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सोमवार, 11 नवंबर 2013

इस एक बूँद आँसू में (Is ek boond aansoo mein by Mahadevi Verma)


इस एक बूँद आँसू में 
         चाहे साम्राज्य बहा दो,
वरदानों की वर्षा से 
         यह सूनापन बिखरा दो ;

         इच्छाओं के कम्पन से 
                     सोता एकान्त जगा दो,
         आशा की मुस्काहट पर 
                     मेरा नैराश्य लुटा दो l 

चाहे जर्जर तारों में 
          अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालों में 
          सुख का आसव छलका दो ;

           मेरे बिखरे प्राणों में    
                      सारी करुणा ढुलका दो,
           मेरी छोटी सीमा में 
                      अपना अस्तित्व मिटा दो !

पर शेष नहीं होगी यह 
           मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढ़ा ,
           तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !



कवयित्री - महादेवी 
संकलन - सन्धिनी
प्रकाशक - लोकभारती, इलाहाबाद, 2005

रविवार, 10 नवंबर 2013

घुमन्तू टेलीफोन (Ghumantu telephone by Anamika)


हद्द चलै सो मानवा, बेहद चलै सो साध,
लेकिन न हद, न ही बेहद -
एक बन्द मुट्ठी मेरी सरहद !

जा तो कहीं भी सकती हूँ -
लेकिन इस आदमी की जेब में l 

तार जोड़ सकती हूँ 
अपने दिमाग का कहीं से -
लेकिन इसके अँगूठे के नीचे l 

जब यह सो भी जाएगा
तकिए के नीचे दबाएगा मुझको !
टिक्-टिक्-टिक् सुनती हुई 
इसकी कलाई-घड़ी की -
चुपचाप मैं दर्ज करती रहूँगी 
अपने सीने में इसकी खातिर 
एस.एम.एस. l 
जगह-जगह से आएँगे ये सारी रात,
दहकेंगे ये गुपचुप सन्देश 
भर-रात मेरे अँधेरों में 
सपनों-स्मृतियों की बिल्ली-आँखें बनकर :
अम्मा की हारी-बीमारी,
मौला की कोर्ट-कचहरी,
ऑफिस के सब रगड़े-झगड़े !
अफरा-तफरी के वे 
कितने अधूरे-से उत्तप्त चुम्बन !
कितनी घुटी-सी पुकारें !
हल्की रुलाई की 
अवरुद्ध, बेचैन कई सिहरनें 
करती रहेंगी मुझमें छटपट भर-रात l 
घायल कबूतर के पंख भरे हैं मुझमें 
जो बेखयाली में 
एक-एक कर नोंच फेंकेगा 
यह कल तक :
कहीं-कहीं कुछ रोएँ सहलाता 
कभी बीच में रुक भी जाएगा !

कितनी भी आधुनिक हो दुनिया -
प्राचीन रहती हैं अभिव्यक्तियाँ
प्यार की, नफरत की !
अमरीकी महाध्वंस के पहले 
होती थीं जैसी बगदाद की सड़कें :
हूँ मैं कुछ-कुछ वैसी
अधुनातन बाजारों के ही समानान्तर 
सजे हुए हैं मुझमें 
हाट पुराने - मीना बाजार,
जैसे कि भग्नावशेष पुरातात्त्विक 
महानगर की छाती पर l





कवयित्री - अनामिका 
किताब - अनामिका : पचास कविताएँ, नयी सदी के लिए चयन  
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 2012

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

छठ का गीत (Chhath song)


केरवा फरए घौंदसए ऊपर सुग्गा मंड़राय 
मारवउ रे सुगवा धनुख सए सुगा खँसु मुरछाय
उजे केरवा जनु कोइ छुवय छठी माता ला 
छठी माइ के जएतइन सनेस अरग देवय ला 
उजे काँचए बाँस केर बंहिया रेशमक लागल डोर 
भरिया होयतन कओन भइया भर लय पहुँचाय
बाटहिं पुछथिन बटोहिया भइया ई भार केकर जाय  
आहे छठि अइसन ठकुराइन ई भार हुनकर जाय
नेमुआ फरए घौंदसए ऊपर सुग्गा मंड़राय 
मारवउ रे सुगवा धनुख सए सुगा खँसु मुरछाय
उजे नेमुआ जनु कोइ छुवय छठी माता ला 
छठी माइ के जएतइन सनेस अरग देवय ला 
उजे काँचए बाँस केर बंहिया रेशमक लागल डोर 
भरिया होयतन कओन भइया भर लय पहुँचाय
बाटहिं पुछथिन बटोहिया भइया ई भार केकर जाय 
आहे छठि अइसन ठकुराइन ई भार हुनकर जाय


घौंद के घौंद केला फला है. उसे चखने के लिए सुग्गा मंडरा रहा है. रे सुग्गे, मैं तुम्हें तीर से मारूँगी और तुम्हें मूर्च्छा आ जाएगी. केले के घौंद को कोई नहीं छूये. वह छठी माँ के लिए सुरक्षित है. अर्घ्य देने के लिए वह छठी माँ को सौगात जायगा. काँच बाँस की बहँगी है और उसमें रेशम की डोर लगी है. मेरे अमुक भाई भरिया होंगे और छठी माँ को सौगात पहुँचायेंगे. रास्ते में पथिक पूछेंगे कि यह भार किसका है. तब मेरे अमुक भाई कहेंगे - "छठी-सी यशस्विनी हैं. उन्हीं का यह भार है." ...इसी तरह केला, नींबू आदि फलों का नाम लेकर गीत आगे बढ़ता है. गीत में बारी-बारी से भाइयों और बहनों का नाम लेते जाते हैं.

यह गीत तो मैथिली का है. इसको और इसके जैसे बीसियों गीत माँ बज्जिका में गाती थी. आज मेरा मन कर रहा था कि माँ से कहूँ कि फोन पर ही छठ का गीत सुना दो, लेकिन उसकी खाँसी सुनकर मैंने कहा नहीं.

संग्रह - मैथिली लोकगीत

संग्रहकर्ता और संपादक - राम इकबाल सिंह 'राकेश'

प्रकाशक - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग


मंगलवार, 5 नवंबर 2013

दर्द काँटा है (Dard kanta hai by Nasir Kazmi)


                      
दर्द काँटा है उसकी चुभन फूल है 
दर्द की ख़ामुशी का सुख़न फूल है 
 
उड़ता फिरता है फुलवारियों से जुदा 
बर्गे-आवारा जैसे पवन धूल  है 
 
उसकी ख़ुशबू दिखाती है क्या-क्या समै 
दश्ते-ग़ुरबत में यादे-वतन फूल है 
 
तख़्त-ए-रेग पर कोई देखे उसे 
साँप के ज़हर में रस है, फन फूल  है 
 
मेरी लै से महकते हैं कोहो-दमन 
मेरे गीतों का दीवानापन फूल है 
 
 
दश्ते-ग़ुरबत = परदेस-रूपी जंगल 
तख़्त-ए-रेग = रेत का तख़्ता 
कोहो-दामन = पहाड़ और वादी  
शायर - नासिर काज़मी
संग्रह - ध्यान यात्रा 
संपादक - शरद दत्त, बलराज मेनरा 
प्रकाशक - सारांश प्रकाशन, दिल्ली, 1994

सोमवार, 4 नवंबर 2013

हम उजाला जगमगाना चाहते हैं(Hum ujala jagmagana chahte hain by Kedarnath Agrawal)



हम उजाला जगमगाना चाहते हैं 
अब अँधेरे को हटाना चाहते हैं 

हम मरे दिल को जिलाना चाहते हैं 
हम गिरे सिर को उठाना चाहते हैं 

बेसुरा स्वर हम मिलाना चाहते हैं 
ताल-तुक पर गान गाना चाहते हैं 

हम सबों को सम बनाना चाहते हैं 
अब बराबर पर बिठाना चाहते हैं 

हम उन्हें धरती दिलाना चाहते हैं 
जो वहाँ सोना उगाना चाहते हैं 
                          -   28.9.46 

कवि - केदारनाथ अग्रवाल 
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ 
संपादक - अशोक त्रिपाठी 
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 2012

शनिवार, 2 नवंबर 2013

बिटिया के जन्म पर (Bitiya ke janm par by Nandkishore Nawal)



नदी के जल की 
पहली किलकारी,
भोर की किरण का 
पहला स्पर्श 
और वृक्ष की शाखा पर फूटा 
पहला किसलय … 

कैसा लगा होगा यह सब 
सृष्टि की पहली सुबह को ?

मुझे पता चला इसका,
जब अस्पताल के बेड पर 
मैंने अपनी बिटिया की 
पहली कंठ-गूंज सुनी,
उसके पतले नन्हें होंठ छुए 
और उसे माँ की गोद में लिपटा हुआ 
पद्मकोश-सा देखा … 


कवि - नंदकिशोर नवल
संकलन - नील जल कुछ और भी धुल गया
संपादक - श्याम कश्यप
प्रकाशक - शिल्पायन, दिल्ली, 2012

पापा ने यह कविता मेरे जन्म के दो दिन बाद लिखी थी। 

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

अलग भी हैं, लगे भी हैं ! (Alag bhi hain, lage bhi hain by Ramgopal Sharma 'Rudra')


अलग भी हैं, लगे भी हैं !

       उगा जो चाँद पूनम का,
       समुन्दर का चलन चमका ;
       चकोरों की न कुछ पूछो !
                 सजग भी हैं, ठगे भी हैं !

       खुली पाँखें, लगी आँखें ;
       बँधें, पर किसलिए माँखें ?
       कमल के कोष में भौंरे 
                बिसुध भी हैं, जगे भी हैं !

       कहें क्या, कौन होते हैं -
       कि जिन बिन प्राण रोते हैं !
       रुलाते हैं, हँसाते हैं !
                पराये भी हैं, सगे भी हैं !
                                          - 1974 


कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र 
संपादक - नंदकिशोर नवल 
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991