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गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

पहाड़ी ढलान (By Nina Cassian)



कितने तुच्छ हैं हम
और कितने उतावले
और कितना कड़वा बोलते हैं हम

जबकि सिर्फ़ एक मकड़ा
पूरी रात टंगा रहा उसी एक जगह,
गुसलखाने के एक कोने में

हे आठ टांगों वाले धैर्यवान !
ख़ामोश गवाह
‘गुड मोर्निंग’

हम गिरते हैं
और खिरते हैं,
जब भी कोई शिखर प्रतिमान होता है भ्रष्ट I


कवि – निना कास्सिआन
संकलन- सच लेता है आकार, समकालीन रोमानियाई कविता
संपादन – आन्दीआ देलेतान्त, ब्रेंडा वाकर
हिंदी अनुवाद – रणजीत साहा
प्रकाशन – साहित्य आकादमी, 2002

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

जब मौत आए (When death comes by Mary Oliver)

जब मौत आए
पतझड़ के भूखे भालू की तरह;

जब मौत आए
और अपने बटुए से
सारे चमकीले सिक्के निकाल ले
मुझे खरीदने के लिए, और चट
अपना बटुआ बंद कर दे;

जब मौत आए
चेचक की तरह

जब मौत आए
हिमखंड की तरह
कंधे की हड्डियों (पंखुड़ों) के बीच,

मैं उस दरवाज़े से गुजरना चाहती हूँ भरी हुई
कौतूहल से, सोचती हुई
आखिर कैसी होगी वह कुटिया
अँधेरे की?

और इसीलिए मैं हर चीज़ को देखती हूँ
भाईचारे और बहनापे की तरह,

और मेरे लिए वक्त
एक ख्याल से अधिक कुछ नहीं,

और मैं अनंत को
एक और संभावना मानती हूँ,

और मैं हर ज़िंदगी को
एक फूल की देखती हूँ, उतनी ही आम
जितनी मैदान की वह डेज़ी, और उतनी ही
एकल

और हर नाम
होठों पर एक आरामदेह गीत
सहलाता हुआ, जैसा हर संगीत करता है, खामोशी की तरफ,

और हर शरीर
बहादुर शेर, और
इस ज़मीन के लिए कीमती.

जब यह खत्म हो जाएगा, मैं चाहती हूँ
कहना कि तमाम ज़िंदगी
मैं दुल्हन रही अचरज की.
मैं दूल्हा थी
दुनिया को अपनी बाँहों में लेती हुई.

जब यह खत्म हो जाएगा, मैं नहीं चाहती सोचना
कि क्या मैंने अपनी ज़िंदगी को कुछ ख़ास बनाया, और हक़ीक़ी।
मैं नहीं चाहती खुद को देखना आहें भरते
और भयभीत।

मैं नहीं चाहती
खत्म होना ऐसे शख्स की तरह जो
इस दुनिया में सिर्फ आया.



निधीश त्यागी के सौजन्य से
18 जनवरी, 2019
अनुवाद - अपूर्वानंद

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

पानी की आवाज़ का सौहार्द ( गौरांग मोहन्ता Gauranga Mohanta)


अँधेरे के शून्य वातावरण में गति का संयमित कंपन मौजूद 
है। चिंताशील पहाड़ियों की कोमलता से मूक चेतना विस्तृत 
हो जाती है। आकाश अनंत ध्वनियो की अदृश्य बाढ़ में डूब 
जाता है। पानी की बेमिसाल आवाज़ का सौहार्द निर्जन घर का 
संकेत देता है। अँधेरे में मैं सुनहरे-कमल को खिलते देखता हूँ;
सबसे लंबा जामदानी अलग-अलग धागों से बुना जाता है। 
आंतरिक दृष्टि का परिवर्तन फिर से उथले पानी को बचाता 
है। रहस्यमय भूमि पर खड़े होने पर मुझे जीवन की अविरत 
उड़ान का अनुभव प्राप्त होता है और रडार के अथक घूर्णन का 
अनुभव होता है। 


बांग्लादेशी कवि - गौरांग मोहन्ता
अनुवाद - उषा बंदे 
प्रकाशन - रुब्रिक प्रकाशन, द्वारका, दिल्ली, 2018 


गौरांग मोहन्ता की किताब आज शाम ही मिली और मैं उस पतली सी किताब को पढ़ गई। उनकी गद्य कविता का स्वाद मुझे थोड़ा त्रिलोचन और शमशेर की याद दिलाता रहा। बांग्लादेश के कवि गौरांग अपनी काया के अनुरूप लिखते भी हैं - नज़ाकत से, सौम्य और संवेदनशील। यों बहुत मुखर नहीं हैं, मगर कविता उनकी भरपूर बोलती है। 

सोमवार, 17 सितंबर 2018

खेल (Khel by Maithilisharan Gupt)

ध्यान न था कि राह में क्या है,
काँटा कंकर ढोंका ढेला,
                     तू भागा मैं चला पकड़ने
                     तू मुझसे मैं तुझसे खेला I

सुरभित शीतल ब्यार बही थी,
चारु चन्द्रिका छिटक रही थी,
रजतमयी-सी मुदित मही थी,
                     रत्नाकर लेता था हेला,
                     तू मुझसे मैं तुझसे खेला I

अब पकड़ा, अब पकड़ा पल में,
मैं पीछे-पीछे दौड़ा जल-थल में,
आ आकर के भी कौशल में,
                      हाथ न आया तू अलबेला,
                      तू मुझसे मैं तुझसे खेला I

यदि तू कभी हाथ भी आया,
तो छूने पर निकली छाया,
हे भगवन् ! यह कैसी माया,
                       इतना कष्ट व्यर्थ ही झेला,
                       तू मुझसे मैं तुझसे खेला I


कवि - मैथिलीशरण गुप्त
संकलन - मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली, खंड 4
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, 2008

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

उदासीन बंदा (The Indifferent One by Mahmoud Darwish)



उसे किसी चीज़ से फ़र्क़ नहीं पड़ता। अगर वे उसके घर का पानी काट दें,

वह कहेगा, “ कोई बात नहीं, जाड़ा क़रीब है।”

और अगर वे घंटे भर के लिए बिजली रोक दें वह उबासी लेगा:

“कोई बात नहीं, धूप काफ़ी है”

अगर वे उसकी तनख़्वाह में कटौती की धमकी दें, वह कहेगा,

“कोई बात नहीं! मैं महीने भर के लिए शराब और तमाखू छोड़ दूँगा।”

और अगर वे उसे जेल ले जाएँ,

वह कहेगा, “कोई बात नहीं, मैं कुछ देर अपने साथअकेले रह पाऊँगा, अपनी यादों के साथ।”

और अगर उसे वे वापस घर छोड़ दें, वह कहेगा,

“कोई बात नहीं, यही मेरा घर है।”

मैंने एक बार ग़ुस्से में कहा उससे, कल कैसे रहोगे तुम?”

उसने कहा, “कल की मुझे चिंता नहीं। यह एक ख़याल भर है

जो मुझे लुभाता नहीं। मैं हूँ जो मैं हूँ: कुछ भी बदल नहीं सकता मुझे, जैसे कि मैं कुछ नहीं बदल सकता,

इसलिए मेरी धूप न छेंको।”

मैंने उससे कहा, “न तो मैं महान सिकंदर हूँ

और न मैं (तुम?) डायोजिनिस”

और उसने कहा, “लेकिन उदासीनता एक फ़लसफ़ा है

यह उम्मीद का एक पहलू है।”



फ़िलीस्तीनी कवि - महमूद दरवेश

संकलन - Unfortunately, It was Paradise

प्रकाशन- यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निआ प्रेस, 2003

अनुवाद एवं संपादन - Munur Akash and Carolyn Forche

with Simon Antoon and Amira El-Zein

अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद - अपूर्वानंद

बुधवार, 15 अगस्त 2018

हम एक जन बन सकेंगे (By Mahmoud Darwish)



हम एक जन हो सकेंगे, अगर हम चाहें, जब हम सीख लेंगे कि 
हम फ़रिश्ते नहीं, और शैतानियत सिर्फ़ दूसरों का विशेषाधिकार नहीं

हम एक जन हो सकेंगे, जब हम हर उस वक़्त पवित्र राष्ट्र को शुक्राना देना बंद करेंगे जब भी एक ग़रीब शख़्स को रात की एक रोटी मिल जाए

हम एक जन बन सकेंगे जब जब हम सुल्तान के चौकीदार और सुल्तान को बिना मुक़दमे के ही पहचान लेंगे

हम एक जन बन सकेंगे जब एक शायर एक रक्कासा की नाभि का वर्णन कर सकेगा,

हम एक जन बन सकेंगे जब हम भूल जाएँगे कि हमारे क़बीले ने क्या कहा है हमें, और जब वाहिद शख़्स छोटे ब्योरे की अहमियत भी पहचान सकेगा

हम एक जन बन सकेंगे जब एक लेखक सितारों की ओर सर उठा कर देख सकेगा, बिना यह कहे कि हमारा देश अधिक महान है और अधिक सुंदर

हम एक जन बन सकेंगे जब नैतिकता के पहरेदार सड़क पर एक तवायफ़ को हिफ़ाज़त दे पाएँगे पीटने वालों से

हम एक जन बन पाएँगे जब फ़िलीस्तीनी अपने झंडे को सिर्फ़ फ़ुटबाल के मैदान में, ऊँट दौड़ में और नकबा के रोज़ याद करे

हम एक जन बन सकेंगे अगर हम चाहें, जब गायक को एक दो माखन के लोगों की शादी के वलीमा पर सूरत अल रहमान पढ़ने की इजाज़त हो

हम एक जन बन सकेंगे जब हमें तमीज हो सही और ग़लत की


फ़िलीस्तीनी कवि - महमूद दरवेश
संकलन - A River Dies Of Thirst

अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद - अपूर्वानंद

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

मैं कुछ अधिक बात करता हूँ (I Talk Too Much by Mahmoud Darwish)



मैं कुछ अधिक बात करता हूँ औरतों और वृक्षों के बीच की बारीकी के बारे में,

पृथ्वी के जादू के बारे में, 

ऐसे एक मुल्क के बारे में जिसके कोई पासपोर्ट की मुहर नहीं,

मैं पूछता हूँ: क्या यह सच है भली देवियो और सज्जनो, 

कि यह जो इंसान की धरती है वह सारे मनुष्यों के लिए है

जैसा आप कहते हैं? वैसी हालत में कहाँ है मेरी नन्हीं कुटिया और कहाँ हूँ मैं?

कॉन्फ़रेंस के प्रतिभागी और तीन मिनट तालियाँ बजाते हैं मेरे लिए,

तीन मिनट आज़ादी के और मान्यता के,

कॉन्फ़रेंस हमारे लौटने के अधिकार को स्वीकार करती है ,

सारी मुर्ग़ियों और घोड़ों की तरह, पत्थर से बने सपने में।

मैं उनसे हाथ मिलाता हूँ, एक एक करके। मैं सलाम करता हूँ उन्हें।


और फिर मैं दूसरे मुल्क को अपना सफ़र जारी रखता हूँ

और बात करता रहता हूँ मृगमरीचिका और बरसात के बीच के अंतर के बारे में।

मैं पूछता हूँ: क्या यह सच है भली देवियो और सज्जनो,

कि यह इंसान की धरती सभी मनुष्यों के लिए है?



फ़िलीस्तीनी कवि - महमूद दरवेश

संकलन - Unfortunately, It was Paradise

प्रकाशन- यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निआ प्रेस, 2003

अनुवाद एवं संपादन - Munur Akash and Carolyn Forche

                                 with Simon Antoon and Amira El-Zein

अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद - अपूर्वानंद