हारे चोट लगी और तुमको गिरते सुना. अब वही तुम हो कि खुदा के फ़ज़्ल से माशा-अल्लाह दौड़ी-दौड़ी फिरती हो. इसी तरह एक दिन लिखना भी आ जायगा. और फ़र्ज़ करो तुमको लड़कों की तरह अच्छा लिखना न भी आया तो बक़दरे ज़रूरत तो ज़रूर आ जायगा और यह मुश्किल तो नहीं रहेगी कि धोबन की धुलाई और पीसने वाली की पिसाई के वास्ते दीवार पर लकीरें खींचती फिरो. या कंकर-पत्थर जोड़कर रखो. घर का हिसाब ओ किताब लेना-देना ज़बानी याद रखना मुश्किल है. और बाज़ मर्दों की आदत होती है कि जो रुपया-पैसा घर में दिया करते हैं उसका हिसाब पूछा करते हैं. अगर ज़बानी याद नहीं है तो मर्द को शुबहा होता है कि यह रुपया कहाँ खर्च हुआ और आपस में नाहक़ बदगुमानी पैदा होती है. अगर औरतें इतना लिखना भी सीख लिया करें कि अपने समझने के वास्ते काफ़ी हो तो कैसी अच्छी बात है.


   लेखक - नज़ीर अहमद  
   किताब - मिरातुल-उरूस (गृहिणी-दर्पण)
   हिन्दी लिप्यंतर - मदनलाल जैन 
   प्रकाशक - साहित्य अकादेमी, दिल्ली, 1958


'उर्दू भाषा की घरेलू जीवन की शिक्षा देने वाली अमर रचना' के रूप में   मशहूर डिप्टी नज़ीर अहमद का यह छोटा-सा नाविल मिरातुल-उरूस (गृहिणी-दर्पण) वाकई महत्त्वपूर्ण है. इसे उन्होंने अपनी बेटी के पढ़ने के लिए लिखा था. आगे जाकर "यह किताब जिसके अरबी नाम को बदलकर लोगों ने 'अकबरी असग़री की कहानी' कर लिया था, न सिर्फ़ लड़कियों की बल्कि बड़ी उम्र के मर्दों और औरतों की भी सबसे महबूब किताबों में शुमार होती थी." इसमें क्या, अधिकांश जगह लड़कियों की तालीम के मकसद को लेकर बहस की जा सकती है, लेकिन इसके अंदाज़े बयान का जादू सब पर चलके रहता है. इस किताब का पहला बाब यानी अध्याय है - 'तमहीद के तौर पर औरतों के लिखने-पढ़ने की ज़रूरत और उनकी हालत के मुनासिब कुछ नसीहतें'. प्रस्तुत अंश उसी से है.      

शनिवार, 11 अगस्त 2012

गधा (The Ass by Eduardo Galeano )




उसने नवजात यीशु को नाँद में गर्माहट दी, और यही वजह है कि वह सारी तस्वीरों में है, पुआल के बिस्तरे  के बगल  में बड़े-बड़े कानों के साथ पोज़ देते हुए.
गधे की पीठ पर सवार, यीशु हेरोद की तलवार से बच निकले.
गधे की पीठ पर, उन्होंने तमाम ज़िंदगी चक्कर लगाया.
गधे की पीठ पर , उन्होंने धर्मोपदेश  दिया.
गधे की पीठ पर, उन्होंने  जेरुसलम में प्रवेश किया.
तो फिर गधा शायद इतना गधा भी नहीं ?


   लेखक - एदुआर्दो  गैलीयानो 
   स्पैनिश से अंग्रेज़ी अनुवाद - मार्क फ्राइड 
   किताब - मिरर्स 
   प्रकाशक - नेशन बुक्स, न्यूयार्क, 2009
   अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

घर पहुँचना (Ghar pahunchana by Kunwar Narayan)



हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर
अपने अपने घर पहुँचना चाहते 

हम सब ट्रेनें बदलने की 
झंझटों से बचना चाहते

हम सब चाहते एक चरम यात्रा
और एक परम धाम

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं
और घर उनसे मुक्ति

सचाई यूँ भी हो सकती है
कि यात्रा एक अवसर हो
और घर एक संभावना

ट्रेनें बदलना
विचार बदलने की तरह हो
और हम जब जहाँ जिनके बीच हों
वही हो
घर पहुँचना


कवि - कुँवर नारायण
संग्रह - कोई दूसरा नहीं
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1993