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शनिवार, 14 जुलाई 2012

क़ब्रिस्तान में औरतों की रूहें (Kabristan mein auraton ki roohein by Zahida Hina)


...ख़बर कुछ यूँ है कि कराची से पाँच सौ किलोमीटर के फ़ासले पर ताल्लुक़ा हेडक्वार्टर ढरकी से सत्तर किमी.दूर यूनियन कौंसिल बरुथा में चार कब्रिस्तानों का पता चला है, जिनमें लगभग दो सौ औरतें दफ़न हैं, इन कब्रिस्तानों में आम लोग और बस्ती वाले दाख़िल नहीं हो सकते. यहाँ सिर्फ़ वही लोग आते हैं, जो यहाँ किसी औरत को लाकर क़त्ल करते हैं और फिर यहीं दफ़न कर देते हैं. इन क़ब्रिस्तानों की कोई चारदीवारी नहीं है और इनमें हर तरफ़ झाड़ियाँ उगी हुई हैं. आसपास के आठ-दस गाँव ख़ाली हो चुके हैं, क्योंकि इन गाँव वालों का कहना है कि रात में उन्हें क़त्ल होने वाली औरतों की रूहें नज़र आती हैं और उनके रोने की आवाजें सुनाई देती हैं.
   21 वीं सदी में हमारे यहाँ की बेशुमार गरीब और पिछड़ी हुई औरतों का यह मुक़द्दर है. उनके अंजाम पर उदास होते हुए मुझे भोपाल की रियासत याद आती है, जहाँ एक सदी से ज्यादा सिर्फ़ औरतों ने हुकूमत की. प्रिंसेस आबिदा सुल्तान याद आती हैं, जिनकी खुद-नविश्त (आत्मकथा)  उनकी मौत से कुछ दिन पहले 'मेमोरीज़ ऑफ़ अ रीबेल प्रिंसेस' के नाम से आई है. भोपाल की बेगम आबिदा सुल्तान ने अगर एक बाग़ी शहज़ादी की ज़िंदगी गुज़ारी तो इस बारे में हैरान नहीं होना चाहिए. फ़ारसी, अरबी, उर्दू और अंग्रेज़ी उन्हें बचपन से पढ़ाई गई. लकड़ी का काम और जस्त के बरतन बनाना सिखाया गया.वह कमाल की निशानेबाज़ और घुड़सवार थीं. घुड़सवारी उन्होंने उस उम्र में सीखी, जब उन्होंने चलना भी नहीं शुरू किया था. वह हॉकी और क्रिकेट खेलतीं, मौसिक़ी की शौक़ीन थीं. हारमोनियम बजातीं और हर एडवेंचर में आगे-आगे रहतीं. कार चलातीं, तो उसकी रफ़्तार से साथ बैठने वालों की चीख़ें निकल जातीं. मुहिमजूई (एडवेंचर) उनके मिज़ाज का हिस्सा थी. ऐसे में साबिक़ (पूर्व) बेगम भोपाल, सुल्तान जहाँ बेगम की निगरानी में कड़े परदे की पाबंदी करना उनके लिए एक सज़ा थी. बारह बरस की उम्र में जाकब वह वाली अहद (उत्तराधिकारी) नामज़द की गईं, तो शाही जुलूस में वह इस हुलिए में शामिल थीं कि उनका पूरा वजूद एक काले बुरके में लिपटा हुआ था और सियाह बुरके की टोपी पर ताज जगमगा रहा था. 
   यह सब कुछ आबिदा सुल्तान के लिए अज़ाब से कम न था. आख़िरकार उन्होंने रस्सियाँ तुड़ाईं, कमर से नीचे आने वाले बाल काटकर फेंके. पर्दा तर्क किया (छोड़ा) और भोपाल की सड़कों पर मोटरसाइकिल दौडाने लगीं. एक मर्तबा घर से फ़रार हुईं और भेस बदलकर हवाई जहाज़ उड़ाना सीखती रहीं. उधर भोपाल के नवाब उनकी तलाश में हिंदुस्तान भर की ख़ाक छानते रहे. शादी हुई, एक बेटा पैदा हुआ. शहज़ादी की शादी को नाकाम होना था, सो हो गई...
   प्रिंसेस आबिदा सुल्तान की खुद-नविश्त हिन्दुस्तानी अशराफिया (खानदानी लोग) की एक ऐसी औरत की कहानी है, जिसने बग़ावत के रास्ते पर क़दम रखा और अपने बाद आने वालियों के लिए नयी राहें खोलीं. यह खुद-नविश्त हमारे सामने भोपाल के महलात से मलीर (कराची) के मज़ाफात (ग्रामीण क्षेत्र) और मुल्क चीन से अमेरिका तक ज़िंदगी गुज़ारने वाली ऐसी लडकी का किस्सा है, जिसने उस अहद (ज़माने) की लड़कियों और औरतों की आँखों में ख़्वाबों के जाने कितने चिराग़ जलाए. लेकिन मुझे घोटकी (ढरकी ?) के क़ब्रिस्तान में दफ़न वे कारी औरतें याद आती हैं, जिनके लिए किसी आँख से आँसू नहीं गिरते और जिनकी क़ब्र पर कोई चिराग़ नहीं जलता . 
                                                                                           14 अगस्त, 2005

                               
                    लेखिका  - जाहिदा हिना
                    संकलन - पाकिस्तान डायरी
                    प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2006

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

चेतावनी (Warning by Taha Muhammad Ali)



शिकार के शौकीनो,
और अपना शिकार तलाशते नौसिखुओ :
अपनी  राइफलों को न साधो
मेरी खुशी पर ;
जिसकी औकात
बुलेट के दाम बराबर नहीं
( तुम उसे बेकार ही करोगे)
जो तुम्हें इतनी फुर्तीली और खूबसूरत लगती है
हिरनौटे की तरह,
और उड़ती फिरती है
हर तरफ,
एक तीतर की तरह,
खुशी नहीं है.
यकीन करो मेरा :
मेरी खुशी का
खुशी से कोई वास्ता ही  नहीं.

    



फिलिस्तीनी कवि - ताहा मुहम्मद अली
संग्रह - ‘सो व्हाट’, 1971 से 2005 के बीच की नई और चुनींदा कविताएँ अरबी से अंग्रेज़ी अनुवाद और चयन - पीटर कोले, याह्या हिलाज़ी , गब्रैल लेविन
प्रकाशक - कौपर कन्योन प्रेस, वाशिंगटन, 2006
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद


ताहा मुहम्मद अली इस्राइली हमले के चलते कभी के ऐतिहासिक शहर सेप्फोरिस के स्थल पर बसे गाँव सफ्फुरिया से बेवतन होकर लेबनान में रहे. फिर उन्होंने नाज़ेरथ में घर बसाया.

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

नीम (Neem by Subhadra Kumari Chauhan)


सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूं तुझे l
तुहि  जानकर अति  लाभकारी  हर्ष  होता है मुझे ll
ये लहलही  पत्तियाँ हरी  शीतल  पवन  बरसा रहीं l
निज मन्द  मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं ll
हे नीम !  यद्यपि  तू  कडू नहिं रंच मात्र मिठास है l
उपकार  करना   दूसरों  का  गुण  निहारे  पास है ll
नहिं रंच मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुन्दर कली l
कडुवे फलों  अरु  फूल में,  तू  सर्वदा  फूली फली ll
तू   सर्वगुणसंपन्न     है, तू जीव  हितकारी  बड़ी l
तू   दुखःहारी  है  प्रिये !   तू   लाभकारी   है  बड़ी ll
तू   पत्तियों  से  छाल से  भी   काम  देती  है  बड़ा l
है  कौन ऐसा घर  यहाँ  जहाँ काम तेरा नहिं पड़ा ll
वे  जन  तिहारे  ही शरण  हे  नीम ! आते हैं सदा l
तेरी कृपा  से  सुख  सहित  आनन्द  पाते  सर्वदा ll
तू  रोगमुक्त  अनेक  जन  को   सर्वदा  करती रहै l
इस  भाँति से उपकार  तू हर  एक का करती रहै ll
प्रार्थना  हरि  से करूँ, हिय  में  सदा यह आश  हो l 
जब तक रहैं नभ चन्द्र-तारे, सूर्य का परकास हो ll
तब  तक  हमारे  देश  में  तुम सर्वदा  फूला  करो l
निज वायु शीतल से पथिक जन का ह्रदय शीतल करो ll

                                 कवयित्री - सुभद्राकुमारी चौहान
                                 संग्रह - मुकुल तथा अन्य कविताएँ
                                 प्रकाशन - हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1980

* यह कविता सुभद्राकुमारी चौहान की पहली कविता है, जब उनकी उम्र नौ साल की थी. यह 'मर्यादा', जून-जुलाई, 1913 में छपी थी.

बुधवार, 11 जुलाई 2012

तितलियाँ (Titliyan by Rajesh Joshi)


हरी घास पर खरगोश
खरगोश की आँख में नींद
नींद में स्वप्न
चाँद का

चाँद में क्या ?

चाँद में चरखा
चरखे में पोनी
पोनी में कतती
चाँदनी

चाँदनी में क्या ?

चाँदनी में पेड़
पेड़ पर चिड़िया
चिड़िया की चोंच में
सन्देसा ऋतु का

ऋतु में क्या ?

ऋतु में फूल
फूल पर तितलियाँ

हरी पीली लाल बैंजनी
रंग-बिरंगी तितलियाँ
तितलियाँ
जैसे स्वप्न पंखदार
जैसे बहुरंगी आग के टुकड़े
उड़ते हुए

तितलियाँ आती हैं घरों में
बिना आवाज, बेखटके
जवान होती लडकी के बदन पर
बैठती हैं उड़ जाती हैं

कि 'छू लिया'
प्रेम होगा अब तुझे किसी से

तितलियाँ ही तितलियाँ
तितलियों पर आँखें
लड़की की

लड़की की आँखों में क्या ?

तितलियाँ !!

                    कवि - राजेश जोशी
                    संग्रह - धूप घड़ी
                    प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2002

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

मात्राएँ दीर्घ हैं...(Matrayein deergh hain by Nagarjun )


छंदों में तो मुश्किल से आएगा य' नाम...
मात्राएँ दीर्घ हैं, क्यों न कर लूँ प्रणाम !
बोल री पूरब, यहाँ खीझ का क्या काम ?
बच्चों की लाड़ को चाहिए ज्यादा ही दाम
मात्राएँ दीर्घ हैं, क्यों न कर लूँ प्रणाम !

यह मगर क्या हुआ ?
तुकों को छलना हुआ !
जमे नहीं मतलब
पेन का चलना हुआ !
पूर्वी फिर कहाँ गई ? कहाँ गई पूर्वा
दूब तो ओझल हुई, हाथ आई दूर्वा

चालू करूँ ट्रांजिस्टर ?
लाहोर, पेकिंङ्, मास्को, बी. बी. सी....
जी हाँ, वे भी सुनवाते हैं बंबइया गीत फ़िल्मी...
जी हाँ, रात को साढ़े ग्यारह के बाद...
जी हाँ, चालू किया ट्रांजिस्टर...
मल्का-ए-तरन्नुम नूरजहाँ गा रही
जी हाँ, सुनिए बन्धु, आप भी
जी हाँ पूर्वी तो सो गई
सो गई पुरबिया...

ढेर सारे नाम हैं उसके तो...
जी हाँ, बस करूँ अब इस वक्त
मल्काए-तरन्नुम नूरजहाँ गा रही
"मिल के खलोइए, मिलके खलोइए..."
और अपना तो अन्तर्मन
चेतना की भीतरी परतों में
अब भी गुनगुनाता है -
गुनगुनाता रहेगा शायद देर तक -
"मात्राएँ दीर्घ हैं, क्यों न कर लूँ प्रणाम ?
बच्चों की लाड़ को चाहिए ज्यादा ही दाम !
बोल री पूरब, यहाँ खीझ का क्या काम
छंदों में तो मुश्किल से आएगा य' नाम
मात्राएँ दीर्घ हैं, क्यों न कर लूँ प्रणाम "


                         कवि - नागार्जुन, 1978
                         संग्रह - पुरानी जूतियों का कोरस
                         प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1983

सोमवार, 9 जुलाई 2012

हिंदू (Hindu by Sharan Kumar Limbale)


स्कूल शुरू हुआ.
       कसबे गुरुजी कक्षा  में  डॉ.बाबा साहब आंबेडकर जी का पाठ पढ़ा रहे थे. पूरी कक्षा में खामोशी थी.
       मध्यांतर हुआ. और गाँव में यह समाचार फैला कि "कसबे गुरुजी ने कक्षा में आंबेडकर का पाठ पढ़ाया." गाँव असंतुलित हुआ. नरेंद्र पाटील चिढ गया. उसने गाँव के लोगों को इकट्ठा किया. बाजीराव चव्हाण सबके आगे था. सदाशिव मोरे चिल्ला-चिल्लाकर सवर्णों को इकट्ठा कर रहा था. अलबत्ता रामभाऊ काबले बीमारी का बहाना बनाकर बाड़े से बाहर निकला ही नहीं.
       लोगों की आहट सुनकर पूरा स्कूल परेशान हो गया. कक्षा के छोटे बच्चे रोने लगे. नरेंद्र पाटील, बाजीराव चव्हाण और सदाशिव मोरे कक्षा में घुस गए. पूरी कक्षा डर गई. "क्यों गुरुजी, तुमने हमारे बच्चों को आंबेडकर  पढ़ाया कि नहीं ?" कक्षा में सभी लड़के एक स्वर में चिल्लाए-"हाँ हाँ."  उसके बाद पूरी कक्षा में शांति फ़ैल गई. कसबे गुरुजी पसीने तरबतर हो गए. वे कुछ भी समझ नहीं पा रहे थे.
      "बोलो, यह सच है कि नहीं ?"
      "जो किताब में है, वही मैंने पढ़ाया."
      "किताब में तुम्हारा आंबेडकर कैसे आ सकता है ?" 
      "किताब में  डॉ.बाबा साहब आंबेडकर पर एक पाठ है."
      "ऐसा पाठ हमारे बच्चों को पढ़ाया न करो."
      "परीक्षा में उस पर प्रश्न आ सकता है."
      "हमारे बच्चे फेल हो जाएँगे. पर आंबेडकर का पाठ नहीं पढेंगे."
      "मैं शिक्षक हूँ. मैं वह पाठ पढ़ाऊँगा ही."
      "गुरुजी झूठ बोल रहे हैं. महारों का आंबेडकर किताब में कैसे हो सकता है?"
      "किताब में ही है, देखी."
      "बताओ कहाँ है ?"
      "यह देखिएs यह पाठs पृष्ठ नंबर 42 ."
      "इधर लाइए वह किताब."
      "लीजिए."
      "बच्चो, s मैं आंबेडकर के पाठ के पन्ने फाड़ रहा हूँ. तुम भी फाड़ो."
      बच्चों ने अपने बस्तों में से किताब निकाली. किताब का पृष्ठ क्रमांक 42 निकाला और सभी ने वह पन्ना फाड़ दिया. फटे हुए पन्ने गुरुजी के मुँह पर फेंके गए. "हुर्रेss" करते हुए सभी तथाकथित प्रतिष्ठित कक्षा के बाहर निकल गए. एक क्षण में पूरी कक्षा खाली हो गई. बाबा साहब की तस्वीर के 20 -30 पन्ने पूरी क्लास में बिखरे थे. कसबे गुरुजी ने सभी पन्ने इकट्ठे किए. प्रत्येक पन्ने में बाबा साहब को देखते रहे. कसबे गुरुजी की आँखों से आँसू बहने लगे.

                   
                      लेखक - शरणकुमार लिंबाले
                      उपन्यास - हिंदू, पृष्ठ संख्या 42 - 43
                      मराठी से अनुवाद - सूर्यनारायण रणसुभे
                      प्रकाशक -  वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2004

रविवार, 8 जुलाई 2012

मुझ पर भरोसा रखना (Mujh par bharosa rakhna by Vincent van Gogh)

प्रिय भाई,
एक और इतवार, एक और पत्र !
...कमाल की बात है न, मीशले कहता है कि पहले प्रेम मकड़ी  के जाले  सा नाजुक और हल्का होता है और धीरे-धीरे एक मज़बूत रस्सी बनता है. किंतु यह होता है केवल विश्वास की बिना पर.
...मेरे निकट प्रेम और मित्रता अनुभूति मात्र न होकर सघन क्रियाशीलता हैं. स्वाभाविक है कि वह कर्म और यत्न की माँग करे और बहुत संभव है उसके फलस्वरूप थकान और खालीपन हमारे हिस्से में आएँ.
...कुछ मित्रताएँ तोड़ना कभी-कभी बहुत मुश्किल हो जाता है. पर अगर मुझे स्टूडियो में जाकर सोचना पड़े कि हर महत्त्वपूर्ण बात से बचते हुए, फालतू बातों पर बात करते रहो, और कम से कम आनेवाले कल को लेकर तो अपने विचार अपने पास ही रखो - तो वह मुझे एक अलगाव की अपेक्षा अधिक दुःख देगा. मेरे निकट सच्ची मित्रता का महत्त्व बहुत अधिक है और उसके एवज में तथाकथित मित्रता को जगह देना संभव नहीं. अगर दोस्ती की इच्छा दोनों ओर से यक्साँ हो, तब कई मतभेद होते हुए भी, अलगाव उतनी सहजता से नहीं आ पाता - कुछ ग़लतफ़हमियाँ या लड़ाइयाँ होती भी हैं तो वे समय के साथ मिटती जाती हैं. लेकिन नकली मित्रता में कड़वाहट का आना तय है - चूँकि उसमें स्वतंत्रता की कोई जगह नहीं है. भले ही व्यक्ति अपने असली भावों को अभिव्यक्ति ना दे, वह (वे) दबे पाँवों आकर उस सम्बन्ध को घुन की तरह लग जाते हैं और दोनों में से किसी को कोई भी लाभ पहुँचा सकने में असमर्थ होते हैं. जहाँ मित्रता मात्र एक शब्द है, वहाँ अविश्वास है और उससे जुड़े सब तरह के षडयंत्र भी. यहाँ थोड़ी सी आपसी समझ और सच्चाई, जीवन की कठिनाई काफी कम कर सकती है.
...तो विदा भाई, जल्द लिखना.
तुम्हारा ही विन्सेंट


 लेखक - विन्सेंट वान गॉग
 संग्रह - मुझ पर भरोसा रखना, विन्सेंट वान गॉग के पत्र भाई थियो के नाम
 अनुवाद और संपादन - राजुला शाह
 प्रकाशक - सीज़नग्रे, कोलकाता, 2011