Translate

शुक्रवार, 17 जून 2022

अजनबी (Ajnabi by Noman Shauq)

 क्यों बोयी गयी है 

हमारे खमीर में इतनी वहशत 

कि हम इन्तजार भी नहीं कर सकते 

फलसफों के पकने का 


यहाँ क्यों उगती है 

सिर्फ शक की नागफनी ही 

दिलों के दरमियां


कौन बो देता है  

हमारी जरखेज मिट्टी में 

रोज एक नया जहर !


यकीन के अलबेले मौसम 

तू मेरे शहर में क्यों नहीं आता !



संकलन : रात और विषकन्या 

प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली 

                 दूसरा संस्करण , 2010 

इस संकलन में कवि के नाम को छोड़कर शायद ही कहीं नुक़्ता लगाया गया है। 

मंगलवार, 14 जून 2022

धरती (Earth Poem by Mahmoud Darwish, translated in Hindi)

उदास शाम एक उजड़े हुए गाँव में 
आँखें अधनींदी 
मैं याद करता हूँ तीस साल 
और पाँच युद्ध 
उम्मीद करता हूँ कि मुस्तकबिल रखेगा महफ़ूज़ 
मेरी मक्के की बालियाँ 
और गायक गुनगुनाएगा 
आग और कुछ अजनबियों के बारे में 
और शाम बस किसी और शाम की तरह होगी 
और गायक गुनगुनाएगा 


और उन्होंने उससे पूछा : 
तुम क्यों गाते हो 
और उसने जवाब दिया 
मैं गाता हूँ क्योंकि मैं गाता हूँ ... 


और उन्होंने उसका सीना टटोला 
लेकिन उसमें पा सके सिर्फ उसका दिल 
और उन्होंने उसका दिल टटोला 
लेकिन पा सके सिर्फ उसके लोग 
और उन्होंने उसका स्वर टटोला 
लेकिन पा सके सिर्फ उसकी वेदना 
और उन्होंने उसकी वेदना टटोली 
लेकिन पा सके सिर्फ उसकी जेल 
और उन्होंने उसकी जेल टटोली 
लेकिन देख सके वहाँ खुद को ही जंजीरों में बँधा हुआ 


फ़िलिस्तीनी कवि - महमूद दरवेश 
स्रोत - https://www.poemhunter.com/poem/earth-poem-3/
हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 

सोमवार, 13 जून 2022

घात लगाए हुए बिल्ली ( Cat Lying in Wait by Shakila Azizzada)

अच्छा शगुन नहीं हैं

ये अल्फ़ाज़।


मुझे मत बतलाओ कि

स्वर्ग का दरवाज़ा

खुलता है मेरे होठों के बीच  से।

 

मेरी छातियों के बीच की दरार में

खुदा खुद लड़खड़ा जाता है।


मैं आऊँगी


और फिर

तुम्हारी साँस

मेरे भीतर साँस लेगी,

तुम्हारे फेफड़े भर जाएँगे

मेरी खुशबू से

तुम्हारी जीभ

बरसेगी, बरसेगी

बरसेगी फिर से मेरी त्वचा पर।

 

और मैं हथियार डाल दूँगी।


और इस बार

जब तुम आओगे तुम्हारी आँखों में उस चमक के साथ

मुझे चीर डालने को आमादा, तुम होगे ही

 

बिना किसी शक


उस काली बिल्ली की तरह

जो घात से अचानक छलाँग लगाती हो,

मेरा रास्ता अभी काटते हुए

तुम्हारे दरवाज़े पर उस गौरैया का शिकार करते हुए

जब तक कि वह गिर न गई

अचंभित और बंधक।

 

रसचक्र के लिए 'अफ़ग़ानी दूख्तरान' की स्क्रिप्ट पर काम करते हुए ढेर सारी रचनाओं से गुज़री मैं। उनमें से अनेकानेक को स्क्रिप्ट में शामिल नहीं कर पाई थी। उनमें से कुछ के लिए मन बहुत छटपटाया क्योंकि वे अफ़ग़ानी औरतों की खास आवाज़ थीं। ऐसी ही हैं शकीला अज़ीज़ज़ादा।

1964 में काबुल में जन्मी शकीला अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों से ही कहानियाँ और कविताएँ लिखने लगी थीं। पत्र-पत्रिकाओं में वे छपीं भी। अंतरंगता और औरत की चाहत को लेकर उन्होंने खुलकर लिखा है। काबुल विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई करने के बाद शकीला अज़ीज़ज़ादा ने नीदरलैंड के Utrecht विश्वविद्यालय में प्राच्य भाषाएँ एवं संस्कृति की पढ़ाई की। और अब वे वहीं रहती हैं। वे खूब लिखती हैं और कई विधाओं में उनको महारत हासिल है।

Herinnering aan niets (Memories About Nothing) नाम से उनका कविता संग्रह दरी और डच भाषा में छपा है। उन्होंने देश-विदेश में अपनी कविताओं का मंचन भी किया है। उनकी कई कविताओं का Mimi Khalvati और Zuzanna Olszewska.ने दरी भाषा से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। उनमें से एक कविता का हिन्दी अनुवाद यहाँ पेश है। अनुवादक हैं अपूर्वानंद।

स्रोत - https://www.poetrytranslation.org/poets/shakila-azizzada

 


रविवार, 12 जून 2022

मैं भरी हुई हूँ खालीपन के ख़याल से पूरी (Smoke Bloom by Nadia Anjuman)

मैं भरी हुई हूँ खालीपन के ख़याल से

 

पूरी।

 

 

एक विस्तृत अकाल

मेरी आत्मा के बुखार से तप रहे मैदानों में मुझे खौलाता है

और यह अजीब जलहीन उबाल

मेरी कविता की छवि में जीवन

उमगाता है.

 

मैं निहारती हूँ इस नई-जीवित तस्वीर को

एक विलक्षण गुलाब की

पूरे पृष्ठ पर फैली हुई लजाहट को।

 

लेकिन अभी पहली साँस ही ली है उसने

कि धुएँ के बादल

उसके चेहरे को धुँधला करने लगते हैं

और धुँआ उसकी सुगन्धित त्वचा को ग्रस लेता है।

 

अफ़ग़ानी कवयित्री - नादिया अंजुमन

काव्य संग्रह - गुले दूदी (धुएँ का फूल)

फ़रज़ाना मेरी के अंग्रेज़ी अनुवाद से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद

 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

मर्म (Marm by Raghuvir Sahay)

तू हतविक्रम श्रमहीन दीन

निज तन के आलस से मलीन

माना यह कुंठा है युगीन

        पर तेरा कोई धर्म नहीं ?

 

यह रिक्त-अर्थ उन्मुक्त छंद 

संस्मरणहीन जैसे सुगंध,

यह तेरे मन का कुप्रबंध 

         यह तो जीवन का मर्म नहीं ।


कवि - रघुवीर सहाय

किताब - रघुवीर सहाय रचनावली

संपादक - सुरेश शर्मा

प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली


रविवार, 6 जून 2021

सैर पर वापसी (Sair par wapsi by Purwa Bharadwaj)

सुबह की सैर पर फिर से जाने लगना कुछ वैसा ही है जैसे आपने अपने पर लगाए लॉकडाउन में ढील दे दी हो। तीन दिन पहले जब मैं निकली तो लगा कि ऑक्सीजन तो है, शायद मैंने उसको लेना छोड़ दिया था। तभी मैंने अपने को टोका कि ऑक्सीजन की कमी तो वाकई हुई जिससे कितने लोग पार नहीं पा सके। शायद उनके हिस्से का बचा हुआ ऑक्सीजन अब हम ले रहे हैं! यह कितना बड़ा अपराधबोध है! 

तब भी जीवन तो चलता ही है। उसकी गति बढ़ाते हुए सैर पर लौटना सचमुच सुकून लेकर आया। कुत्तों और बंदरों से बचते बचाते वापस सही सलामत लौट आना रणक्षेत्र से वापसी जैसा होते हुए भी। इसमें कोई वीरता का भाव नहीं है क्योंकि कुत्तों और बंदरों की अनजान के प्रति आशंका, उनकी ऊब और खान पान की कमी पर भी ध्यान जाता है। आज जब रामजस कॉलेज के फाटक के सामने 4 कुत्तों के झुंड ने घेरा तो हमारी प्रिंगल डर से गोद में चढ़ने को हुई। दूसरी तरफ एक लड़का हस्की को लेकर जा रहा था। उसने मुझे इशारा किया कि मैं सड़क के उस छोर से जाऊँ। मैंने कदम आगे पीछे करना चाहा तो दो जगह कुत्तों ने भात उगल रखा था और एक जगह टट्टी कर रखी थी। उसे पार करने में मन भिनभिना रहा था। वह लड़का सदाशयता में अपने हस्की का पट्टा थामे रुक गया था, मगर हस्की के करीब से निकलना भी मुझे सुरक्षित नहीं लग रहा था। चार-पाँच मिनट की पैंतरेबाजी के बाद कुत्तों का झुंड ही वापस हो गया। रामजस कॉलेज के हाते में। विद्यार्थियों और शिक्षकों से भले वह हाता सूना हो, मगर सिक्योरिटी गार्ड के साथ कुत्तों ने उसे आबाद कर रखा है। यह सैर से लौटते समय  की बात है। जाते समय एकदम सन्नाटा था। इतना कि मास्क उतार देने का मन कर रहा था। 

बुधवार, 19 मई 2021

एक लड़की है अल्पना (Alpana By Purwa Bharadwaj)

एक लड़की है अल्पना। बचपन की दोस्त। आठवीं में जब बाँकीपुर स्कूल (पटना) में दाख़िला हुआ तो हमारी दोस्ती हुई थी। खूबसूरत, स्मार्ट और मस्त। समय के साथ ये खूबियाँ और अधिक निखरीं ही, मद्धम एकदम नहीं हुईं।

उन दिनों जब लड़कियों का दोस्तों के यहाँ आना-जाना मुमकिन नहीं हुआ करता था, मुझे अल्पना के घर जाने का मौक़ा मिल जाता था। पूछो कैसे? मेरे पापा का खाने-पीने में शुद्ध चीज़ों के इस्तेमाल पर बड़ा ज़ोर था। अल्पना नाला रोड की तरफ़ कांग्रेस मैदान के पास रहती थी। माँ कांग्रेस मैदान के पास की एक दुकान से सरसों का तेल पेरवा कर ले जाती थी। स्कूल के बाहर दोस्त से मिलने का यह सुनहरा अवसर मैंने पा लिया था। कभी कभी माँ के साथ रिक्शे से मैं भी कांग्रेस मैदान चली जाती थी। दुकान जिस गली में थी ठीक उसके पहले अल्पना का घर पड़ता था। मैं मोड़ पर उतर जाती थी। तेल लेने में माँ को कभी-कभी आधा घंटा लग जाता था और वह मेरे लिए पर्याप्त होता था। अल्पना भी खूब खुश होती थी। तेल हमारे मेल का कारण बना था!

1980 के दशक के शुरुआती साल थे। पुराने बैच की दोस्तों की विदाई का आयोजन था। हमने मॉडर्न रामायण को खेलना तय किया। फिल्मी गीतों के माध्यम से। हमारे सीनियर और जूनियर को मिलाकर तीन बैच की लड़कियों का मेला था रामायण का यह मंचन। रिहर्सल के बहाने क्लास छोड़ कर मटरगश्ती, स्कूल में फिल्मी गानों की धुन पर नाचने-झूमने की छूट, गंगा किनारे की तरफ़ वक़्त बेवक़्त झुंड बनाकर चलने-फिरने ने हमको किशोरावस्था की गुदगुदी दी थी। जैसा कि सबको अंदाजा था, मॉडर्न रामायण में शोख और सुंदर अल्पना को 'कास्ट' किया गया था। राम की भूमिका में या सीता की भूमिका में, मैं ठीक ठीक भूल रही हूँ। लेकिन यह याद है कि ऊँचे कद, गौरवर्ण, नाज़ुक, लंबी, मुलायम ऊँगलियों वाली अल्पना ने जींस टॉप पहना था। उसकी खिलखिलाहट और दूसरी तरफ संजीदगी ने प्रस्तुति को यादगार बना दिया था।

मॉडर्न रामायण में हमारी मौज ही मौज थी। राम और सीता एक दूसरे को देखते हैं तो गाते हैं "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आए"। भरत राम से अयोध्या लौटने का आग्रह करते हुए गाते हैं "चल चल मेरे भाई, तेरे हाथ जोड़ता हूँ"। रामायण का रोमांस हमें रोमांटिक बना रहा था और हम अपनी उस सांस्कृतिक-राजनीतिक टिप्पणी से बेखबर थे। कुछ शिक्षिकाओं ने मुस्कुराते हुए हमें कहा था कि ज़्यादा फिल्मी मत बना देना रामायण को। अल्पना इस प्रसंग को याद करते हुए हमेशा खिल उठती थी।

एक साल गाँधी मैदान में गणतंत्र दिवस की परेड के समय होनेवाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में हम सब शामिल हुए थे. उस समय सफ़ेद कुरता-धोती के साथ पीला साफा और जूड़े के साथ साड़ी पहननेवाली लड़कियों का जोड़ा बना था. कितना रोमांचक था वह सब ! पटना के केन्द्रीय और सबसे बड़े सार्वजनिक स्थल में बड़े समूह के सामने ‘कन्या उच्च विद्यालय’ की किशोरियों का रंगबिरंगे कपड़ों में जाना उत्साहजनक अवसर था. कइयों के लिए यह बंद खिड़की का खुलना था. अल्पना जिस संपन्न परिवार से आती थी, उसके लिए बाहर आना-जाना सामान्य बात थी. फिर भी इकट्ठे जाने के नाम पर हम सब उत्सुक थे.

अल्पना स्कूल में भी एकदम सलीके से रहती थी और अभी भी। सलीका केवल पहनावे-ओढ़ावे में नहीं था, जीवन जीने में भी था। उसकी शादी की रात याद है मुझे। शादी के तुरत बाद उसने बड़ी बीमारी को झेला, ऐसे मानो कोई बड़ी विपत्ति न हो। पटना से बंबई की नियमित दौड़ लगाती रही। फिर परिवार के बारे में सोचती रही। बड़ा हादसा हुआ, लेकिन आगे बढ़ी। पति की नौकरी के साथ ख़ुश-ख़ुश शहर बदला। बेटे ने व्यस्तता के साथ नए सपने दिए। अंकल के चले जाने के झटके को बर्दाश्त करके अल्पना ने अपने छोटे भाई-बहन को सम्भाला। आंटी के अकेलेपन को भी भरने की भरपूर कोशिश की।

मुझे अल्पना से ही पहली बार पता चला कि एंजियोप्लास्टी किडनी की भी होती है। वह अपने अनुभव को डॉक्टरी नुस्ख़े की तरह बताती थी। जैसे तकलीफ़ होना और झेलना एकदम स्वाभाविक हो। उसके बाद किडनी ट्रांसप्लांट का पेचीदा, तकलीफ़देह सफ़र अल्पना ने आंटी का हाथ पकड़कर तय किया। बिस्तर पर रहने के दौरान मधुबनी पेंटिंग पर मन जमाया और कुकरी की किताब लिखने की तैयारी शुरू की। पुष्पेश पंत जी ने उसकी किताब 'माँ की रसोई से' का लोकार्पण किया था। पति का और घर भर का सहयोग बताते हुए वह थकती नहीं थी। तस्वीरों में उसके चेहरे से जो नूर टपकता दिखता है वह उसके भीतर का नूर ही है।

उसके बाद पेंटिंग की प्रदर्शनी लगी। कुकरी की प्रतियोगिताओं और शो में अल्पना केवल भागीदार नहीं थी, विजेता थी। बाग़वानी का शौक़ भी परवान चढ़ने लगा था। सुबह सुबह जब अपने टेरेस के बाग़ीचे की ताज़ा पैदावार की फ़ोटो वह हमारे स्कूल के ई सेक्शन के WhatsApp group में भेजती थी तो सबका मन ललच जाता था। सब्ज़ियों की ताज़गी से अधिक अल्पना की ताज़गी हमें सुहाती थी।

अभी 24 अप्रैल को अल्पना के जन्मदिन पर जब Sindhu ने वीडियो चैट पर मिलने का प्रस्ताव रखा तब किसी ने देर नहीं की। कोविड और लॉकडाउन ने सबको अकुला दिया था। मिलने का बहाना भी जन्मदिन का था तो कुछ घंटे की नोटिस पर दिल्ली, बंबई, राँची और कलकत्ता में बसी स्कूल की सहेलियाँ जुट गयीं। बाकू (अज़रबैजान), पटना और बंबई की एक एक दोस्त नहीं जुड़ पाईं तो उनका उलाहना हमने हँसते हँसते सुन लिया। सोचा कि जल्दी ही फिर अड्डेबाज़ी होगी।

क्या पता था कि अब अल्पना नहीं मिलेगी! कोविड ने उसे दबोचा और उसको मथ डाला। आठ दिन से अपोलो में भर्ती थी। वेंटिलेटर और ICU का नाम हमें डरा रहा था। उसका होश में न होना हमारे होश छीन रहा था। रात को खबर आ गई कि अल्पना चली गई।

हमारे रसचक्र की कई प्रस्तुतियों में अल्पना चाव से आई थी। हर बार हमने फ़ोटो खिंचवाई थी। उसको मुझे कहना है कि मेरे साथ अड्डेबाज़ी छूटेगी नहीं। ग़ाज़ियाबाद के गोभी के खेत में जाकर हम जब मस्ती कर सकते हैं तो इस दुनिया के पार भी मिलकर मस्ती करेंगे।

स्कूल में हमने अपने समूह का नाम रखा था - PAVAS - P पूर्वा A अल्पना V वर्षा A अंजु S सिंधु। आज वह टूट गया।

हमारा कॉलेज अलग हो गया था, मगर हमारा संपर्क बना रहा। हम सबकी शादियों ने भी दोस्ती और दोस्त को भुलाने का काम नहीं किया। हाँ, घरेलू और वयस्क जीवन की नाना प्रकार की भूमिकाओं ने हमें व्यस्त अवश्य कर दिया था। तब भी कभी बंबई से अंजु आई तो हम होटल की लॉबी में मिल लिए, सिंधु बंबई से आई तो अंसल प्लाज़ा के गेस्ट हाउस में बैठकी ज़माने के बाद हम दिल्ली हाट में विचरने चले गए। अमेरिका से रेनी आई तो हम सब रेस्टोरेंट में मिल लिए. कविता के घर जमावड़ा हुआ तो शामिल होनेवालियों में थी पूर्णिया से नीना, बंबई से सीमा और दिल्ली से राहत दी’, अल्पना और मैं. राँची से वर्षा आई तो कनाट प्लेस में अल्पना, अंजना, राहत दी की चौकड़ी जमा ली। स्वरूपा बंबई से आई तो हम अल्पना के घर धमक गए। मॉल का चक्कर भी हम कुछ दोस्त हाथ में हाथ डालकर लगा आते थे. नुज़हत के घर ईद में समय तय करके अल्पना और मैं हमदोनों एक साथ पहुँचे थे। 

दोस्तों से मिलने का अल्पना ने कोई मौका गँवाया नहीं. खुद गाड़ी चलाती थी या ड्राइवर रहता था या कोई व्यवस्था हो वह कभी चूकी नहीं. उसके साथ coordination आसान था. कार्यक्रम बनाने में कभी लफड़ा नहीं हुआ. भले उसकी तबीयत खराब हो, मुँह पर मास्क हो, पैर में सूजन हो, खाने-पीने पर पाबंदी हो. जब उसने ठान लिया तो ठान लिया, कह दिया तो कह दिया. एक फार्म हाउस में अल्पना ने घर के पकवान का स्टॉल लगाया था तो याद से चलते समय उसने भरवाँ लाल मिर्च का अचार पकड़ा दिया था। यानी हम बहानेबाज़ अड्डेबाज़ ठहरे!

स्कूल में हमारी बस के दो ट्रिप होते थे दो रूट पर। मेरा और अंजु का एक रूट था और वर्षा-अल्पना का दूसरा रूट। छठे छमासे यदि दोनों ट्रिप को मिला दिया जाता था तो हम लड़कियों की बाँछें खिल जाती थीं। अंत्याक्षरी, धौल-धप्पा, खुसुर-फुसुर और ठहाका! उन दिनों को याद कर रही हूँ और सोच रही हूँ कि अल्पना किस रूट पर चली गई? यह कौन सी ट्रिप है?