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शुक्रवार, 17 जून 2022

जीना 1 (On Living by Nazim Hikmet, translated In Hindi)

 

1.   जीना कोई हँसी-खेल नहीं

    तुम्हें पूरी गंभीरता से जीना चाहिए

        उदाहरण के लिए, एक गिलहरी की तरह

मेरा मतलब है जीने के आगे और ऊपर किसी चीज़ की उम्मीद के बग़ैर,

     मेरा मतलब है जीना ही तुम्हारा पूरा काम होना चाहिए

 

जीना कोई हँसी-खेल नहीं

     तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए,

         इतना और इतनी हद तक कि

जैसे तुम्हारे हाथ बँधे हों तुम्हारी पीठ के पीछे,

                        और तुम्हारी पीठ लगी हो दीवार से

या फिर किसी प्रयोगशाला में,

  अपने सफ़ेद कोट और सुरक्षा कवच में

  तुम मर सकते हो लोगों के लिए -

यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जिनके चेहरे तुमने कभी नहीं देखे

हालाँकि तुम जानते हो कि जीना

सबसे असल, सबसे सुंदर चीज़ है।

 

मेरा मतलब है तुम्हें जीने को इतनी गंभीरता से लेना चाहिए

  कि सत्तर की उम्र में भी, उदाहरण के लिए, तुम ज़ैतून के दरख़्त लगाओगे

  अपने बच्चों के लिए नहीं क़तई

बल्कि इसलिए कि हालाँकि तुम डरते हो मृत्यु से तुम उसपर यक़ीन नहीं करते

क्योंकि जीना, मेरा मतलब है अधिक वज़नी ठहरता है।


तुर्की कवि नाज़िम हिकमत (1902-1963) 

स्रोत : /poets.org/poem/living

मूल संकलन : Poems of Nazim Hikmet

तुर्की से अंग्रेज़ी अनुवाद : Randy Blasing and Mutlu Konuk

प्रकाशन : Persea Books


अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद : अपूर्वानंद




इस खूबसूरत कविता के एक अंश का अनुवाद करके थोड़ी देर पहले अपूर्व ने चंडीगढ़ से भेजा। यात्रा और दसियों काम के बाद देर रात इस कविता ने कितना सुकून दिया होगा, इसका अंदाजा लगा सकती हूँ। मारने-मरने, उजाड़ने की खबरों के बीच,  रोज़ाना की आपाधापी, निराशा और उदासी के बीच यह ज़िंदगी में लौटने का न्यौता है।  
और मुझे याद आई पटना के दिनों की। 1983-85 के दौरान कितनी बार हम कई दोस्त लोग रात-रात भर कविता-पोस्टर बनाया करते थे। अधिकतर प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम के लिए। उन्हीं दिनों नाज़िम हिकमत, महमूद दरवेश, ब्रेख्त, नेरुदा, काजी नजरुल इस्लाम,मायकोव्स्की आदि के साहित्य से परिचय हुआ था। उस कतार में कवयित्रियाँ बाद में आईं। इस पर ध्यान भी काफी बाद में गया।

 

अजनबी (Ajnabi by Noman Shauq)

 क्यों बोयी गयी है 

हमारे खमीर में इतनी वहशत 

कि हम इन्तजार भी नहीं कर सकते 

फलसफों के पकने का 


यहाँ क्यों उगती है 

सिर्फ शक की नागफनी ही 

दिलों के दरमियां


कौन बो देता है  

हमारी जरखेज मिट्टी में 

रोज एक नया जहर !


यकीन के अलबेले मौसम 

तू मेरे शहर में क्यों नहीं आता !



संकलन : रात और विषकन्या 

प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली 

                 दूसरा संस्करण , 2010 

इस संकलन में कवि के नाम को छोड़कर शायद ही कहीं नुक़्ता लगाया गया है। 

मंगलवार, 14 जून 2022

धरती (Earth Poem by Mahmoud Darwish, translated in Hindi)

उदास शाम एक उजड़े हुए गाँव में 
आँखें अधनींदी 
मैं याद करता हूँ तीस साल 
और पाँच युद्ध 
उम्मीद करता हूँ कि मुस्तकबिल रखेगा महफ़ूज़ 
मेरी मक्के की बालियाँ 
और गायक गुनगुनाएगा 
आग और कुछ अजनबियों के बारे में 
और शाम बस किसी और शाम की तरह होगी 
और गायक गुनगुनाएगा 


और उन्होंने उससे पूछा : 
तुम क्यों गाते हो 
और उसने जवाब दिया 
मैं गाता हूँ क्योंकि मैं गाता हूँ ... 


और उन्होंने उसका सीना टटोला 
लेकिन उसमें पा सके सिर्फ उसका दिल 
और उन्होंने उसका दिल टटोला 
लेकिन पा सके सिर्फ उसके लोग 
और उन्होंने उसका स्वर टटोला 
लेकिन पा सके सिर्फ उसकी वेदना 
और उन्होंने उसकी वेदना टटोली 
लेकिन पा सके सिर्फ उसकी जेल 
और उन्होंने उसकी जेल टटोली 
लेकिन देख सके वहाँ खुद को ही जंजीरों में बँधा हुआ 


फ़िलिस्तीनी कवि - महमूद दरवेश 
स्रोत - https://www.poemhunter.com/poem/earth-poem-3/
हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद 

सोमवार, 13 जून 2022

घात लगाए हुए बिल्ली ( Cat Lying in Wait by Shakila Azizzada)

अच्छा शगुन नहीं हैं

ये अल्फ़ाज़।


मुझे मत बतलाओ कि

स्वर्ग का दरवाज़ा

खुलता है मेरे होठों के बीच  से।

 

मेरी छातियों के बीच की दरार में

खुदा खुद लड़खड़ा जाता है।


मैं आऊँगी


और फिर

तुम्हारी साँस

मेरे भीतर साँस लेगी,

तुम्हारे फेफड़े भर जाएँगे

मेरी खुशबू से

तुम्हारी जीभ

बरसेगी, बरसेगी

बरसेगी फिर से मेरी त्वचा पर।

 

और मैं हथियार डाल दूँगी।


और इस बार

जब तुम आओगे तुम्हारी आँखों में उस चमक के साथ

मुझे चीर डालने को आमादा, तुम होगे ही

 

बिना किसी शक


उस काली बिल्ली की तरह

जो घात से अचानक छलाँग लगाती हो,

मेरा रास्ता अभी काटते हुए

तुम्हारे दरवाज़े पर उस गौरैया का शिकार करते हुए

जब तक कि वह गिर न गई

अचंभित और बंधक।

 

रसचक्र के लिए 'अफ़ग़ानी दूख्तरान' की स्क्रिप्ट पर काम करते हुए ढेर सारी रचनाओं से गुज़री मैं। उनमें से अनेकानेक को स्क्रिप्ट में शामिल नहीं कर पाई थी। उनमें से कुछ के लिए मन बहुत छटपटाया क्योंकि वे अफ़ग़ानी औरतों की खास आवाज़ थीं। ऐसी ही हैं शकीला अज़ीज़ज़ादा।

1964 में काबुल में जन्मी शकीला अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों से ही कहानियाँ और कविताएँ लिखने लगी थीं। पत्र-पत्रिकाओं में वे छपीं भी। अंतरंगता और औरत की चाहत को लेकर उन्होंने खुलकर लिखा है। काबुल विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई करने के बाद शकीला अज़ीज़ज़ादा ने नीदरलैंड के Utrecht विश्वविद्यालय में प्राच्य भाषाएँ एवं संस्कृति की पढ़ाई की। और अब वे वहीं रहती हैं। वे खूब लिखती हैं और कई विधाओं में उनको महारत हासिल है।

Herinnering aan niets (Memories About Nothing) नाम से उनका कविता संग्रह दरी और डच भाषा में छपा है। उन्होंने देश-विदेश में अपनी कविताओं का मंचन भी किया है। उनकी कई कविताओं का Mimi Khalvati और Zuzanna Olszewska.ने दरी भाषा से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। उनमें से एक कविता का हिन्दी अनुवाद यहाँ पेश है। अनुवादक हैं अपूर्वानंद।

स्रोत - https://www.poetrytranslation.org/poets/shakila-azizzada

 


रविवार, 12 जून 2022

मैं भरी हुई हूँ खालीपन के ख़याल से पूरी (Smoke Bloom by Nadia Anjuman)

मैं भरी हुई हूँ खालीपन के ख़याल से

 

पूरी।

 

 

एक विस्तृत अकाल

मेरी आत्मा के बुखार से तप रहे मैदानों में मुझे खौलाता है

और यह अजीब जलहीन उबाल

मेरी कविता की छवि में जीवन

उमगाता है.

 

मैं निहारती हूँ इस नई-जीवित तस्वीर को

एक विलक्षण गुलाब की

पूरे पृष्ठ पर फैली हुई लजाहट को।

 

लेकिन अभी पहली साँस ही ली है उसने

कि धुएँ के बादल

उसके चेहरे को धुँधला करने लगते हैं

और धुँआ उसकी सुगन्धित त्वचा को ग्रस लेता है।

 

अफ़ग़ानी कवयित्री - नादिया अंजुमन

काव्य संग्रह - गुले दूदी (धुएँ का फूल)

फ़रज़ाना मेरी के अंग्रेज़ी अनुवाद से हिन्दी अनुवाद - अपूर्वानंद

 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

मर्म (Marm by Raghuvir Sahay)

तू हतविक्रम श्रमहीन दीन

निज तन के आलस से मलीन

माना यह कुंठा है युगीन

        पर तेरा कोई धर्म नहीं ?

 

यह रिक्त-अर्थ उन्मुक्त छंद 

संस्मरणहीन जैसे सुगंध,

यह तेरे मन का कुप्रबंध 

         यह तो जीवन का मर्म नहीं ।


कवि - रघुवीर सहाय

किताब - रघुवीर सहाय रचनावली

संपादक - सुरेश शर्मा

प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, दिल्ली


रविवार, 6 जून 2021

सैर पर वापसी (Sair par wapsi by Purwa Bharadwaj)

सुबह की सैर पर फिर से जाने लगना कुछ वैसा ही है जैसे आपने अपने पर लगाए लॉकडाउन में ढील दे दी हो। तीन दिन पहले जब मैं निकली तो लगा कि ऑक्सीजन तो है, शायद मैंने उसको लेना छोड़ दिया था। तभी मैंने अपने को टोका कि ऑक्सीजन की कमी तो वाकई हुई जिससे कितने लोग पार नहीं पा सके। शायद उनके हिस्से का बचा हुआ ऑक्सीजन अब हम ले रहे हैं! यह कितना बड़ा अपराधबोध है! 

तब भी जीवन तो चलता ही है। उसकी गति बढ़ाते हुए सैर पर लौटना सचमुच सुकून लेकर आया। कुत्तों और बंदरों से बचते बचाते वापस सही सलामत लौट आना रणक्षेत्र से वापसी जैसा होते हुए भी। इसमें कोई वीरता का भाव नहीं है क्योंकि कुत्तों और बंदरों की अनजान के प्रति आशंका, उनकी ऊब और खान पान की कमी पर भी ध्यान जाता है। आज जब रामजस कॉलेज के फाटक के सामने 4 कुत्तों के झुंड ने घेरा तो हमारी प्रिंगल डर से गोद में चढ़ने को हुई। दूसरी तरफ एक लड़का हस्की को लेकर जा रहा था। उसने मुझे इशारा किया कि मैं सड़क के उस छोर से जाऊँ। मैंने कदम आगे पीछे करना चाहा तो दो जगह कुत्तों ने भात उगल रखा था और एक जगह टट्टी कर रखी थी। उसे पार करने में मन भिनभिना रहा था। वह लड़का सदाशयता में अपने हस्की का पट्टा थामे रुक गया था, मगर हस्की के करीब से निकलना भी मुझे सुरक्षित नहीं लग रहा था। चार-पाँच मिनट की पैंतरेबाजी के बाद कुत्तों का झुंड ही वापस हो गया। रामजस कॉलेज के हाते में। विद्यार्थियों और शिक्षकों से भले वह हाता सूना हो, मगर सिक्योरिटी गार्ड के साथ कुत्तों ने उसे आबाद कर रखा है। यह सैर से लौटते समय  की बात है। जाते समय एकदम सन्नाटा था। इतना कि मास्क उतार देने का मन कर रहा था।