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रविवार, 5 जुलाई 2026

कर्णाभूषण (Earrings by Purwa Bharadwaj)

मुझे कर्णाभूषण पसंद हैं। शब्द सुनते ही लगता है कान में पहननेवाले स्वर्णाभूषण - सोने के आभूषण। लेकिन मेरे पास दो-चार छोड़कर ज़्यादातर मिट्टी, लकड़ी, ताँबे, पीतल, धागे, मोती आदि के कर्णाभूषण हैं। लोग कहते हैं कि सोना पहनो तो कान पकता नहीं है, मगर मेरा हमेशा पक जाता रहा है। खासकर tops पहनो तो। उसकी तल्ली चाहे सोने की हो या चाँदी की, चाहे चूड़ी वाला पेंच हो या सीधे दबानेवाली तल्ली हो, पक्का है कि मेरा कान पक जाएगा। आलस में या बनने-ठनने के चक्कर में यदि मैंने उसे चार-पाँच दिन पहने रखा तो शर्तिया कान की लौ सूज जाएगी और मवाद आने लगेगा। इसका तोड़ है हुक वाला कर्णाभूषण जो दबाता नहीं है। इसने कान पकने की आफ़त से मुझे छुटकारा दिला दिया है।

अब दूसरी परेशानी खड़ी हो गई है। मेरे हुक वाले कर्णाभूषण अक्सर गुम हो जाते हैं, वो भी एक। वजह है कि शौक के मारे भारी-भरकम हुक वाले कर्णाभूषण पहनती रही और धीरे-धीरे कान का छेद काफ़ी बड़ा हो गया जिससे एक न एक कान से कर्णाभूषण फिसल जाता है। उनको लेकर सावधान रहने लगी हूँ, फिर भी यह दुर्घटना घट ही जाती है। कर्णाभूषण के वज़नदार होने का बोझ आखिर कान बेचारा कितना सहे! कइयों ने कहा कि कान में टाँका लगवा लो यानी उसे सिलवा लो। तोबा तोबा ! बचपन में माँ ने मेरा कान छिदवा दिया था और मैंने भी बेटी का छिदवा दिया था, लेकिन अब यह गवारा नहीं। जब बेटी ने दो-चार और छेद करवाए थे तब भी मैं गनगना गई थी। इसलिए अपने कान के छेद की मरम्मत करवाने से रही मैं ! बावजूद इसके मेरा कर्णाभूषण प्रेम बरकरार है।

एक बार का किस्सा सुनाती हूँ। अपूर्व शांति निकेतन गए थे। वहाँ वे एक दुकान पर गए जहाँ चाँदी के आभूषण थे। उन्होंने मेरे लिए उपहार देखना शुरू किया। जो पसंद आया वह एक-डेढ़ हज़ार का कर्णाभूषण था। यह बात तकरीबन 15-17 साल पुरानी होगी। मतलब अभी की तरह चाँदी में आग नहीं लगी थी, फिर भी महँगा था। अपूर्व ने मुझे वहीं से फ़ोन पर हँसते हुए सुनाया कि मैं आगे बढ़ गया यह कहते हुए कि मेरी बीवी का कान ऐसे ही सुंदर है, ऐसे कर्णाभूषण की ज़रूरत नहीं :) बाद में बगल की किसी दुकान से वे 80 रुपए में नारियल के खोल से बना एक  कर्णाभूषण लेकर आए। बड़ा अलग-सा था। आकार में बड़ा और एकदम हल्का। अभी भी मैं उसे पहनती हूँ और हर बार मुस्कुराती हूँ वह प्रसंग याद कर।

कई बार मुझे ‘फट पड़े वो सोना जिससे टूटें कान’ लेख याद आ जाता है जिसकी लेखिका थीं आलिया बेगम बिन्त मुजीब अहमद तमन्नाई और जो 1911 में ‘ख़ातून’ में छपा था। इसकी झलक देखिए -

अगरचे कानों को छेदकर उनमें ज़ेवर लादने का दस्तूर उठ चला है, मगर फिर भी अक्सर बहनें बावजूद तालीमयाफ़्ता होने के पुरानी लकीर की फ़क़ीर बनी रहती हैं और हद से ज़्यादा ज़ेवर में लदे हुए कानों पर निहायत फ़ख़्र करती हैं।

वे कानों में इस क़दर जे़वर लाद लेती है कि बेचारे कमज़ोर व क़ाबिले रहम कान इस क़दर भारी ज़ेवर का वज़न नहीं सहार सकते और ज़ेवर के बोझ से बिल्कुल झुक जाते हैं। जो निहायत बदनुमा मालूम होते हैं। देखने वालों को ये मालूम होता है कि अब कोई दम में वज़न के मारे कान टूट के गिर पड़ेंगे।

हाथ, पाँव, गले में जितना जी चाहे ज़ेवर पहनें, उसका कुछ मुज़ायक़ा नहीं है, मगर कानों में उनकी बिसात से बढ़कर ज़ेवर पहनना सरासर बेरहमी, वहशीपन की अलामत और नन्हीं सी जान पर सख़्त ज़ुल्म करना है। इनकी हैसियत इस क़ाबिल नहीं है कि इन पर हद से ज़्यादा जे़वर लादा जाए। बल्कि इनको इनकी बिसात के माफ़िक़ जे़वर ही ज़ेब देता है।

जिस तरह तस्वीरों में वहशी क़ौम की औरतों को तांबे, लोहे, लकड़ी वग़ैरह के जे़वर पहने हुए देखा है, उसी तरह हमारे यहाँ भी जे़वर इज़्ज़त की निगाह से देखा जाता है। ख़ुसूसन हमारे मुल्क की मस्तूरात तो माशाअल्लाह ज़ेवर में सिर से पाँवों तक लदी रहती हैं। वो सबसे ज़्यादा ज़ुल्म कानों ही पर रवाँ करती हैं, चाहे घर में और जे़वर न पहनें मगर कानों को किसी हालत में नंगा रखना गवारा नहीं करतीं। घर में हों या बाहर कान हर वक़्त ज़ेवर में लदे हुए नज़र आते हैं।

हालाँकि कान तमाम जिस्म में सबसे छोटे होते हैं। इस हालत पर भी इनमें बालियाँ, पत्ते और और क़िस्म का ज़ेवर पहनना फ़र्ज़ समझा जाता है। अगर खु़दा ना ख़्वास्ता किसी को सोने चाँदी का ज़ेवर मयस्सर न हुआ तो जर्मन सिल्वर वग़ैरह ही का ज़ेवर सही, मगर पहनेंगी ज़रूर। 

ग़रज़ सबसे ज़्यादा क़ाबिले रहम हमारे मुल्क की मस्तूरात ही के कान होते हैं। यहाँ नंगे कान रखना बहुत बड़ा ऐब और बदशगुनी समझी जाती है और अगर कोई बीबी कभी भूले बिसरे कानों में ज़ेवर पहने बग़ैर किसी महफ़िल में शरीक हो जाती है तो इस पर चारों तरफ़ से अंगुश्तनुमाई होने लगती है। सब औरतें उसकी जान को आ जाती हैं और वो अंगे्रज़ी ख़यालात की औरत तसव्वुर की जाती है। उसको इस क़दर शर्मिंदगी उठानी पड़ती है कि फिर कभी भूले से भी कानों में जे़वर पहने बग़ैर किसी महफ़िल में जाने का नाम नहीं लेती। हाँ, जिसके कान ज़ेवर में लदे हुए हों उसकी बड़ी इज़्ज़त और तारीफ़ की जाती है।

2015 में रसचक्र की तरफ़ से जब हम पाठात्मक प्रस्तुति की तैयारी शुरू करने जा रहे थे तब इस लेख को हमने शामिल किया था। 2016 में हम ख़वातीन  नाम से लगभग 100 साल पुरानी मुसलमान औरतों की गैर-कथात्मक रचनाओं की प्रस्तुति हुई थी और उसमें दर्शकों-श्रोताओं को ‘फट पड़े वो सोना जिससे टूटें कान’ याद रह गया था। क्यों न हो ? रिज़वाना ने इसका बहुत अच्छा पाठ किया था। लोगों को खूब मज़ा आया था, पाठ के दौरान हँसी का फ़व्वारा छूट रहा था। यह लेख 19 वीं सदी में औरत के बाहरी रंग-रूप को किस तरह नए साँचे में ढाला जा रहा था, इसकी बात करता है। धर्म की पहचान के साथ औरत अपना औरतपना न छोड़ दे - इसका खतरा हर वक्त सर पर सवार था। पितृसत्तात्मक समाज और जाति-धर्म-समुदाय के ढाँचे को बिना हिलाए-डुलाए यह लेख माहौल में हौले हौले बदलाव की बात करता है। दिलचस्प यह था कि कान के ज़ेवर की बात आज भी वहीं थी।

मुझे याद है कि जब हम ख़वातीन की प्रस्तुति के लिए न्यूनतम ही सही, पर कॉस्टयूम और शृंगार की बात आई थी तो कान के हल्के आभूषण की खोज हुई थी। उस समय मेरा मोतियों का झुमका काम आया था। वैसे यह अंगूर के दानों के गुच्छे जैसा था, कायदे से पारंपरिक झुमके की बनावट से अलग। इसकी खासियत थी कि यह हल्का था और लेखिका आलिया बेगम के मुताबिक कान की बिसात माफ़िक ही था जिसे पहनने पर कान लटकते नहीं। भारी होने और लेखिका की बात पर अमल न करने के तर्क के आधार पर हमने कई मोतियों के झुमके को खारिज़ कर दिया था। कान की नन्हीं सी जान पर जुल्म नहीं करना था हमें। ऊपर से मेरा झुमकानुमा आभूषण नकली मोतियों का था तो उसके लिए विशेष हिफ़ाज़त की दरकार भी नहीं थी। अभी याद कर रही हूँ कि उसे खरीदा कहाँ से था तो याद नहीं आ रहा। शायद घर के करीब कमला नगर के फुटपाथ से या उदयपुर के बाज़ार से या जयपुर की बड़ी चौपड़ से।

बहरहाल, बाद के दिनों में उस झुमकानुमा आभूषण को मैंने प्रस्तुति के लिए सहेजकर अलग रख दिया था। बीच में वह मिला ही नहीं और जब मिला तो पाया कि उसके मोती आपस में उलझ गए हैं। एकाध बार सुलझाने के क्रम में एक-दो मोती छिटक गए। मुझे लगा कि वज़न के कारण तो नहीं, मगर टूट-फूट के कारण अब वे बदनुमा लगेंगे। तब भी इधर कई सालों बाद मैंने फिर उसे पहनना शुरू किया है क्योंकि ज़माने से वह प्रस्तुति हुई नहीं है।

इधर मेरा खजाना तेज़ी से खाली हो गया है। हाँ जी, मेरी कर्णाभूषण पेटिका है - ढेर सारे खाने वाला आयताकार प्लास्टिक का डब्बा। अपूर्व के सुझाव पर ही मैंने इसे खरीदा था क्योंकि घर में यहाँ-वहाँ पड़े रहने वाले कर्णाभूषण से वे भी परेशान हो जाते थे। मैं कहीं बाहर से आकर पहला काम करती हूँ उसे उतारना। फिर भूल जाती हूँ कि कहाँ रखा और ढूँढती फिरती हूँ। यह समस्या अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, मगर कम हो गई है। अब एक निश्चित ठिकाना है कर्णाभूषण पेटिका, जिसे कम से कम हफ्ते भर में एक बार सँभाल देती हूँ। उसमें नई आमद कम है। दूसरा दुख यह है कि उसके चार खानों में टूटा और खो जाने के कारण अवशेष मात्र बचा एक एक  कर्णाभूषण पड़ा मेरा मुँह चिढ़ा रहा है। मोह के मारे मैंने उन्हें फेंका नहीं है। क्या पता किस्मत से कोई बिछुड़ा हुआ मिल जाए! 

मेरी किस्मत बुरी नहीं है। कई बार भूले-भटके किसी कर्णाभूषण का जोड़ा घर के अलग अलग कोनों में मिल जाता है। ऑटो और टैक्सी में ही नहीं, एक बार मेट्रो के प्लेटफ़ॉर्म पर भी मिल गया था। कई बार दोस्त-परिचित ध्यान दिला देते हैं कि देखो अब फिसला तो तब फिसला, सँभाल लो। एक बार मैं एक जगह गई और आधे घंटे बाद कान पर हाथ गया तो एक नदारद था। मैं भागकर लिफ़्ट के पास गई। दसवीं मंज़िल पर लिफ़्ट के बाहर गुमशुदा मिल गया, हालाँकि उसका एक नग गिर गया था। मैंने दूसरे वाले का भी एक नग और एक लटकन निकाल कर दोनों को बराबर कर लिया और दबने से थोड़े टेढ़े हो गए उस बैंगनी चाँदी के कर्णाभूषण को अभी भी पहनती हूँ। अम्मी ने चाव से उसे मेरे लिए चंडीगढ़ से लिया था।

इसका यह मतलब नहीं है कि हर बार किस्मत साथ ही देती है। अभी कुछ महीने पहले की बात है। अपनी आलमारी में एक बटुए में मुझे फ़िरोज़ी रंग का रुनझुन वाला एक हुकदार बुंदा सालों बाद मिला। उस दिन मैंने उससे मैचिंग साड़ी निकाली और एक कार्यक्रम में गई। घुसते ही कई लोग मिले और मिलते ही उस बुंदे की तारीफ़ उन्होंने की। यह लो, लग गई नज़र! थोड़ी ही देर में किसी ने टोक दिया कि तुम्हारे दूसरे कान का बुंदा गिर गया। फटाक से मैंने एक कान में लहराते बुंदे को निकालकर पर्स में रखा और गेट की तरफ़ लपकी। ध्यान से सारा रास्ता देख गई, लेकिन बुंदे का अता पता नहीं था। तत्परता से मैंने उबर टैक्सी वाले के लिए मैसेज छोड़ा। थोड़ी देर बाद उसका फ़ोन आया तो मैंने टैक्सी की सीट पर अपने बुंदे के गिरने की संभावना बताई। उस भलेमानस ने खोजा और फिर अफ़सोस जताते हुए बतलाया कि वहाँ कुछ नहीं है। इस बीच उसे कोई दूसरी सवारी भी नहीं मिली थी तो गायब होने, इधर-उधर होने का सवाल नहीं उठता था। अपनी बेचैनी को वाजिब ठहराने के लिए मैंने उस टैक्सी वाले से यों ही कह दिया था कि जो खोया वह चाँदी का बुंदा था। जबकि वास्तव में वह ऑक्सीडाइज़्ड मेटल का था, बमुश्किल सौ रुपए का रहा होगा। कोई देखे तो मेरी व्याकुलता लाख टके की थी! खैर, किसी तरह मैंने अपने को संतुलित किया और टैक्सीवाले का फ़ोन यह कहते हुए रखा कि कोई बात नहीं। मुझे चिंता हुई कि चाँदी का बुंदा खोने को टैक्सीवाला अपने पर आरोप न माने। अपनी बेवकूफ़ी पर मुझे कोफ़्त हुई और मैं नंगे कान हॉल में दाखिल हुई। पछताते हुए कि आज मैंने क्यों उस बुंदे को निकाला था। न निकालती, न पहनती, न वह गायब होता।      

अब नई लटकन-फटकन चाहिए। जाकर तलाशना है, हल्के और नए डिज़ाइन के। अपूर्व को कहा तो मुस्कुरा कर बोले चलो चलकर तुम्हारे लिए गहना खरीदते हैं, जनपथ पर। मैंने उनको ताना दिया कि अम्मी रहतीं तो आपको डाँट लगातीं। उनको मेरा 'अंट शंट' पहनना कतई पसंद नहीं था। हीरा, सोना या चाँदी उनके लिए ही नहीं, बहुतों के लिए सौभाग्य की निशानी है। (यहाँ स्नेह में लिपटी जातिगत और वर्गगत श्रेष्ठता अचूक है! जेंडर पहचान भी। कान में बालियाँ और झुमके पहनने के लिए किसे कितना दंडित होना पड़ा है, इन अनुभवों से भी अनभिज्ञ नहीं हूँ।) 

अब सब कीमती कर्णाभूषण पहुँच से दूर हैं। इस बार उड़ीसा में फ़िलिग्री के चाँदी के कर्णाभूषण देखकर बिना खरीदे लौट आई। लकड़ी और दूसरे धातुओं के कर्णाभूषण खोजने हैं जो बहुत चमकदार और भड़कीले न हों। नकली हो, पर नकली न लगे - यह चाह कितनी अटपटी है!


 

 

 

 


सोमवार, 30 मार्च 2026

ज़ौक़ की रुबाइयाँ (ZAUQ)

क्या फ़ायदा फ़िक्रे-बेशो-कम से होगा 

हम क्या हैं जो कोई काम हम से होगा 

जो कुछ कि हुआ हुआ 'करम' से तेरे 

जो कुछ होगा तेरे करम से होगा 


दिल को सरे-बाज़ारे-जहां कर न उचाट 

जिस तरह बने सूदो-ज़ियां में दिन काट 

ऐ 'ज़ौक़' फ़लक के जब हैं बारह हिस्से 

सौदा न हो क्यों ज़ेरे-फ़लक बारह-बाट 


आंख उसकी नशे में जब गुलाबी हो जाय 

सूफ़ी उसे देखे तो शराबी हो जाय 

दिखलाये जो वह रूए-किताबी ऐ 'ज़ौक़'

सब मदरसा काफ़िरे-किताबी हो जाय 


जिन दांतों से हंसते थे हमेशा खिल-खिल 

अब दर्द से हैं वही रुलाते हिल-हिल 

पीरी में कहां अब वे जवानी के मज़े 

ऐ 'ज़ौक़' बुढ़ापे से हैं दांता-किल-किल 


करम = कृपा                               सूदो-ज़ियां = हानि-लाभ       

रूए-किताबी = किताबी चेहरा       पीरी = बुढ़ापा 


शायर : ज़ौक़ 

संकलन : ज़ौक़ (प्रकाश पंडित द्वारा संपादित लोकप्रिय शायर और उनकी शायरी शृंखला, नया संस्करण)

सह-संपादन : सुरेश सलिल 

प्रकाशन : राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, 2017 

 

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

पुन्निका-ब्राह्मण संवाद (Punnika-brahman dialogue by Punnika Theri)


श्रावस्ती के धनी सेठ अनाथपिंडक के घर में पुन्निका काम करती थीं। कहा जाता है कि एक दिन पानी लाने जाते हुए रास्ते में बुद्ध के उपदेश पुन्निका के कानों में पड़े। बुद्ध कहते हैं कि निडरता और प्रश्न पूछना ही जीवन जीने का सही तरीका है। एक दिन की बात है पुन्निका पानी लाने नदी पर गईं तो उन्होंने एक ब्राह्मण को पानी में खड़े होकर स्नान-ध्यान करते हुए पाया। उसका नाम उदकसुद्धिका बताया जाता है। वे उस ब्राह्मण से पूछती हैं - 


मैं पानी ढोती हूँ

जब ठंढ होती है तब भी

मैं हमेशा पानी में उतरती हूँ

अपनी मालकिनों की मार के डर से

उनके क्रोध और कुवचन से परेशान

लेकिन अरे ब्राह्मण, तुम्हें क्या डर

कि तुम हमेशा पानी की तरफ़ जाते हो,

कँपकँपाते हाड़ के साथ,

खूब ठंड से डरते हुए?


ब्राह्मण जवाब देता है -

हालाँकि तुम मुझे जानती हो पुन्निका

फिर भी पूछती हो मैं क्यों

निपुणता वाला यह कार्य कर रहा हूँ,

जो बुरे कर्म किए हैं, उनके फल से बचने के लिए।

कोई भी जो बुरा कर्म करता है

चाहे बूढ़ा हो या जवान

उस बुरे कर्म के परिणाम से मुक्त हो जाता है

जल में उन्हें धो लेने से।

पुन्निका फिर सवाल करती हैं -

किसने तुमसे कहा

एक अबोध (कुछ न जानने वाले) जैसे दूसरे अबोध (कुछ न जाननेवाले) को बताता हो

कि किसी बुरे काम के परिणाम से कोई बच जाता है

जल में धो लेने से?
... ... ... 

तो क्या मेंढक और कछुए

सब स्वर्ग को जाएँगे?

और बिसख़ोपड़े और मगरमच्छ,

और जो कुछ भी पानी में रहता हो?... 



कवयित्री - पुन्निका थेरी 
संकलन - इतिहास रचती आवाज़ें 
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 
प्रकाशन - निरंतर ट्रस्ट, दिल्ली 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

बोलने में कम से कम बोलूँ (Bolane mein kam se kam bolun by Vinod Kumar Shukla)


बोलने में कम से कम बोलूँ 

कभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँ 

इतना कम कि किसी दिन एक बात 

बार-बार बोलूँ 

जैसे कोयल की बार-बार की कूक फिर चुप। 


मेरे अधिकतम चुप को सब जान लें 

जो कहा नहीं गया, सब कह दिया गया का चुप। 

पहाड़, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा के बरक्स 

एक छोटा सा टिमटिमाता 

मेरा भी शाश्वत छोटा सा चुप.। 


गलत पर घात लगाकर हमला करने के सन्नाटे में 

मेरा एक चुप - 

चलने के पहले एक बन्दूक का चुप 

और बन्दूक जो कभी नहीं चली 

इतनी शान्ति का 

हमेशा की मेरी उम्मीद का चुप। 


बरगद के विशाल एकान्त के नीचे 

सम्हाल कर रखा हुआ 

जलते दीये का चुप। 


भीड़ के हल्ले में 

कुचलने से बचा यह मेरा चुप,

अपनों के जुलूस में बोलूँ 

कि बोलने को सम्हाल कर रखूँ का चुप। 


कवि - विनोदकुमार शुक्ल 

संकलन - कभी के बाद अभी 

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2012 

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

लड़की हरे भरे पेड़ देखती है (Ladki Hare Bhare Ped Dekhati Hai by Vinod Kumar Shukla)

लड़की हरे भरे पेड़ देखती है 

तो उसे आकाश दिख जाता है। 

ऊंचे ऊंचे मिले जुले मकान देखती है 

तो आकाश दिख जाता है। 

लड़की चाहे पेड़ न देखे 

पेड़ पर बैठी चिड़िया देखे 

उसे आकाश दिख जाता है। 

घर की खिड़की घंटों बंद रखे 

बस थोड़ी सी खोले 

या भूल से 

सड़क पर निकल आये 

दांये जाये या बांये 

उसे आकाश दिख जाता है। 


लड़की बहुत परेशान है। 

                                - 1964 


कवि - विनोदकुमार शुक्ल 

संकलन - वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह 

प्रकाशन - आधार प्रकाशन, पंचकूला, 1996 (प्रथम संस्करण 1981)

शनिवार, 1 नवंबर 2025

खुश होऊँ क्या ! नाखुश भी क्या !! (Khush houn kya by Ramgopal Sharma 'Rudra')


खुश होऊँ क्या ! नाखुश भी क्या !!


फिर आज गगन भर आया है,

स्वाती का मन ढर आया है;

पर कौन करे स्वागत इनका ?

पिंजड़े का बोल पराया है!

पथराई आँखों को घन क्या,

बिजली क्या, इंद्रधनुष भी क्या !!

 

जिनकी सुध ही से मोर मगन 

चलते थे नाच किये बन-बन ,

जब टूट गए नुपुर के सुर,

तब आए तो क्या आए घन ! 

पंखिल चाँदों की पतझड़ को

दल क्या, दूर्वा क्या, कुछ भी क्या !!



कवि - रामगोपाल शर्मा 'रुद्र'
किताब - रुद्र समग्र में संकलित '
मूर्च्छना' संग्रह से 
संपादक - नंदकिशोर नवल
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1991

 

 


गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

मुझे अपने बूट दो (Mourid Barghouti's poem 'Give me your boots' translated into Hindi)


मुझे अपने बूट दो
मुझे अपनी बेल्ट दो
मुझे अपना ख़ाली फ़्लास्क दो
मुझे पसीने से लथपथ अपने मोज़े दो
अपनी प्रेमिका को लिखे अपने ख़त का बाक़ी आधा पेज दो
मुझे लाल से भीगे अपने कपड़े दो
मुझे अपनी पिघली हुई मशीन गन दो
मुझे पानी आख़िरी नज़र दो, तुम्हारे आख़िरी शुबहे दो
तुम्हारी हिम्मत, तुम्हारा अनिश्चय, तुम्हारे अफ़सोस,
भाग निकलने की तुम्हारी क्षणिक इच्छा,
टिके रहने का तुम्हारा फ़ैसला,
दो मुझे तुम्हारी कंपकपाहट जब जहाज़ निशाना बनाता है तुम्हारे जिगरी को
दो मुझे तुम्हारे आँसू जो अनदेखे रह गए
दो मुझे शरणार्थी शिविर का अपना पता
मैं खोजूँगा बचे हुए मकान
बचे हुए लोग
तुम्हारे परिवार के बाक़ी लोग
मैं उन्हें बताऊँगा कि तुम कितने अकेले थे
मैं उनसे तुम्हारे बारे में बात करूँगा
मैं उन्हें तुम्हारा आसरा सामान दूँगा
अगर वे क़त्लेआम में मारे नहीं गए हों

मृत शरीरों का ढेर
दिलों का ढेर
मलबे का ढेर
आकांक्षाओं का ढेर
गर्द का ढेर
सपनों का ढेर
जलकर राख हुई औरतों, बच्चों, बूढ़ों का ढेर
उस घोड़े की मृत देह जो पानी पीने की कोशिश कर रहा था,
छतों का ढेर,
खो गए पुराने रिश्तेदारों का ढेर
बच्चों की चड्ढियों का ढेर
इस मलबे में बच्चे की देह कहाँ है?

माँ कहाँ है
जिसने उसका नाम चुना, उसके पहले हफ़्ते का जन्मदिन मनाया
और उसे अपने दूध से चुप कराया?
रसोई के बर्तनों का ढेर

ख़ाक कर दी गई ख़ुशियों का ढेर
निर्माण के लिए लोहे की छड़ें
पिछवाड़े में एक सैंडल
वह औरत कहाँ है जिसने इसका साइज़, रंग और डिज़ाइन तय किया था
दुकान दुकान मोलभाव करके?
वह अहाते में गिरी और उसकी सैंडल आसमान की तरफ़ उछली ।
चीख़ों का एक ढेर
ख़ामोशी का एक ढेर
ढहे हुए मकानों का एक ढेर
कुर्सियों का एक ढेर
वह आदमी कहाँ है जिसने मेहमानों के लिए स्वागतभरी मुस्कुराहट के साथ दरवाज़ा खोला
और उन्हें खाने के बाद कॉफ़ी दी?
दवाओं का एक ढेर
वह नानी कहाँ है जो नातियों से पूछती थकती नहीं कि क्या वे रात के खाने के बाद ली जानेवाली दवाएँ हैं,
और हमेशा उसे वही जवाब मिला:
"हाँ! नानी, ये वही हैं जो तुम खाने के बाद लेती हो"
जाली हुई कॉपियों का एक ढेर
खिलौनों का एक ढेर
थकान का एक ढेर
रोष का एक ढेर
खजूरों का एक ढेर
सब के सब अब
मौत की
खामोशी के बूटे वाली सफ़ेद चादर से ढँके हुए


फ़िलिस्तीनी कवि : मुरीद बरगूती
अरबी से अंग्रेज़ी: रदवा अशूर (Radwa Ashour)
हिंदी अनुवाद : अपूर्वानंद
स्रोत : Midnight and Other poems Arc Publications, UK,2008

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

किताब (Books by Purwa Bharadwaj)



सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का काव्य-संकलन 'कुआनो नदी' (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1973) मेरे सामने है। उसकी धूल झाड़कर पिछले महीने मैंने अपने सिरहाने वाले थाक में रखा था। यह किताब पापा की है। पहला पन्ना पलटते ही अक्षर चमके - नंदकिशोर नवल और 
नीचे लिखी तारीख 20.2.74 थी। उस चमक ने क्षण भर को उमड़े अश्रुकण को सोख लिया। पापा किताब खरीदते ही उस पर सबसे पहले तारीख के साथ अपना दस्तखत करते थे। ज़्यादातर हिन्दी में और कभी कभी अंग्रेज़ी में। शायद अंग्रेज़ी किताबों पर ही N. K. Nawal लिखते थे। कभी इस पर ध्यान नहीं दिया और न ही इस पर बात हुई। जो भी हो यह उनकी बड़ी अच्छी आदत थी जिससे दूसरे को किताब मारने में बनता नहीं था 😊अपूर्व को भी नही! 

पापा किताबें खूब खरीदते थे। जब विद्यार्थी थे तब भी। माँ ने बताया था कि उन्होंने शादी की रात में अपने वज़ीफ़े के पैसों से खरीदकर दो कविता की किताबें भेंट की थीं। किशोरावस्था में मुझे वह फ़िल्मी से ज़्यादा सनक भरा लगा था। उन किताबों का नाम माँ ने क्या बताया था, मैं भूल गई। शायद एक अज्ञेय की थी और एक धर्मवीर भारती की। या कोई और दो किताबें थीं जिनकी तस्दीक करनेवाला अब कोई नहीं। यह 1959 की बात है। 

आगे चलकर पापा जब शादी-ब्याह और जन्मदिन पर भी किताबें भेंट करते थे, तब मुझे थोड़ा अजीब लगता था। सोचती थी कि उनका किताब-प्रेम दुनियादारी से बेखबर है। जब अपने दोस्तों को भी किताब देने को कहते थे तो कभी कभी यह लगता था कि पापा- माँ कंजूसी कर रहे हैं। हालाँकि हर बार खरीद कर ही देते थे। धीरे-धीरे यह हमारी भी आदत में समाने लगा था (फिलहाल ऐसा नहीं है)। मुझे याद है जब मैंने बच्चन-प्रेमी अपनी स्कूल की दोस्त को बच्चन की किताब भेंट की थी। अब दशकों बाद हमदोनों महज़ उसकी चर्चा से रोमांचित हो जाते हैं।

किताबों की कई श्रेणियाँ थीं - भाषा के मुताबिक (हिन्दी, अंग्रेज़ी, संस्कृत और बांग्ला के अलावा विदेशी भाषाओं की अनूदित किताबें), विधा के मुताबिक (कविता, कहानी, आलोचना आदि) और विषय के मुताबिक (साहित्यिक एवं राजनीतिक)। इनके अलावा जासूसी किताबें भी थीं। तिलिस्मी, ऐय्यारी वाली भी थीं जिन्हें किशोरावस्था तक हमारी नज़रों से छिपा कर रखा गया था। जहाँ तक याद है 'किस्सा तोता-मैना' टाइप रंगीन बड़े आकार की या देवकीनंदन खत्री की 'चंद्रकांता संतति' जैसी। उनको चुरा चुराकर देखा था और तब सोचा भी था कि माँ-पापा क्या अंट-शंट पढ़ते हैं। हालाँकि पापा फख्र के साथ कहते थे कि तुम्हारी माँ की रुचि का 'रेंज' - दायरा काफ़ी वसी (विस्तृत) है - गोर्की, चेखव, टैगोर, शरत बाबू, माणिक बंदोपाध्याय, प्रेमचंद से लेकर जासूसी कहानियों तक।  

तिलिस्मी और रूमानी किताबों की तुलना में जासूसी किताबें उनसे अधिक पाक-साफ़ मानी जाती थीं। माँ खूब पढ़ती थी - कर्नल रंजीत, इब्ने सफ़ी वगैरह। गोपाल राम गहमरी के नाम की छाया तो मन पर है, मगर याद नहीं कि उनकी 'जासूस' पत्रिका हमारे घर में थी या नहीं। शुरुआत में भैया छिपाकर ओम प्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा वगैरह के उपन्यास पढ़ता था। उनको माँ जब्त कर लेती थी और बाद में खुद पढ़ने लगी थी। एक समय आया जब माँ-बेटा सलाह करके पढ़ते थे और आदान-प्रदान होता था। भैया खुले आम पढ़ता था एस. सी. बेदी की राजन-इक़बाल शृंखला। 'चन्दा मामा', 'नंदन', 'पराग', 'बाल भारती' (बोरिंग-सी लगती थी) जैसी पत्रिकाओं को तो अखबारवाला नियम से दे जाता था। पत्रिका पहले किसके हाथ लगती है इसकी ताक में हम दोनों भाई-बहन रहते थे। बीच बीच में बाज़ार से आने वाली पत्रिकाओं में फैंटम, चाचा चौधरी और साबू जैसे पात्र हमारे साथ साथ माँ के भी प्रिय थे। 

घर में शब्दकोश का कोना अलग से था। हिन्दी, उर्दू-हिन्दी, संस्कृत-हिन्दी, संस्कृत-अंग्रेज़ी, अंग्रेज़ी-हिन्दी आदि शब्दकोश के साथ अमरकोश और समांतर कोश (थिसारस), पारिभाषिक शब्दकोश भी कतारबद्ध थे। वैसे पापा से अधिक शब्दकोश माँ देखती थी। थोड़ी भी शंका हो तो रानीघाट वाले घर में पहले तल्ले पर रखी आलमारी से शब्दकोश लाने में हम भाई-बहन टालमटोल करते रहते थे और तब तक माँ चली जाती थी। भरसक पापा को अपने से ज़्यादा माँ के शब्द ज्ञान पर भरोसा था। 

पापा के लिए किताब ज़रूरत थी। वे एक ही किताब के कई कई संस्करण भी लेकर रखते थे और यदा कदा पहले संस्करण से उसका मिलान भी करते थे। किताबों का पहला संस्करण इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण होता चला गया। बहुत बाद में जाकर जब मैं अपने इस 'मनमाफ़िक' ब्लॉग के लिए कविता की किताबों को पलटती थी तो अलग अलग संस्करण में बहुत बार कविताओं की प्रस्तुति में फ़र्क दिखने लगा था और तब मैं पापा के खजाने में से पहले संस्करण को खोजती थी। 

अंग्रेज़ी किताबों के लिए भी पापा उत्सुक रहते थे। 23.6.74 की उनकी एक चिट्ठी है। वे अपने छोटे भाई को लिखते हैं - 

दिल्ली में अंग्रेजी पुस्तकों की दुकान में कुछ किताबें खोजना, शायद इनमें से कुछ मिल जाएँ। Ernst Fischer की दो किताबें हैं - 'The Meaning of Art' (पाकेट बुक में, Pelican) और 'Art against Ideology' । इसके अलावा लूकाच की एक किताब है - 'Studies in Contemporary Realism'। कॉडवेल की एक नयी किताब निकली है - 'Romance and Realism'। इसके अलावा कॉडवेल के  Aesthetics पर मार्गोलीज की एक छोटी सी किताब आयी थी। यह किताब अधिक Important है। इनमें से एक किताब भी मिल जाए तो ठीक है। यदि किसी किताब का दाम ज्यादा हो तो उसे छोड़ देना। यहाँ मैं लोगों से माँगकर काम चला लूँगा।

ताउम्र पापा नई और अपने काम से जुड़ी किताबों के लिए प्रयासरत रहे। उसके लिए उन्होंने खूब यात्राएँ कीं, पुस्तकालयों की धूल फाँकी, वहाँ घंटों बैठकर किताबों से सामग्री कॉपी में उतारी, जिसका संभव हुआ फोटोकॉपी कराकर बाइंड करवाकर सहेजा। उनके द्वारा संपादित 'निराला रचनावली' के लिए मैंने भी पटना विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बैठकर 'मतवाला' की फ़ाइल से निराला की रचनाओं की नकल की थी। उन दिनों पुरानी किताबों का महत्त्व जो समझ में आया वह जीवन भर की सीख बन गया। मेरे चाचा की तो पापा ने जान ही निकाल ली थी जब उन्होंने कलकत्ता की नेशनल लाइब्रेरी में बैठ-बैठकर (अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर) निराला की अन्यत्र अनुपलब्ध किताबों में से रचनाओं को हाथ से कॉपी में उतारा था। उन दिनों जर्जर किताबों की फोटोकॉपी नहीं हो पाती थी और न ही उन्हें स्कैन करके डिजिटल स्वरूप में लाया गया था। ऐसे में पसीना बहाते हुए पुस्तकालय में बैठकर हाथ से विराम चिह्न सहित ज्यों का त्यों  नकल करना ही एकमात्र उपाय था। कई दशक बाद जब मैं पंडिता रमाबाई पर शोध कर रही थी तब यह और तीव्रता से समझ में आया था कि पुस्तकालयों का रख-रखाव और आधुनिक टेक्नॉलजी से संपन्न होना कितना मायने रखता है। 

हमारे घर की किताबों के स्रोत कई थे। उनमें एक छोटा हिस्सा उपहारस्वरूप किताबों का भी था।समीक्षक-आलोचक और संपादक होने के नाते प्रकाशकों और लेखकों के यहाँ से पापा के पास किताबें आने लगी  थीं। कभी कभी तो माँ आजिज़ आ जाती थी। तब उनमें निर्ममतापूर्वक छँटाई का काम किया जाता था। उसमें गुणवत्ता पहला आधार होता था, दूसरा आधार पसंद था। मुझे याद है जब घघा घाट से हमलोग बुद्ध कॉलोनी के घर में आए थे तब कलेजे पर कितने पत्थर रखकर पत्रिकाओं की फ़ाइल हटाई थी। जिल्द मढ़ी हुई काफ़ी पत्रिकाएँ एक लाइब्रेरी को दे दी थीं और खुदरा खुदरा पत्रिकाएँ रद्दीवाले के हवाले कर दी थीं। 

पापा-माँ की पूँजी किताबें थीं और उनको सहेजने के लिए धीरे-धीरे 10 आलमारी जमा हो गई थी। उनमें से दो लकड़ी की हैं जिनमें शीशे लगे पल्ले हैं। अपने गाँव के अपने शीशम के पेड़ की लकड़ी से बनी हुईं इन आलमारियों में शुरुआत में खास किताबें रखी जाती थीं। यदि मैं भूल नहीं रही तो पापा द्वारा संपादित निराला रचनावली सबसे पहले उसी में सजी थी। बाद में वर्णक्रम के हिसाब से किताबों का वर्गीकरण हुआ था। रचनाकारों के अनुसार। बाकी स्टील की आलमारियों में भारी भरकम किताबें रखी जाती थीं। जिनमें शीशे लगे स्लाइडिंग वाले खाने थे उनमें वे किताबें रखी जाती थीं जो अधिक काम में आती थीं या अन्य रचनावलियाँ। अधिक कीमत के कारण अक्सर योजना बनाकर रचनावलियाँ खरीदी जाती थीं और कई बार उधार पर। (राजकमल प्रकाशन या मोतीलाल बनारसी दास के यहाँ पापा का खाता चलता था। शायद अनुपम प्रकाशन के यहाँ भी।) 1980 के दशक में रचनावली और समग्र का शोर था तो उनकी आभा हमारे घर तक भी फैली थी। हम बच्चों को खास हिदायत थी कि रचनावली नंबर के अनुसार सजाई जाए। जहाँ तहाँ से नहीं निकाली जाए। 

किताबों के पुट्ठे (spine) का खास खयाल रखने को कहा जाता था। अरे 'पुट्ठा' शब्द कितने दिनों बाद ज़ेहन में आया ! पुट्ठे पर हाथ रखना - जैसा प्रयोग जब भूल-बिसर गया है तो किताब का पुट्ठा कैसे याद रहता! बहरहाल, हार्ड बाउंड 

माँ के साथ हमलोग अपने घर की 'लाइब्रेरी' की देखभाल करते थे। (पुस्तकालय शायद ही कहते थे हमलोग। वैसे 'लाइब्रेरी' शब्द का इस्तेमाल हमारे अलग अलग किराये के डेरों में किताबों के लिए समर्पित कमरे के लिए भी  होता था।) साफ़-सफ़ाई और किताबों को करीने से सजाने में सबलोग लगते थे। हाँ, भैया ने शायद कम समय दिया होगा। साल में कुछेक छुट्टी के दिनों में किताबों के थाक के बीच लुंगी-गंजी पहने पापा की छवि आज तक मलिन नहीं हुई है। उनकी युवावस्था की उस छवि में कुछ और लोग समय बीतने के साथ जुड़ते गए। उनके कुछ प्रिय जन (जो अनिवार्यतः साहित्यानुरागी होते थे) उनका हाथ बँटाने लगे थे क्योंकि माँ थक चुकी थी और मैं भी विदा हो चुकी थी।  

इनके अलावा किताबों की कई छोटी-बड़ी दुकानों पर साहित्यिक अड्डेबाज़ी होती थी जिसके अभिन्न अंग थे पापा। संभवतः इसी कड़ी में अपने विद्यार्थी जीवन में हमारी अड्डेबाज़ी पटना कॉलेज के सामने स्थित पीबीएच - पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस में होती थी। यहाँ किताबों के बीच आंदोलन से लेकर लड़ाई, रूठने-मनाने से लेकर रोमांस तक चलता रहता था। 

शुरू से यह तय था कि पापा की सारी किताबें अपूर्व ले जाएँगे। उनके बाद ... क्योंकि उनके सामने किताब लाने पर ढेर सारी हिदायतें मिलती थीं और वादे के मुताबिक समय पर न लौटाई जाए तब तगादा करने में पापा संकोच नहीं करते थे। हाँ, हम दिल्ली आ गए तब पापा थोड़ी उदारता बरतने लगे। बोलते थे कि अगली बार दिल्ली से पटना आइएगा तो किताब लौटा दीजिएगा। धीरे-धीरे अशक्त होने लगे तो कहने लगे कि यह किताब रख लीजिएगा। या कभी यह भी कहते कि फिलहाल वो वाली किताब लौटा दीजिएगा क्योंकि पता नहीं कब मुझे पलटने की ज़रूरत आन पड़े। अपूर्व उनको छेड़ने के लिए कुछ मुस्कुराकर कहते और पापा का स्वर थोड़ा कठोर होने लगता था तो माँ उनको झिड़क देती थी कि किताब घर ही में तो रहेगी, आप नाहक चिंता कर रहे हैं। 

2020 की 12 मई को पापा गए, लेकिन किताबें यथावत् घर में रहीं। हमने तय किया था कि माँ के सामने कुछ नहीं छेड़ना है। 15 फरवरी, 2024 को माँ भी चली गई तब विचार किया जाने लगा। वादे के मुताबिक हम दिल्ली पापा की सारी किताबें नहीं ला पा रहे थे। फिलहाल क्वार्टर में हैं, अपना मकान नहीं है। आगे किराये के मकान में कहाँ सारा पुस्तकालय समाएगा ? पापा की केवल गिनती की चुनींदा किताबें लेकर हम दिल्ली आए। शीशम की दो आलमारी भी मूवर्स एंड पैकर्स की मार्फ़त दिल्ली आईं, मेरी इकलौती पुश्तैनी संपत्ति! केवल पापा की लिखी और संपादित किताबों को भैया ने अपनी धरोहर के रूप में रख लिया है। कुछ पसंदीदा किताबें आत्मीय जन ले गए। बाकी किताबों को किसी अच्छे पुस्तकालय में देने की मशक्कत का किस्सा कभी और! हार-दार कर पटना साहित्य सम्मेलन को भैया ने पापा की हज़ारों किताबें भेंट कीं। किताबों के तीन बुकशेल्फ सहित। कुछ रैक और आलमारी पहले ही प्रियजन ले गए। घर खाली हो गया। भैया ने जब किताबों से भरा अंतिम ट्रक विदा किया था तब उसने फ़ोन किया था। वह रो पड़ा कि ऐसा लग रहा है कि मैंने पापा को घर से निकाल दिया है। फ़ोन पर दूसरी तरफ़ मेरे गले में काँटा चुभ रहा था कि असली दगा तो मैंने किया, पापा से, उनकी किताबों से! 




गुरुवार, 25 सितंबर 2025

खामोशी (Mourid Barghouti's poem translated into Hindi)



खामोशी ने कहा:
सच को वाग्मिता की ज़रूरत नहीं।
घुड़सवार की मौत के बाद
घर को मुख़ातिब घोड़ा
सब कुछ कह देता है
बिना कुछ कहे हुए।



फ़िलिस्तीनी कवि : मुरीद बरगूती
अरबी से अंग्रेज़ी: रदवा अशूर (Radwa Ashour)
हिंदी अनुवाद : अपूर्वानंद
स्रोत : Midnight and Other poems Arc Publications, UK,2008

सोमवार, 22 सितंबर 2025

छटपटाहट (Mourid Barghouti's poem 'Eagerness' translated into Hindi)



चौखट ने कहा:

काश! मैं हॉल में जा पाती।

हॉल ने कहा:

काश! मैं बाहर बालकनी में जा पाता।

बालकनी ने कहा:

काश! मैं उड़ पाती!


फ़िलिस्तीनी कवि : मुरीद बरगूती
अरबी से अंग्रेज़ी: रदवा अशूर (Radwa Ashour)
हिंदी अनुवाद : अपूर्वानंद
स्रोत : Midnight and Other poems Arc Publications, UK,2008

























गुरुवार, 18 सितंबर 2025

यह मेरा नसीब था बेथलहम में होना (Poem by Dareen Tatour translated into Hindi)


यह मेरा नसीब था बेथलहम में होना

- पूरब में ख़ासकर 

उन सड़कों पर चलना जिन्हें मैं नहीं जानती 

और दीवारों से पूछना  

बिलबोर्ड की 

कहानी के बारे में, 

मैं तस्वीर को देखती हूँ 

जो राज़फाश करती है 

और छिपे हुए घरों के प्रेतों को उघाड़ देती है

मैं बेचैन रही 

दो दिनों तक…और ज़्यादा नहीं 

बच्चों ने मुझे हर तरफ़ खींचा 

यह नाम …यह क्वार्टर 

आवाज़ और नग़मा   

और आधे ध्वस्त मकान 

छेददार छतें और जलावन 

मेरी देह की स्याही को जगा देते हैं …



फ़िलिस्तीनी कवयित्री  : दारीन तातूर

अरबी से अंग्रेज़ी: जोनाथन राइट  

हिंदी अनुवाद : अपूर्वानंद

संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं
प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023

स्रोत : https://www.newarab.com/opinion/palestinian-woman-detained-israel-over-poem

 


रविवार, 7 सितंबर 2025

पीड़ित नं. 48 ((Mahmoud Darwish translated into Hindi)


वह मरा पड़ा था एक पत्थर पर।

उन्हें उसके सीने में मिला चाँद और एक गुलाबी लालटेन।

उन्हें उसकी जेब में मिले सिक्के।

एक माचिस की डिबिया और एक ट्रैवल परमिट।

उसकी बाँहों पर गुदने थे।

 

उसका भाई बड़ा हुआ

और शहर गया काम खोजने।

उसे जेल में डाल दिया गया

क्योंकि उसके पास ट्रैवल परमिट नहीं था।

वह सड़क पर एक डस्टबिन

और बक्से ले जा रहा था।

 

मेरे देश के बच्चो,

इस तरह चाँद की मौत हुई।



फ़िलिस्तीनी कवि : महमूद दरवेश 

अरबी से अंग्रेज़ी:  अब्दुल्लाह अल-उज़री 

हिंदी अनुवाद :  अशोक वाजपेयी

स्रोत : मॉडर्न पोइट्री ऑफ़ द अरब वर्ल्ड, पेंगुइन बुक्स, 1986 

संकलन : कविता का काम आँसू पोंछना नहीं
प्रकाशन : जिल्द बुक्स, दिल्ली, 2023




शनिवार, 6 सितंबर 2025

झाड़ू वाली (Jhadoo walee by Om Prakash Valmiki)

सुबह पाँच बजे 

हाथ में थामे झाड़ू 

घर से निकल पड़ती है 

रामेसरी 

लोहे की हाथ गाड़ी धकेलते हुए 

खड़ंग-खड़ांग की कर्कश आवाज 

टकराती है 

शहर की उनींदी दीवारों से 

गुजरती है 

सुनसान पड़े चौराहों से 

करती हुई ऐलान 

जागो!

पूरब दिशा में लाल-लाल सूर्य 

उगने वाला है। 


नगरपालिका की सुनसान सड़कें 

धुँधलकों की जमात में 

टिमटिमाते इक्का-दुक्का तारे 

कान पर जनेऊ लपेटे 

गुनगुनाते स्वर में 

श्लोक रटता हुआ पास से गुजरता पंडित 

चाय की दुकान के फट्टे पर 

चीकट मटमैली चादर में लिपटा ऊँघता नौकर 

भट्ठी के पास लेटा कुनमुनाता झबरा कुत्ता 

चौंकते हैं 

पास से गुजरती 

लोहे की हाथ गाड़ी की आवाज़ पर 

कोसते हैं जी भर कर। 


रामेसरी के हाथ में थमी बाँस की मोटी  झाड़ू 

सड़क के ऊबड़-खाबड़ सीने पर 

श्च-श्च की ध्वनि से तैरती है 

उड़ाती है धूल का गुबार। 

धूल : जो सैंकड़ों वर्षों से 

जम रही है पर्त-दर-पर्त 

फेफड़ों में रामेसरी के 

रँग रही है श्वास नली को 

चिमनी-सा 

कारखाने-से उठते धुएँ-सा 


सब कुछ मिलाकर 

एक खाका उभरता है 

जो जिन्दगी की क्रूरता का नमूना है 

जिसमें छोटे-छोटे बच्चों का 

अनवरत सिलसिला है 

जिन्हें लील जाती है 

गन्दगी से उठती दुर्गन्ध 

और, वे न जाने कब बड़े होकर 

गन्दगी के इस शहर में दुर्गन्ध बन जाते हैं। 


फिर एक दिन, जब 

रामेसरी की खुरदरी हथेली हो जाती है असमर्थ 

हाथ गाड़ी को धकेलने में 

छोटे-छोटे हाथ 

सड़क तक लाते हैं 

धकेलकर गाड़ी को,

बदले में पाकर असंख्य जख्म भी 

खामोश रह जाते हैं 

ढोते हैं 

जिन्दगी का भार उसी तरह 

जैसे ढोते रहे हैं इनके पुरखे 

चेहरे पर कुछ लकीरें हैं 

जो वक्त ने उकेरी है। 


साल-दर-साल गुजरते हैं  

दीवारों पर चिपके चुनावी पोस्टर 

मुँह चिढ़ाते हैं। 

जब तक रामेसरी के हाथ में 

खड़ांग-खांग घिसटती लौह गाड़ी है 

मेरे देश का लोकतंत्र 

एक गाली है!

                    - सितम्बर, 1988 


कवि - ओमप्रकाश वाल्मीकि 

संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ 

प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 2024  


किसी किसी कविता-कहानी या लेख में वर्तनी की असमानता देखकर मुझे उलझन होने लगती है। अनुस्वार से 'लोकतंत्र' लिखा है तो 'सितम्बर' ऐसे,  वहीं 'आवाज़' है, मगर गुजरना है! किताब में जहाँ 'ओमप्रकाश' एक साथ है और अंग्रेज़ी में 'Om Prakash' अलग अलग तो वैसा मैंने कई जगह देखा है। जैसे पापा भी हिन्दी में 'नंदकिशोर' नवल लिखते थे और अंग्रेज़ी में 'N. K.' Nawal, इसलिए वो समझ में आता है। मगर अक्सर वर्तनी को लेकर दिमाग चकराता है। सबसे ऊपर विवक्षा भी है - कहने वाली की इच्छा। फिर भी कई किताबें पलटती हूँ। उसमें भी कई बार अलग अलग प्रकाशन में अलग अलग वर्तनी मिलती है। मेरी कोशिश रहती है कि टाइप करते समय सामने की किताब की वर्तनी का पालन करूँ।  



चन्द्रविन्दु की चिन्ता (Chandravindu ki chinta by Gyanendrapati(


मुझे चन्द्रविन्दु की चिन्ता है 
चन्द्रविन्दु नहीं नभ का 
भाषा का 
लिपि का 
देवनागरी लिपि का 
एक मानव-समाज की ऊर्जा का एक अर्थचित्र 
नयनाभिराम 
लिपि के नभ का चन्द्रविन्दु
लिपि जो एक मानव-सभ्यता का आँगन है 

मुझे चन्द्रविन्दु की चिन्ता है 
लिपि को सुदूर जन तक पसारने वाले ये छापाखाने 
रौंद जाएँगे क्या 
देवनागरी लिपि की सर्वाधिक सुन्दर सुघड़ कोमल आकृति 
यन्त्र-वक्ष में 
न रहेगी चन्द्रविन्दु के लिए जगह 
सूरज की पीठ पर छपनेवाले अखबार 
छपेंगे चन्द्रविन्दु के बगैर 

बड़ी होगी जो पीढ़ी बेटे-बेटियों की 
अनुस्वार के उदित गोलाकार में चन्द्रविन्दु की अस्ताभा नहीं पहचानेगी 

कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशन - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

बक्सा (Box by Purwa Bharadwaj)

मेरे पास कई बक्से हैं - लोहे और स्टील के चदरे वाले। सब माँ का दिया हुआ है या उसी का एक-दो मैं ले आई हूँ। उनमें जो बड़ा होता था उनको माँ ट्रंक कहती थी या कभी कभी मुहावरेदार प्रयोग करते हुए संदूक। बल्कि मामा (दादी) संदूक शब्द का अधिक इस्तेमाल करती थी। शब्दों के इस्तेमाल में वस्तु के स्वरूप के अलावा वक्ता की पहचान और रुतबे को भी देखना पड़ता है, इससे मैं वाकिफ़ हूँ। जब बक्स - बक्सा या अंग्रेज़ी के बॉक्स शब्द की व्युत्पत्ति (etymology) खोजने चली तो मैं लैटिन तक ही नहीं गई, भटककर क्रिया रूप बॉक्सिंग और उसके कर्त्ता बॉक्सर तक चली गई। यहाँ ठेठ आयताकार पेटी ही मेरी आँखों के सामने है। 

पिछले कई सालों से मैंने सारे बक्से-ट्रंक-संदूक को ऊपर दुछत्ती (या बॉक्स रूम) या जो अब 'Loft' अधिक कहलाता है, उसमें रख दिया था। धीरे-धीरे उसमें अब बड़े बड़े कार्टन, बड़े गत्ते, टूटी-फूटी चीज़ें और तत्काल इस्तेमाल में न आनेवाले बड़े बर्तन वगैरह रख दिए गए हैं। वह इतना ठसाठस भर गया कि मुझे बक्सों को हटाकर उनके लिए जगह बनानी पड़ी। चार-पाँच बक्सों में से दो छोटे बक्सों को मैंने नीचे उतार दिया। अब घर में उनके लिए जगह बनाना आसान नहीं था। आजकल घर में बक्सा कौन भलामानुस रखता है ? पतिदेव को तो अपनी लोहे की आलमारी भी पसंद नहीं थी, बक्सा कहाँ से रुचता ! 

हाँ तो मैं बात कर रही थी कि दुछत्ती से मेरे 2 बक्से ज़मीन पर आ गए। पहले वे नज़र से ओझल थे और अब साक्षात् सामने थे। रखूँ कहाँ ? ना-नुकुर को अनदेखा करके दावे के साथ मैंने अपने कमरे में ही रख लिया। नीचे एक पुरानी दरी बिछाई और एक के ऊपर एक बक्से को रखकर ऊपर से उसे एक नए मोटे गहरे रंग के सूती दुपट्टे से ढँक दिया। उसके ऊपर मेरे थैले, पर्स, कलम वगैरह के साथ एक शीशे का पेपरवेट भी है जो बिना इस्तेमाल के मारा-मारा फिर रहा था। बक्सों के कोने में गत्ते के खोल में दो बड़ी बड़ी तस्वीरें हैं। उपहारस्वरूप मिली ये तस्वीरें हमदोनों की हैं - कंप्यूटर से बनाई गई। बड़ी जीवंत हैं। अपने घर में यादगार छोटी-छोटी तस्वीर लगाना तो सजावट का हिस्सा है, लेकिन अपनी ही कैलेंडरनुमा तस्वीर टाँगना ज़रा अटपटा लग रहा है। बाद में उस पर माला चढ़ाने का मन होगा किसी को तब शायद काम आ जाएगी :) तत्काल बक्सों की ओट में वे सुरक्षित हैं।  

अगली बार घर में हवा के शुद्धीकरण के लिए 'एयर प्यूरीफ़ायर' आया और  ठंड में एक और 'ऑइल हीटर' आ गया तो मैंने उनके डब्बों को ऊपर दुछत्ती पर चढ़ा दिया। यह सोचकर कि जब कभी घर बदला जाएगा तो सामान ले जाने में काम आएगा। नतीजतन ऊपर से दो और बक्से विस्थापित हुए। इस बार उनको जगह मिली स्टडी में। रोज़ाना झाड़ू-पोंछा करने में दिक्कत न हो और बक्सों में नमी के कारण ज़ंग न लगे, इसलिए मैंने सोचा कि स्टील के बक्सों के नीचे चार ईंट लगा दूँ। माँ लोग यही करती थी। मुझे याद आ रहा है कि माँ कभी कभी ईंट के ऊपर पहले एक मज़बूत पटरा रख देती थी। उनपर चार-चार बक्से एक के ऊपर एक रखे जाते थे। एकदम संतुलित रहते थे। बक्सों को उतारना-चढ़ाना सब माँ अकेले करती थी। पापा या भैया ने कभी उसमें हाथ लगाया हो, मुझे याद नहीं। उम्र के साथ जब माँ अशक्त होने लगी तो उन बक्सों को खोलना-बंद करना भारी पड़ने लगा था। सहायिका-सहायक के बूते काम चलता रहा, नैपथलिन की गोलियाँ डलवाई जाती रहीं। माँ के आदेश का स्वर कब खुशामद में बदल गया, अंदाजा नहीं। पलटकर सोचती हूँ तो बक्सों की उस उपेक्षा में कहीं न कहीं हम माँ और उसके लगाव की उपेक्षा कर रहे थे।  

बदसूरत न लगे, इसलिए पहले लोग बक्सों के नीचे लगी ईंटों को अखबार में लपेट देते थे और साल-छह महीने में वह अखबार बदलकर नए अखबार में ईंटों को लपेट दिया जाता था। [औरतों का जिम्मा था यह या कम से कम उनकी देख-रेख में यह साज-सँभाल होता था। पितृसत्तात्मक घर के ढाँचे ने घर की 'रानी' को घर के भीतर का राज-पाट (वह भी पूरा नहीं, आंशिक) सौंप रखा है जिसमें बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। माँ की तरह मैं भी अधिकतर वही भूमिका निभाती हूँ - चयन (Choice) की आज़ादी और एजेंसी के नाम पर!] लेकिन अब 'आउटडेटेड' बक्सों के लिए इतना तरद्दुद कौन करे और यह भी कि जब से ई-पेपर लिया जाने लगा है अखबार मिलता कहाँ है! कभी कोई सामान आ गया अखबार में और वह सही-सलामत साफ़-सुथरा हुआ तो उसे सहेज लिया, वरना तुड़ा-मुड़ा अखबार तो फेंक दिया। मुझे याद है कि एक बार मैं शताब्दी ट्रेन से एक अखबार उठाकर ले आई थी। अब तो ताखे भी खत्म हो गए हैं जिनपर पुताई के चूने से बचने के लिए अखबार बिछाते थे हमलोग। खैर, अब ताखा, पोचारा - चूने से दीवारों की पुताई और छपाई की स्याही की गंध वाले अखबार के लोप होते जाने का विलाप किसी और दिन!

फिलहाल मैंने बक्सों के पैर की तरह लगी ईंटों को अखबार में नहीं लपेटा है। वे नई ईंटें हैं, हालाँकि साबुत नहीं हैं। कॉलोनी में कहीं काम चल रहा था तो छँटी हुईं ईंटों के ढेर में से मेरी वर्तमान सहायिका सरोज चार ईंट उठा लाई थी। सिर पर रख कर ऊपर लाई क्योंकि तीन मंज़िल चार ईंट हाथ में उठाकर लाना आसान नहीं था। उन पर एक नहीं, दो बक्से जम गए हैं। वे डगमगा नहीं रहे। मैंने एक पुराना मेज़पोश - टेबलक्लॉथ डालकर बक्सों को ढँक दिया है।  उनके ऊपर बैठा जा सकता है, लेकिन मैंने किताबों की नई थाक रखने के लायक उसे बना दिया है। उस स्टडी में कोई बाहरी आने-जाने से रहा, सो फ़िलवक़्त वे बक्से इत्मीनान से हैं। मध्यमवर्गीय घरों की साज-सज्जा पर बनी किसी रील में वैसे ढँके-दुबके बक्सों को देख आप हँस सकते हैं, अन्यथा मेरे जैसों के लिए वह यादों का ज़खीरा है।  

बक्से के पैर से ध्यान आया कि इसका पूर्वज लकड़ी का 'चेस्ट' (Chest) भी चौपाया होता था। प्राचीन मिस्र देश में सदियों पहले जो 'चेस्ट' मिलता था उसमें भी पैर लगे होते थे। कपड़े, गहने, काग़ज़ात,  कीमती असबाब आदि रखने के लिए चेस्ट सर्वोत्तम फर्नीचर था। ढक्कन, ताला और उसे समेटने के लिए लोहे की पट्टी उसकी आरंभिक बनावट का अनिवार्य हिस्सा हैं। उसके बावजूद वह सादा सा था। प्राचीन राजमहलों, खज़ानों, यूरोपीय चर्चों आदि में उनके अवशेष मिल जाएँगे। ब्रिटैनिका के मुताबिक 13 वीं सदी में फ़्रांसीसी लोगों ने उसमें पच्चीकारी की शुरुआत की। दिलचस्प यह था कि इस काल के अन्य चेस्ट की बनावट पर Romanesque art (11 वीं-12 वीं सदी में यूरोप में विकसित कला जिसमें कई सभ्यताओं की कलाओं का मिश्रण था) और Gothic art (मध्य 12 वीं सदी से 16 वीं सदी के बीच यूरोप में विकसित कला) की छाप दिखती है। स्थापत्य कला का मूर्ति कला, चित्रकला से जुड़ाव स्वाभाविक रहा है और कला की विशेष शैली का प्रभाव हम अनेकानेक क्षेत्र में देखते आए हैँ। उसी तरह फ़र्नीचर बनाने के लिए Romanesque art एवं Gothic art से विचार (idea) लेना अजूबा नहीं है। यदि हम पुराने चेस्ट की तस्वीरें देखें तो उनका अर्धगोलाकार होना हमें मेहराबों की याद दिला देगा। संग्रहालयों में उसे देखा भी है। 'एंटीक' डिज़ाइन के रूप में आधुनिकतम फ़र्नीचर की वेबसाइट पर भी। 

चेस्ट खोलने-बंद करने में सहूलियत लाने और उसकी उपयोगिता को बढ़ाने के लिहाज से ही शायद ड्राअर का डिज़ाइन बना होगा। तभी तो 17 वीं सदी से कई ड्राअर वाले चेस्ट ही प्रचलित हो गए। इधर मध्य युग में ही कप और अन्य बर्तन रखने के लिहाज से cupboard - कबर्ड जैसी संरचना विकसित हो चुकी थी। उसमें जो अलग अलग खाने यानी ताक (shelves) बनने लगे थे, वे परंपरा से चले आ रहे थे। सामान रखने के लिए अलग अलग खानों की ज़रूरत सभ्यता के आरंभिक दौर में ही महसूस की गई थी। कहते हैं कि पाषाणकाल में खानाबदोश जीवन में गुफाओं-कंदराओं में प्राकृतिक रूप से बने गहरे गड्ढे ताक का काम कर रहे होंगे। धीरे-धीरे चेस्ट में भी खाने/ताक बनने लगे थे ताकि अलग अलग सामान का संग्रहण हो सके। आगे चलकर चेस्ट और कबर्ड के मकसद और उनकी बनावट में मेल-जोल हुआ। अब कबर्ड में पल्ला खुलता था सामने, न कि चेस्ट की तरह ऊपर। आजकल तो जगह की कमी ने पल्ला/दरवाज़ा/ढक्कन सबका स्लाइडिंग विकल्प दे दिया है। जब हमने तीन गहरे-गहरे ड्राअर वाला चेस्ट मुनिरका में फ़र्नीचर की दुकान से बनवाया था तब माँ को वह भाया था। उसे लगा था कि कई बक्सों की जगह ऐसा फ़र्नीचर ज़्यादा माकूल है। मेरा ध्यान गया कि सामान रखने वाला बक्सा फ़र्नीचर की कोटि में आराम से आएगा, पैकेजिंग वाला बॉक्स नहीं। 

चलिए बक्सा पुराण पर लौटते हैँ! मेरा एक बक्सा जो शादी में मौसी ने दिया था, वह ऊटी में एक आवासीय स्कूल में छूट गया। इसकी टीस गाहे बगाहे उठती रहती है। बिना स्कूल के पदाधिकारियों को बताए मैं बेटी को ऊटी से 22 दिन में ही लेकर भाग आई थी। कहा था कि हफ़्ते भर के लिए ले जा रही हूँ, मगर मुझे पक्का मालूम था कि वहाँ वापस नहीं लौटना था। इस चक्कर में ढेर सारे गर्म कपड़ों के साथ बक्सा वहीं रह गया। बहुत बाद में स्कूल वालों ने कुछ कपड़े किसी के हाथ भिजवाए, मगर रज़ाई-कोट आदि के साथ वो मेरी शादी वाला बक्सा वहीं रह गया। मैंने बहुत दुख मनाया, लेकिन एक बक्से को लाने के लिए उतनी दूरी की यात्रा मुमकिन नहीं थी। यात्रा व्यय की चिंता से अधिक मामला यह था कि मुझे भावनात्मक दबाव फिर नहीं झेलना था। लिहाजा बक्से का यह बिछोह सह गई!

इसी से याद आया माँ की शादी वाला लाल बक्सा और उससे बड़ा काला टूटे कुंडे वाला ट्रंक जिसमें नानाजी और पापा की डायरी रखी रहती थी। माँ को नए-नए ब्रीफ़केस-सूटकेस की भीड़ में उन बक्सों को अपने जीते-जी नहीं हटाना था। लाल बक्से में अँखरा धोती, नई साड़ी, 2x2 रुबिया ब्लाउज़ पीस, पेटीकोट का पॉपलीन कपड़ा, शादी-ब्याह में मिला हुआ पैंट-शर्ट का कपड़ा (विमल, सियाराम या रेमण्ड्स का) साड़ी का नया फ़ॉल, नई चादर और बुनाई के काँटे वगैरह सँभाल कर रखे हुए थे। बुनाई की अलग अलग नंबर की सलाइयों को माँ ने बाद में बक्से से निकलवाकर अपने कमरे वाली आलमारी में रख लिया था। वह उन सलाइयों के लिए सुपात्र खोज रही थी जो उनका कदरदान हो, जिसे बुनाई का शऊर हो। मैंने बमुश्किल एक हाफ़ स्वेटर बनाया था और नमूने के तौर पर स्कूल में जमा करने के लिए कुछ छोटा-मोटा बनाया था। बेटी के लिए शौकिया एक नन्हा-सा स्वेटर बनाकर मैंने माँ और मौसी की बुनाई के हुनर के आगे हथियार डाल दिए थे। असल में मेरा मन ही नहीं लगता था। 

माँ की इच्छा थी कि उसकी शादी वाला बक्सा घर में ही रहे। मेरे लिए वह धरोहर होती, मगर उसके जाने के कुछ महीनों बाद जब घर खाली किया जा रहा था तब ठस्स बनकर हमने बहुत कुछ हटा दिया। सबकुछ तितर-बितर हो गया, जानते-बूझते। यह सोचकर संतोष किया कि माँ की देख-रेख करनेवाली मीरा-गौरी के जीते-जी उनके पास भी माँ की निशानी रहेगी। बाद में तो उनके बच्चे भी हमारी तरह इन बक्सों को हटा देंगे। मैं अपने पास रखे माँ के चंद बक्सों को देखकर अपना अपराध-बोध कम करने की नाकामयाब कोशिश करती हूँ। सोचती हूँ कि बरगद की तरह बक्सों की जड़ें मेरे दिल-दिमाग से लेकर मेरे रुँधे गले में अटकी हैं।  

बक्से का छोटा बक्सी जैसे संदूक़ का संदूक़ची (छोटा-नाजुक बनाने के लिए जो प्रत्यय लगते हैं अक्सर उनको भाषा एवं जेंडर की निगाह से देखना चाहिए) कहलाता है और एक बक्सी है मेरे पास। तकरीबन 45-46 साल से। यह उन दिनों की बात है जब स्कूल बैग की जगह थोड़े खाते-पीते घरों के बच्चों के पास अल्युमिनियम या स्टील के चदरे वाला छोटा बक्सी आने लगा था। बहुत कायदे का और खूबसूरत तो नहीं, मगर एक बक्सी मेरे पास भी आया। भैया के पास नहीं क्योंकि उस ज़माने में भी लड़के वैसी चिकनी-चमकती बक्सी नहीं ले जाते थे। यह मैं अपने सीमित अनुभव और याददाश्त से लिख रही हूँ, मुमकिन है कि दूसरी जगह लड़के ले जाते हों और तब गौर से उनकी बनावट में 'मर्दानगी' कैसे पिरोई गई थी, इसे परखना पड़ेगा। ज़रा रुकिए, अभी अभी मेरे एक देवर ने अल्युमिनियम वाला बक्सा (बक्सी) लेकर स्कूल जाने की बात बताई। उसमें मज़ेदार था मुझसे यह पूछना कि आप बक्सा लड़ाई खेली हैं या नहीं। उसके इस व्हाट्सएप संदेश में भी उसकी मुस्कुराहट छुप नहीं रही थी - "हमलोग दोस्तों के बक्से से अपना बक्सा लड़ाते थे और जिसका बक्सा पिचक जाता था वो हार जाता था।"

खैर, मैं वह बक्सी लेकर कभी स्कूल नहीं गई। मुझे उसका भोथरापन पसंद नहीं था, बावजूद इसके कि वह मेरे लिए कीमती था। मैंने उसमें क्या-क्या छिपाकर रखा, इसका खुलासा करने में अभी भी शर्मा रही हूँ। एक छुटका ताला खरीदा था, जिसकी चाभी 24 घंटे मेरे पास रहती थी। माँ-पापा बिना सिद्धांत बघारे बच्चों की निजता (प्राइवेसी) का खयाल रखते थे। भैया भले चिढ़ाता रहता था और खेल-खेल में धमकाता था कि बच्चू, तुम्हारी बक्सी मेरे हाथ लग जाए तब देखना। फिर सबके ध्यान से वह बक्सी उतर गई जो आज भी मेरे पास उसी रूप में सुरक्षित है। केवल कुंडा टूट गया है और ताला नहीं है, मगर अब उस गोपन की रक्षा की चिंता नहीं है। 

निजता, गोपनीयता, सम्मान कितना कुछ जुड़ा है बक्से से! माँ बताती थी कि जब शादी के बाद बिना उससे पूछे और बिना उसको बताए उसका बक्सा खोलकर ससुराल में सामान बाँट दिया गया था तब वो भौंचक्क रह गई थी। शहरी नववधू को यह गँवईपन लगा था, असभ्यता लगी थी (हालाँकि गँवईपन और असभ्यता अनिवार्य रूप से जुड़े नहीं हैं)। अधिकार की बात है इसमें। अधिकार-क्षेत्र का अधिक्रमण भी है। कौन किसका बक्सा कब और क्यों खोले, यह घर-परिवार में सबको मालूम रहता है और रस्म के नाम पर यह अभी भी बेरोक-टोक चल रहा है। मगर माँ को अपने अस्तित्व से इन्कार करना लगा था यह। अपना बक्सा अपने मुताबिक रखने की आज़ादी की ख्वाहिश में स्त्री का मन कौन पढ़ पाता है ? वह उसका जो करे, चाहे तो पूरा उकट कर रख दे।  

पिछले हफ़्ते सुधा भारद्वाज की किताब 'फाँसी यार्ड' में जब 'झाड़ती' के बारे में पढ़ रही थी तब मन काँप गया था। जेल में 'झाड़ती' शब्‍द का उपयोग नियमित रूप से की जानेवाली तमाम तरह की तलाशियों के लिए किया जाता है। पहला झटका जेल में दाखिल होते ही लगता है जब पूरा नंगा कर तलाशी ली जाती है। बेहिस्सपने की इंतहा देखिए कि उठक-बैठक करवा कर तलाशी ली जाती है कि किसी ने गुप्‍तांगों में तो कुछ नहीं छिपा रखा है। अचानक अभी मुझे 'झाड़ती' शब्द बक्से की तलाशी के किस्से के प्रसंग में कौंधा। इतना दुखदायी और अपमानजनक कि मैं उससे बचना चाहूँगी। कुछ बातें दफ़न रहें तो बेहतर है। वास्तव में एक बक्सा जब शक के नाम पर दूसरे द्वारा खोल दिया जाता है तो केवल भरोसा तार-तार नहीं होता, बल्कि रिश्ता तार-तार हो जाता है। 





 

शनिवार, 23 अगस्त 2025

बहर-ए-तवील (Bahar-e-taveel by Muztar Khairabadi)

मैं यही सोच रहा था उसे क्यों हमने दिया दिल 

है जो बेमेहरी में कामिल, जिसे आदत है जफ़ा की 

जिसे चिढ़ मेहर-ओ-वफ़ा की, जिसे आता नहीं आना, ग़म-ओ-हसरत मिटाना 

जो सितम में है यगाना, जिसे कहता है ज़माना 

बुत-ए-बेमेहर-ओ-दग़ा बाज़, जफ़ा पेशा फुसुँसाज़,

सितम खाना बरअन्दाज़, ग़ज़ब जिसका हर इक नाज़, नज़र फ़ितना,

मिज़ा तीर, बला ज़ुल्फ़-ए-गिरहगीर, ग़म-ओ-रंज का बानी 

क़ल्क़-ओ-दर्द का मूजिद, सितम और जौर का उस्ताद, जफ़ाकारी में माहिर 

जो सितमकश-ओ-सितमगर, जो सितमपेशा है 

दिलबर, जिसे आती नहीं उल्फ़त, जो समझता नहीं चाहत 

जो तसल्ली को न समझे, जो तशफ़्फ़ी को न जाने, जो करे कौल न पूरा 

करे हर काम अधूरा, यही दिन-रात 

तसव्वुर है कि नाहक़ उसे चाहा, जो आए न बुलाए,

न कभी पास बिठाए, न रूख-ए-साफ़ दिखाए, न कोई बात सुनाए 

न लगी दिल की बुझाए, न कली दिल की खिलाए 

न ग़म-ओ-रंज घटाए, न रह-ओ-रस्म बढ़ाए, जो कहो कुछ तो खफ़ा हो 

कहे शिकवे की ज़रूरत, जो यही है तो न चाहो,

जो न चाहोगे तो क्या है, न निबाहोगे तो क्या है 

बहुत इतराओ न दिल दे के, ये किस काम का दिल है 

ग़म-ओ-अन्दोह का मारा, अभी चाहूँ तो रख दूँ उसे तलवों से मसलकर 

अभी मुँह देखके रह जाओगे,

हैँ, इनको हुआ क्या कि मेरा दिल लेके मेरे हाथ से खोया।   


शायर - मुज़्तर खैराबादी (1865-1927)

संकलन - सलमान अख्तर की 'घर का भेदी'

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2024 

अपने 'मनमाफ़िक' ब्लॉग के लिए कविताएँ चुनने के लिए पहले मैं खूब किताबें खरीदती थी। धीरे-धीरे मेरे आलस ने व्यस्तता और अनमनेपन की ओट ले ली। इसको दूर करने का प्रयास जारी है। 'घर का भेदी' दिलचस्प किताब है। सलमान अख्तर ने अपने दादा मुज़्तर खैराबादी, वालिद जाँ निसार अख्तर, मामू मजाज़, भाई जावेद अख्तर पर लिखा है। पेशे से डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक सलमान अख्तर खुद भी शायर हैँ। उनका गद्य कमाल का लगा मुझे। उर्दू का प्रवाह तो अप्रतिम है। 

(नुक़्ते की गड़बड़ी की माफ़ी क्योंकि बीसियों कोशिश के बाद भी 'ख' और 'फु' में न लगा। अक्सर कोई और शब्द लिखकर- उसमें से काटकर नुक़्ते वाला शब्द निकाल लाती हूँ।)



गुरुवार, 21 अगस्त 2025

गोबरैले (Gobraile by Sarveshvar Dayal Saxena)

यह क्या हुआ 

देखते-देखते 

चारों तरफ गोबरैले छा गए। 


गोबरैले - 

काली चमकदार पीठ लिए 

गंदगी से अपनी-अपनी दुनिया रचते 

ढकेलते आगे बढ़ रहे हैं 

कितने आत्मविश्वास के साथ। 


जितनी विष्ठा 

उतनी निष्ठा। 

कितनी तेज़ी से 

हर कोई यहाँ रच रहा है 

एक गोल-मटोल संसार 

और फिर उसे 

तीखी चढ़ाइयों 

और ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर 

ठेलता जा रहा है। 


देखने-सुनने और समझने के लिए 

अब यहाँ कुछ नहीं रहा - 

सत्ताधारी, बुद्धिजीवी, 

जननायक, कलाकार,

सभी की एक जैसी पीठ 

कालई चमकदार,

एक जैसी रचना 

एक जैसा संसार। 


पच्चीस वर्षों से लगातार 

यही देखते-देखते 

लगता है हम सब 

गोबरैलों में बदल गए हैं,

यह दूसरी बात है 

कि अपना संसार रचने के प्रयास में 

हम औंधें गिर पड़े हैं ;

हमारे नन्हें-नन्हें पैर 

इस शून्य में निरंतर चल रहे हैं 

और चलते जा रहे हैं 

जब तक यह विराट आकाश 

एक गंदी गोली में न बदल जाए। 

                   2 

अच्छे से अच्छा शब्द फूलकर 

गोबरैले में बदल जाता है 

और बड़े से बड़े विचार को 

गंदी गोली की तरह ठेलने लगता है - 

चाहे वह ईश्वर हो या लोकतंत्र । 


गोबरैले चढ़ रहे हैं 

गोबरैले बढ़ रहे हैं 

और हम सब 

ग़लीज़ इश्तहारों से लदी 

दीवार की तरह निर्लज्ज खड़े हैं। 


क्रांति के नाम पर 

यदि ये कभी कुचल भी गये 

तो कहीं खून नहीं होगा 

एक लिजलिजे पीले मवाद-सा 

चारों तरफ़ कुछ फैल जायेगा। 

                3 

हरे हैं जंगल 

हरे हैं घाव 

हरे हैं दुख 

लेकिन सब काला-काला दीखता है 

(इन्हीं गोबरैलों के कारण)


काली हैं आँधियाँ 

काले हैं खून 

काले हैं मन 

लेकिन सब हरा-हरा दीखता है 

(इन्हीं गोबरैलों के कारण)  

                                       (दिसंबर, 1969) 


कवि - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 

संकलन - कुआनो नदी 

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1973 


यह किताब पापा की है। पहले पन्ने  पर उनके दस्तखत के नीचे तारीख 20.2.74 की है। 'गोबरैले' कविता के अंत में उनकी लिखावट में टिप्पणी दर्ज है - "बेचैनी, घनघोर अनास्था की कविता"। पहले पन्ने पर "जितनी विष्ठा/उतनी निष्ठा।" जहाँ है उस पर निशान लगा कर उन्होंने लिख रखा है - "धूमिल - 'भाषा की नाक पर रूमाल रखकर निष्ठा की तुक विष्ठा से मिला दूँ।' यह तुक सर्वेश्वर ने मिलाई।" आज सालों बाद उनकी लिखावट देखकर बहुत अच्छा लगा। ऐसा लगा कि वे हैं, पटना में हैं, डुब्बी मारकर लिख-पढ़ रहे हैं।