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मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

मन मूरख (Man moorakh by Meeraji)

मन मूरख मिट्टी का माधो, हर साँचे में ढल जाता है 
इसको तुम क्या धोका दोगे, बात की बात बहल जाता है 

जी की जी में रह जाती है, आया वक़्त ही ढल जाता है 
ये तो बताओ, किसने कहा था काँटा दिल से निकल जाता है 

क्यों करती है अन्धी क़िस्मत अपने भावें आनाकानी 
जग के मुँह पर हँसी-कहानी देखके जी ही जल जाता है 

झूठ-मूठ ही होंट खुले तो दिल ने जाना अमृत पाया 
एक-इक मीठे बोल पे मूरख दो-दो हाथ उछल जाता है 

जैसे बालक पा के खिलौना तोड़ दे उसको और फिर रोए 
वैसे आशा के मिटने पर मेरा दिल भी मचल जाता है 

सुध बिसरे पर हँसनेवालो, चाह की राह चलो तो जानो 
ओछा पड़ता है हर दाँव जब ये जादू चल जाता है 

अब तो साँस यूँ ही आते हैं, काँपते-काँपते कुछ ठहराव 
जैसे रस्ता चलते शराबी गिरते-गिरते सँभल जाता है 

जीवन-रेत की छान-पटक में सोच-सोच दिन-रैन गँवाए 
बैरन वक़्त की हेराफेरी, पल आता है, पल जाता है 

'मीराजी' दर्शन का लोभी, बिन बस्ती जोग का फेरा 
देख के हर अनजानी सूरत पहला रंग बदल जाता है 


शायर - मीराजी 
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मीराजी 
संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010


सोमवार, 15 अप्रैल 2013

दिल्ली में बबूल (Dilli mein babool by Kedarnath Singh)


वह जाड़ों की एक शाम थी 
मैं चला जा रहा था अकेला 
कि अचानक मेरी दृष्टि पड़ी -
धूल से ढँका 
और काँटों से लदा वह खड़ा था उदास 
आती-जाती बसों को 
एकटक देखता हुआ 

बबूल है - मैंने पहचाना 
जैसे भीड़ में कोई बचपन के दोस्त को पहचान ले 
और उसे देखकर ऐसा कुछ हुआ 
कि रख दिया प्रस्ताव 
चलो कनाट प्लेस चलें !

कनाट प्लेस जाने का 
मेरा कोई इरादा नहीं था 
वैसे भी टी-हाउस की चाय से 
मुझे एक चुक्कड़ की चाय से उठाती हुई भाप 
ज़्यादा आकृष्ट करती है 

पर सवाल एक उदास बबूल का था 
जिसे मैं बरसों से जानता था 
सोचा, हर्ज़ क्या है 
शायद इस तरह झर जाए उसकी कुछ उदासी 
और हो सकता है कनाट प्लेस भी हो जाए 
थोड़ा और समृद्ध !

पर अब सवाल था 
वह जाएगा कैसे ?
मैंने एक तिपहिया की ओर देखा 
और हो गया उदास 

लेकिन प्रस्ताव तो मैं रख चुका था 
और उधर बबूल था 
कि हवा में फेंके जा रहा था 
अपनी पुरानी पत्तियाँ  
जैसे चलने से पहले 
कपड़े बदल रहा हो !

मेरे अन्दर से आवाज़ आई -
सोचते क्या हो 
जाने दो बबूल को 
अगर जाता है कनाट प्लेस
हर बाज़ार में होना ही चाहिए काँटों से लदा 
एक बबूल का पेड़ 
बाज़ार के स्वास्थ्य के लिए !

और बबूल का स्वास्थ्य !

मेरे पास कोई उत्तर नहीं था 
शायद कोई उत्तर नहीं था 
किसी के पास भी 

सो, मैंने अपना प्रस्ताव वापस लिया 
और बबूल को छोड़ दिया वहीं 
जहाँ खड़ा था वह 
रास्ते-भर अपनी शर्म को छिपाता हुआ सोचता रहा मैं -
कितनी हास्यास्पद थी मेरी सारी सहानुभूति  
एक बबूल के सामने 
जो अपनी उदासी के बीच भी 
खड़ा था तनकर 

कवि - केदारनाथ सिंह 
संकलन - तालस्ताय और साइकिल 

प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2005 





रविवार, 14 अप्रैल 2013

झील के किनारे (Jheel ke kinare by Dharmvir Bharati)


चल रहा हूँ मैं
कि मेरे साथ
कोई और
चलता
जा रहा है !
दूर तक फैली हुई
मासूम धरती की
सुहागन गोद में सोये हुए
नवजात शिशु के नेत्र-सी
इस शान्त नीली झील
के तट पर,
चल रहा हूँ मैं
कि मेरे साथ
कोई और
चलता
जा रहा है !
गोकि मेरे पाँव
थककर चूर
मेरी कल्पना मजबूर
मेरे हर क़दम पर
मंज़िलें भी हो रही हैं
और मुझसे दूर
हज़ारों पगडण्डियाँ भी
उलझनें बनकर
समायी जा रही हैं
खोखले मस्तिष्क में,
लेकिन,
वह निरन्तर जो कि
चलता आ रहा है साथ
इन सबों से सर्वथा निरपेक्ष
लापरवाह
नीली झील के
इस छोर से
उस छोर तक
एक जादू के सपन-सा
तैरता जाता,
उसे छू
ओस-भीगी 
कमल पंखुरियाँ
सिहर उठतीं,
कटीली लहरियों
को लाज रंग जाती
सिन्दूरी रंग,
पुरइन की नसों में
जागता
अँगड़ाइयाँ लेता
किसी भोरी कुँआरी
जलपरी
के प्यार का सपना !
कमल लतरें
मृणालों की स्नान-शीतल
बाँहें फैलाकर
उभरते फूल-यौवन के
कसे-से बन्द ढीले कर
बदलती करवटें,
इन करवटों की
इन्द्रजाली प्यास में भी
झूम लहराकर
उतरता, डूबता,
पर डूबकर भी
सर्वथा निरपेक्ष
इन सबों के बन्धनों को
चीरकर, झकझोरकर
वह शान्त नीली झील की
गहराइयों से बात करता है,
गोकि मेरा पन्थ उसका पन्थ
उसके क़दम मेरे साथ
किन्तु वह गहराइयों से
बात करता चल रहा है !
सृष्टि के पहले दिवस से
शान्त नीली झील में सोयी हुई गहराइयाँ
जिनकी पलक में
युग-युगों के स्वप्न बन्दी हैं !
पर उसे मालूम है
इन रहस्यात्मक,
गूढ़ स्वप्नों का
सरलतम अर्थ
जिससे हर क़दम
का भाग्य,
वह पहचान जाता है !
इसलिए हालाँकि मेरे पाँव थककर चूर
मेरी कल्पना मजबूर
मेरी मंज़िलें भी दूर
किन्तु फिर भी
चल रहा हूँ मैं
कि, कोई और मेरे साथ
नीली झील की
गहराइयों से बात करता चल रहा  है !

कवि - धर्मवीर भारती
संग्रह - कुछ लम्बी कविताएँ 
संकलन - संयोजन - पुष्पा भारती
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1998

कई बार अच्छे-से अच्छे कवियों को पढ़ते समय कुछ बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं पर अटक जाती हूँ, फिर भी वे पसंदीदा बने रहते हैं।


शनिवार, 13 अप्रैल 2013

मैंने सपना देखा (Maine sapna dekha by Bruno K. Öijer)


मैंने सपना देखा 
मैंने सपना देखा कि मुझे चाहा जा रहा है
मैंने सपना देखा कि चन्द्रमा क्षीण होता जा रहा है
मैंने सपना देखा 
उस कोमलता का जिसका पात्र हूँ मैं
मैंने सपना देखा कैसे विलुप्त शब्द मेरे पास लौट आया था
कैसे झूम रहा था मेरे भीतर
और आँसुओं की वर्णमाला की तरह भर आया था
मैंने सपना देखा स्वयं का
मैंने सपना देखा बर्फ़ से ठण्डे अकेलेपन का
मैंने सपना देखा कि अन्तरिक्ष घूम रहा था आकाशचक्र के गिर्द
और मोमबत्ती अब भी टिमटिमा रही थी
बाती के आसपास
एक तीख़ी नीली चमक जो बुझने का नाम नहीं लेती थी
मैंने सपना देखा स्वयं का
मैंने सपना देखा एक ख़ास बालक का
दुनिया की ओर पीठ किये
अपनी आवाज़ के पत्तों के नीचे झूलते हुए मैंने समुद्रपान किया
छायाएँ घिर आयीं मेरे जिस्म के आसपास
मुझे आलिंगन में लेती हुई


स्वीडी कवि - ब्रूनो क. अयर (1951)
स्वीडी से हिन्दी अनुवाद - बिर्गित्ता वॉलीन की मदद से तेजी ग्रोवर 
संकलन - बर्फ़ की खुशबू : स्वीडी कविताएँ 
संपादक - तेजी ग्रोवर, लार्श एण्डर्सन 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिली, 2001 

किताब में दिए गए परिचय के मुताबिक़ "ब्रूनो क. अयर ने अपने लेखन की शुरुआत 'स्टेंसिल कवि' के रूप में की ('स्टेंसिल कवि' उन्हें कहा जाता है जिन्होंने स्थापित प्रकाशन गृहों से बाहर रहकर अपनी रचनाएँ स्वयं प्रकाशित कीं और जिन्हें उन प्रकाशन गृहों द्वारा बाद में जगह दी गयी)l"

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

आविष्कार (Avishkar by Kumar Ambuj)


[संध्या के लिये]

     हम धूल के बादलों को पीछे छोड़ आये हैं 
     तूफ़ानों से गुज़रने के निशान नश्वर देह पर हैं 
     हमारे आगे पाँच हज़ार साल हैं अभी 

     दरअसल, अब समय का कोई अर्थ नहीं रह गया है 

     हमारे पास आकाशगंगाएँ हैं 
     और साथ-साथ चलते आने से यह ज़मीन और यह हवा 
     अँधेरे में जब हम एक-दूसरे को छूते हैं 
     तो प्रकाश होता है

     हम चंद्रमा की तरफ़ उस निगाह से देखते हैं 
     जो दाग़ नहीं सुंदरता देखती है

     इस चाँदनी में यह जान लेना कितना अलौकिक है 
     कि तुम लौकिक हो 
     और मैं तुम्हें अनुभव कर सकता हूँ इंद्रियों से l 



कवि - कुमार अंबुज
संकलन - अमीरी रेखा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2011

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

गान्धारी (Gandhari by Ajneya)


कितने प्रसन्न रहते आये हैं
युग-युग के धृतराष्ट्र, सोच कर
गान्धारी ने पट्टी बाँधी थी
होने को सुहागिन
     उन के अभाग की l
आह ! देख पाते वे -
मगर यही तो था उन का असली अन्धापन ! -
गान्धारी ने लगातार उन के अन्याय सहे जाने से
अत्याचारों के प्रति उन के
उदासीन स्वीकार भाव के
लगातार साक्षी होने से
अच्छा समझा था अन्धे हो जाना !

वह अन्धापन
नहीं वशंवद
पुरुष मात्र के अन्ध अहं का
उस का तिरस्कार है :
नारी की नकार मुद्रा
ज्वाला ढँकी हुई
यों अनबुझ l


कवि - अज्ञेय
संकलन - ऐसा कोई घर आपने देखा है
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1986

रविवार, 7 अप्रैल 2013

मिट्टी (Mittee by Mathilisharan Gupt)


        मिट्टी, तेरा क्या मोल ?
पड़ी है सबके पैरों तले 
उगाये तूने जो अंकुर भले 
        उन पर क्या वारूँ, बोल !



कवि - मैथिलीशरण गुप्त 
संकलन - स्वस्ति और संकेत 
प्रकाशक - साकेत प्रकाशन, चिरगाँव, झाँसी, द्वितीय संस्करण - 1983