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मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

नहीं होती (Naheen hoti by Ibne Insha)

शामे-ग़म की सहर नहीं होती 
या हमीं को ख़बर नहीं होती ?

हमने सब दुख जहाँ के देखे हैं 
बेकली इस क़दर नहीं होती 

नाला यूँ नारसा नहीं रहता
आह यूँ बेअसर नहीं होती 

चाँद है, कहकशाँ है, तारे हैं 
कोई शै नामांबर नहीं होती 

एक जाँ सोज़ो-नामुराद ख़लिश 
इस तरफ़ है उधर नहीं होती 

रात आकर गुज़र भी जाती है 
इक हमारी सहर नहीं होती 

बेक़रारी सही नहीं जाती 
ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती 

एक दिन देखने को आ जाते 
ये हवस उम्र-भर नहीं होती 

हुस्न सबको ख़ुदा नहीं देता 
हर किसी की नज़र नहीं होती 

दिल पियाला नहीं गदाई का 
आशिक़ी दर-ब-दर नहीं होती 


नाला = क्रंदन 
नारसा = न पहुँचनेवाला 
कहकशाँ = आकाशगंगा 
शै = चीज़ 
नामांबर = पत्र ले जानेवाला 
सोज़ो-नामुराद = असफल
मुख़्तसर = संक्षिप्त 
गदाई = भिक्षा 

शायर - इब्ने इंशा (1927-1978) 
किताब - इब्ने इंशा : प्रतिनिधि कविताएँ
संपादक - अब्दुल बिस्मिल्लाह
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स , दिल्ली, पहला संस्करण - 1990

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

एक दृष्टिकोण (Ek drishtikon by Amrita Pritam)


सूरज को सारे खून माफ़ हैं l 
दुनिया के हर इन्सान का 
वह रोज़ 'एक दिन' का क़तल करता है 
और हर एक उम्र का एक टुकड़ा 
रोज़ ज़िबह होता है 
इन्सान के इख्तियार में सिर्फ़ इतना है -
कि जिबह हुए टुकड़े को 
वह घबरा के फेंक दे, और डरे,
या निडर उसे कबाब की तरह भूने, खाये 
और साँसों की शराब पीता 
वह अगले टुकड़े का इंतज़ार करे ... 


यित्री - अमृता प्रीतम
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ
प्रकाशक - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1983

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

देवनागरी (Devnagri by Kedarnath Singh

यह जो सीधी-सी सरल-सी 
अपनी लिपि है देवनागरी
इतनी सरल है 
कि भूल गयी है अपना सारा अतीत 
पर मेरा खयाल है 
'क' किसी कुल्हाड़ी से पहले 
नहीं आया था दुनिया में 
'च' पैदा हुआ होगा 
किसी शिशु के गाल पर 
माँ के चुम्बन से 

'ट' या 'ठ' तो इतने दमदार हैं 
कि फूट पड़े होंगे 
किसी पत्थर को फोड़कर 

'न' एक स्थायी प्रतिरोध है 
हर अन्याय का 

'म' एक पशु के रँभाने की आवाज़ 
जो किसी कंठ से छनकर 
बन गयी होगी 'माँ'

'स' के संगीत में 
संभव है एक हल्की-सी सिसकी 
सुनाई पड़े तुम्हें 
हो सकता है एक खड़ीपाई के नीचे 
किसी लिखते हुए हाथ की 
तकलीफ़ दबी हो 

कभी देखना ध्यान से 
किसी अक्षर में झाँककर 
वहाँ रोशनाई के तल में 
एक ज़रा-सी रोशनी 
तुम्हें हमेशा दिखाई पड़ेगी 

यह मेरे लोगों का उल्लास है 
जो ढल गया है मात्राओं में 
अनुस्वार में उतर आया है 
कोई कंठावरोध 

पर कौन कह सकता है 
इसके अंतिम वर्ण 'ह' में 
कितनी हँसी है 
कितना हाहाकार !


कवि - केदारनाथ सिंह 
संकलन - सृष्टि पर पहरा 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2014

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

हत्यारे (Hatyare by Manmohan)

हत्यारे अक्सर आते हैं 

वे दाएँ बाएँ रहते हैं 
जाने पहचाने लगते हैं 

वे सुबह-शाम "कुछ काम धाम तो नहीं"
पूछने आते हैं 
बिना बात हो मेहरबान वे बिगड़े काम बनाते हैं 
 
जब-जब हम चौंक के जगते हैं  
या जी धक् से रह जाता है 
कुछ आगे का दिख जाता है 
 
जब भी यूँ व्याकुल होते हैं 
झटपट चौकस हो जाते हैं 
और खड़े कान सरपट दौड़े 
वे सीधे हम तक आते हैं 
 
वे बहुत दिलासा देते हैं 
और बहुत उपाय सुझाते हैं 
 
कवि - मनमोहन 
संकलन - ज़िल्लत की रोटी 
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2006

बुधवार, 29 जनवरी 2014

कल (Kal by Dhoomil)

देह के बसन्त में वापस लौटते हुए, कल तुम पाओगे 
अपनी नफ़रत के लिए कोई कविता ज़रूरी नहीं है 
अपने जालों के साथ लौट जाएँगे 
वे जो शरीरों की बिक्री में माहिर हैं l 

कल तुम ज़मीन पर पड़ी होगी और बसन्त पेड़ पर होगा 
नीमतल्ला, बेलियाघाट, जोड़ाबगान 
फूलों की मृत्यु से उदास फूलदान 
और उगलदान में कोई फ़र्क नहीं होगा l

कवि - धूमिल
संकलन - कल सुनना मुझे
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2003

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

केन किनारे (Ken kinare by Kedarnath Agrawal)

केन किनारे
पल्थी मारे
पत्थर बैठा गुमसुम !
सूरज पत्थर 
सेंक रहा है गुमसुम !
साँप हवा में 
झूम रहा है गुमसुम !
पानी पत्थर 
चाट रहा है गुमसुम !
सहमा राही 
ताक रहा है गुमसुम !


कवि - केदारनाथ अग्रवाल 
संकलन - कविता नदी 
संपादक - प्रयाग शुक्ल 
प्रकाशक - महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के लिए 
                किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, 2002

रविवार, 19 जनवरी 2014

कोई और है (Koi aur hai by Nasir Kazmi)

कोई और है, नहीं तू नहीं, मेरे रूबरू कोई और है 
बड़ी देर में तुझे देखकर ये लगा कि तू कोई और है 
 
ये गुनाहगारों की सरज़मीं है बहिश्त से भी सिवा हसीं 
मगर इस दयार की ख़ाक में सबबे-नमू कोई और है 
 
जिसे ढूँढ़ता हूँ गली-गली वो है मेरे जैसा ही आदमी 
मगर आदमी के लिबास में वो फ़रिश्ता-खू कोई और है 

कोई और शै है वो बेख़बर जो शराब से भी है तेज़तर 
मिरा मैकदा कहीं और है और मिरा हमसुबू कोई और है 
 
सिवा = बढ़कर 
सबबे-नमू = सामने आने का कारण 
फ़रिश्ता-खू = फ़रिश्तों जैसा स्वभाववाला
हमसुबू = साथ पीनेवाला
 
शायर - नासिर काज़मी
संग्रह - ध्यान यात्रा 
संपादक - शरद दत्त, बलराज मेनरा 
प्रकाशक - सारांश प्रकाशन, दिल्ली, 1994
 
उर्दू कविता हो और ख़ुर्शीद याद न आएँ, भला यह कैसे होगा ! फिर भी समय है कि बीत ही जाता है. आज से एक महीने पहले उनको हम सब निगमबोध छोड़ आए थे.