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शनिवार, 20 अगस्त 2022
जो बचा रह गया (The Survivor by Tadeusz Różewicz In Hindi)
मैं चौबीस का हूँ
क़त्ल को ले जाया गया
मैं बच गया।
जो आगे दिए जा रहे हैं वे खाली (अर्थहीन) पर्यायवाची हैं:
मनुष्य और पशु
प्रेम और घृणा
मित्र और शत्रु
अंधकार और प्रकाश।
मनुष्यों और पशुओं को मारने का तरीक़ा एक ही है
मैंने यह देखा है:
ट्रक काट डाले गए आदमियों से ठुँसे हुए
जो बचाए नहीं जाएँगे।
विचार मात्र शब्द हैं:
भलाई और अपराध
सच और झूठ
सुंदरता और कुरूपता
साहस और कायरता।
भलाई और अपराध एक ही बराबर हैं
मैंने यह देखा है:
उस आदमी में जो दोनों ही था
अपराधी और भला।
मैं खोज रहा हूँ एक अध्यापक और गुरु
काश वह मेरी दृष्टि सुनने की ताक़त और वाणी बहाल कर दे वापस
काश वह फिर से नाम दे वस्तुओं और विचारों को
काश वह अलग करे अंधकार को प्रकाश से।
मैं चौबीस का हूँ
क़त्ल को ले जाया गया
मैं बच गया।
पोलिश कवि - तादयूश रुज़ेविच
संग्रह - 'होलोकास्ट पोएट्री'
संकलन और प्रस्तावना - हिल्डा शिफ़
पोलिश से अंग्रेज़ी अनुवाद - ऐडम ज़ेर्निआव्स्की
प्रकाशक - सेंट मार्टिन्स ग्रिफिन, 1995
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद
शुक्रवार, 19 अगस्त 2022
तिरहुति लोकगीत में कृष्ण और राधा (Krishna and Radha in Tirhuti folksong)
साजि चललि सब सुन्दरि रे
मटुकी शिर भारी
धय मटुकी हरि रोकल रे
जनि करिय वटमारी
अलप वयस तन कोमल रे
रीति करय न जानै
धाए पड़लि हरि चरणहि रे
हठ तेजह मुरारी
निति दिन एहि विधि खेपह हे
तोहे बड़ बुधिआरी
आज अधर रस दय लेह हे
पथ चलह झटकारी
झाँखिय खुंखिय राधा वैसलि रे
वैसलि हिय हारी
नंदलाल निर्दय भेल रे
हिरदय भेल भारी
भनहिं 'कृष्ण' कवि गोचर करु रे
सुनु गुनमंति नारी
आज दिवस हरि संग रहु रे
अवसर जनु छाँड़ी
व्रजांगनाएँ शिर पर भारी गागर लिए सज-धज कर निकलीं। श्रीकृष्ण ने गागर पकड़ कर रास्ता रोक लिया।
हे कृष्ण, राहजनी मत करो। मेरी उम्र थोड़ी है, और शरीर कोमल। मैं रीति का मर्म नहीं जानती। इस प्रकार वे सुन्दरियाँ श्रीकृष्ण के चरण पकड़ कर तरह-तरह से अनुनय-विनय करने लगीं। हे कृष्ण, तुम अपना यह हठ छोड़ दो।
श्रीकृष्ण ने कहा - हे व्रजांगने, तुम नित्य इसी तरह टालमटोल करती हो। सचमुच तुम बड़ी चतुर हो। आज अपने अधर-रस का दान दो, और तब प्रसन्न होकर अपना रास्ता लो।
राधा इस आकस्मिक विपत्ति से मुक्त होने के लिए इधर-उधर झाँक कर और खाँस कर अन्त में नाउम्मीद हो कर बैठ गई।
हे सखी, श्रीकृष्ण कितने कठोर हैं। उनकी इस नाजायज़ हरकत से दुख होता है।
कवि 'कृष्ण' कहते हैं - हे गुणवन्ती, सुनो। तुम आज श्रीकृष्ण के साथ प्रेमपूर्वक दिन बिताओ, और इस अवसर पर लाभ उठाने से मत चूको।
यह तिरहुति लोकगीत है। राम इकबाल सिंह 'राकेश' के शब्दों में, "'झूमर' और 'सोहर' को यदि हम ग्राम-साहित्य-निर्झरिणी का मधुर कलकल नाद कहें, तो मिथिला के 'तिरहुति' नामक गीत को फागुन का अभिसार कहना पड़ेगा। स्वाभाविकता, सरलता, प्रेमपरता का सामंजस्य और उच्च भावों का स्पष्टीकरण - ये 'तिरहुति' की विशेषताएँ हैं। इसकी रचना पद्धति मुक्तक काव्य की तरह भावों की उन्मुक्त पृष्ठभूमि पर मर्यादित है।"
संग्रहकर्ता और संपादक - राम इकबाल सिंह 'राकेश'
प्रकाशक - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
गुरुवार, 28 जुलाई 2022
दोस्ती (Dosti by Sudhanshu Firdaus)
औंधे पड़े आकाश ने
सीधे मुँह लेटे आदमी से कहा :
'कितने अकेले हो तुम'
एक फुसफुसाहट हुई
तुम भी तो !
फिर दोनों हँसने लगे
कवि - सुधांशु फ़िरदौस
संग्रह - अधूरे स्वाँगों के दरमियान
प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2020
सोमवार, 18 जुलाई 2022
मेरी नानी सीता सुंदर (My maternal grandmother Seeta Sundar by Purwa Bharadwaj)
आज 18 जुलाई है। नानी के जाने का दिन। 45 साल हो गए। यह तारीख टँगी रहती है किसी कोने में। मुझे बुद्ध कॉलोनी वाले घर के आँगन में उनकी अंतिम छवि का ध्यान है। लेकिन उससे ज़्यादा याद आती है आँगन की बगल में जो रसोई थी, छप्पर वाली लंबोतरी रसोई, उसमें काम करती नानी। मुझे नानी के हाथ के खाने का स्वाद याद है। मेरे पापा भी उनके खाने की बड़ी तारीफ करते थे। नानी से फ़रमाइश करके कई बार मैं माँड़-भात खाती थी। उसना चावल का। उसमें घी और निमकी, नमक में लिपटे सूखे नींबू वाली जो काली सी पड़ गई हो।
नानी का नाम था सीता सुंदर - सीता सुंदरी। सचमुच सुंदर और सौम्य। उनकी युवावस्था का अंदाजा तो नहीं मुझे, मगर एक 'स्टाइलिश' फ़ोटो याद है जिसमें नानी ने बिना बाजू के (स्लीवलेस) ब्लाउज़ के साथ सीधे पल्ले की साड़ी पहन रखी थी और गॉगल्स लगा रखा था। संभवतः अपनी सबसे छोटी बेटी का जो उन दिनों कॉलेज में थी। बाल खुले थे, सद्यःस्नाता नानी के। कभी कभी नानाजी (कविवर रामगोपाल शर्मा 'रुद्र') की कविताओं में उनको तलाशती हूँ। और कभी कभी यह भी सोचती हूँ कि हमलोग अपने घरों की औरतों को ही कितना कम जानते हैं। माँ के चेहरे में नानी दिखती है और मुझमें माँ की काफी झलक है। तो संतोष कर सकती हूँ कि नानी का कुछ तो लिया होगा मैंने।
नानी का घर था छपरा में इटवा महेशिया। माँ बताती है कि इटवा नदी थी जिसकी एक तरफ था महेशिया। बाबू हरिशंकर सिंह और शहदुल्लापुर गाँव की रूप कांता कुँवर की इकलौती संतान थी सीता सुंदर। 1912 का जन्म। जमींदार की बेटी। माँ जब सुनाती है कि उसके नाना की 42 गाँव की जमींदारी थी (जो तीन भाइयों में बँटी थी और 14 गाँव उसके नाना के हिस्से में थे) तो उसके स्वर में क्षण भर को ही सही रुआब आ जाता है।
सोमवार, 11 जुलाई 2022
यह क़ब्रिस्तान है (THIS IS A CEMETERY BY OLAF D. EYBE)
वह नन्हीं स्वीडिश लड़की
फूल चुन रही है
ऊँची घास में
बिरकेनाऊ कैम्प की
में उसे ऐसा करने से रोकना
चाहता हूँ
यह क़ब्रिस्तान है
लेकिन मैं ख़ामोश रह जाता
हूँ
यह क़ब्रिस्तान है
मैं क्या कहूँ उस अमरीकी से
जो अभी अभी पहुँचा है ऑश्वित्ज़
से
बिरकेनाऊ में और पूछ रहा है
क्या यह ऑश्वित्ज़ है?
मैं सोचता हूँ कि क्या उसे
मालूम है
मित्र देशों को मालूम था एकदम
शुरू में ही
लेकिन उन्होंने इसके बारे
में कुछ नहीं किया
यह क़ब्रिस्तान है
जर्मन कवि - OLAF D. EYBE (1963-2021)
जर्मन भाषा से अंग्रेज़ी अनुवाद - क्रिस्टोफ़र मुलर
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद
संग्रह - The Auschwitz Poems
संकलन और संपादन - Adam A. Zych
प्रकाशन - THE AUSCHWITZ-BIRKENAU STATE MUSEUM, 1999
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी के नियंत्रण वाले पोलैंड में ऑश्वित्ज़ नाज़ियों का बनाया यातना शिविर और क़त्लगाह था। उसके अनेकानेक यातना शिविरों में से बिरकेनाऊ सबसे अधिक बड़ा और कुख्यात था।
शनिवार, 2 जुलाई 2022
राजनीतिक करवटें, 1948 (Rajneetik karvatein, 1948 by Shamsherbahadur Singh)
(बतर्ज़ कव्वाली)
हाय लीडर दुरंगी न कम गुम हुए !!
बीच धारा अगम थी - गुड़म् गुम हुए !!
'इन्क़लाबी' हमारे न कम गुम हुए :
लेके साइकिल हमारी निगम गुम हुए !!
हमने देखा था उनको इसी मोड़ पर !
एकदम आए वो ! एकदम गुम हुए !!
ऐसे खो गए जाके आफ़िस में हम :
अपने कानों पर रक्खे क़लम गुम हुए !!
बोली बरसात में इन्क़लाबी दुल्हन :
'ले के छाता हमारा बलम गुम हुए !'
रक्खो एक् सौ चवालिस दफ़ा फूँक फूँक !
वर्ना रक्खा जो अगला कदम, गुम हुए !!
जैसे होश आज बंगाल सरकार के :
हम तो ऐसे, तुम्हारी क़सम, गुम हुए !!
ऐसी आँधी चले ... हम भी पूछें - कहाँ,
वो जो ढाते थे जुल्मों-सितम, गुम हुए ??
आ रहे हैं मसीह्-ओ-खिज़र झींकते :
हे ! अब इन्क़लाबों में हम गुम हुए !!
क्या गुरुजी मनुSजी को ले आयेंगे ?
हो गए, जिनको लाखों जनम गुम हुए !!
अपनी किस्मत को यों रो रहे हैं चियांग -
रह गए हम लँडूरे, सनम गुम हुए !!
किस एटम् गर से पूछे कि - इन्सान के
हीरोशिमा में कितने अदम गुम हुए !?
हमने ज़ेरे-ज़मीं, की तरक़्क़ी पसन्द :
ले के शमशेर अपनी क़लम गुम हुए !!
आज - सन् 1948-49 के ज़माने में
चियांग - चियांग-काई-शेक, जिन्हें फ़ारमूसा (ताइवान) में शरण लेनी पड़ी
ज़ेरे-ज़मीं - 'अंडर ग्राउंड'
शायर - शमशेरबहादुर सिंह
संकलन - सुकून की तलाश
संपादन - रंजना अरगड़े
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1998
शुक्रवार, 1 जुलाई 2022
उक्ति (Ukti by Siddhinath Mishra)
छक-छककर पी
फिर भी,
भरा न जी;
वह तृषा -
वही तो तृषा।
रंग, तान, रस, गंध, स्पर्श से
जुड़ा गए मन-प्राण;
वह तृप्ति -
वही तो तृप्ति।
हटें न आँखें,
जनम-अवधि-भर
चाहे जितनी बार निहारूँ;
वह रूप -
वही तो रूप।
सुख-दुख में
समरूप भाव-
मृत्यु-भय से ं डरे;
वह जीवन -
वही तो जीवन।
बार-बार की पढ़ी हुई
तो भी
फिर-फिर पढ़ने को मन खींचे;
वह कविता -
वही तो कविता।
कवि - सिद्धिनाथ मिश्र
संग्रह - द्वाभा
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2010